पुस्तक समीक्षा
रमेश नैयर

साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित एकमात्र भारतीय रवीन्द्रनाथ ठाकुर पर विभिन्न भाषाओं में शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। नित्यप्रति घोष द्वारा बांग्ला भाषा में रचित और श्रीकांत अस्थाना द्वारा हिंदी में अनूदित पुस्तक ‘रवीन्द्रनाथ टैगोर- चित्रों और शब्दों में जीवन कथा’ का विशिष्ट महत्व है। एक सौ साठ से अधिक दुर्लभ एवं अनूठे पत्रों के समावेश ने सुरुचिपूर्ण ढंग से आर्ट पेपर पर प्रकाशित पुस्तक को संग्रहनीय बना दिया है। पुस्तक श्रमपूर्वक प्रामाणिकता के साथ रची गई है।
प्रतीकों और संकेतों में लेखक ने रवीन्द्र के भावनात्मक और रागात्मक रिश्तों का ब्योरा भी दिया है। एक उदाहरण—तेईस वर्ष की वय में उनका विवाह दस वर्ष की एक ग्रामीण कन्या से कर दिया गया था। विवाह के मात्र चार माह बाद रवीन्द्र की साहित्यिक सहचरी कादम्बरी ने पच्चीस वर्ष की आयु में आत्महत्या कर ली थी। टैगोर का उपन्यास ‘हे’ कादम्बरी की स्मृति से प्रेरित होकर लिखा गया था। ‘हे’, वास्तव में, उपन्यास की प्रमुख पात्र हेमांगनी का संक्षिप्त संबोधन माना गया था। उस पर आधारित नाटक की प्रमुख पात्र हेमांगनी की भूमिका कादम्बरी ने निभाई थी। संकेतों में कहा गया है कि रवीन्द्र का विवाह मृगालिनी से हो जाने के बाद कादम्बरी अवसाद में थी। इसी प्रकार के कुछ और नितांत निजी प्रसंग उनकी साहित्यिक कृतियों में खोजने की अटकलें बांग्ला के साहित्यकार और लेखक करते रहे।
बंगाल के इतिहासकार, साहित्यकार और समीक्षक दीवानगी की हद तक रवीन्द्र के प्रशंसक रहे हैं। आलोच्य पुस्तक में उनकी विलक्षण प्रतिभा के अनेक दृष्टांत दिए गए हैं। साथ ही पुत्र, भाई, पति और पिता के दायित्वों का निर्वाह रवीन्द्रनाथ ने जिस दक्षता के साथ किया है, उसे भी पुस्तक में विस्तार से रेखांकित किया गया है। तेरह वर्ष की वय में उन्होंने एक कविता का पाठ, मेला मैदान में किया था। उन्हीं दिनों उनकी एक कविता ‘अमृत बाजार पत्रिका’ में प्रकाशित हुई, ठाकुर परिवार का आभा-मंडल विलक्षण था। उनके भाई सत्येन्द्रनाथ ठाकुर बंगाल के प्रथम आई.सी.एस. थे। रवीन्द्र सुगठित, सुन्दर और स्वस्थ काया के भी धनी थे। यह भी एक कारण था कि जब उन्होंने यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया, तो मात्र तीन महीने के बाद उन्हें इस आशंका से वापस बुला लिया गया कि कहीं किसी अंग्रेज युवती से उनका विवाह न हो जाए।
रवीन्द्र को सर्वाधिक प्रसिद्धि सत्तर से अधिक प्रकाशित कहानियों से मिली। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय से उनकी खिन्नता उस समय दूर होने लगी, जब त्रिपुरा के महाराजा वीरचन्द्र माणिक्य ने अपने दूत के रूप में बंकिम को 1881 में प्रकाशित उनके काव्य-संग्रह ‘भग्न-हृदय’ की प्रशस्ति के लिए भेजा। बंकिम के उपन्यास ‘आनंदमठ’ से लिए गए राष्ट्रगीत ‘वन्दे-मातरम‍्’ के प्रथम दो छंदों की धुन रवीन्द्रनाथ ने बनाई थी और 1890 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में उन्होंने इसे गाया भी था। 1950 में भारत की संविधान सभा ने रवीन्द्रनाथ द्वारा रचित ‘जन गण मन अधिनायक जय हे’ गीत को ‘राष्ट्रगान’ की मान्यता दी। दिसंबर 1913 में रवीन्द्र को ‘गीतांजलि’ के अंग्रेजी अनुवाद पर नोबेल पुरस्कार मिला।
इस पुस्तक में रवीन्द्र की ऐतिहासिक उपलब्धियों के साथ ही उनकी निजी त्रासदियों का ब्योरा भी दिया गया है। दूर-दूर तक बहुत उपचार कराने के बाद ही उनकी पत्नी मृगालिनी और पुत्र सामी को नहीं बचाया जा सका। रवीन्द्र परम राष्ट्रभक्त थे। 13 अप्रैल, 1919 को जलियांवाला बाग़ में किये गए गोलीकाण्ड से क्षुब्ध होकर उन्होंने ‘सर’ की उपाधि लौटा दी थी। 07 अगस्त 1941 को दोपहर 12 बजकर 10 मिनट पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उस दिन उनकी अंतिम यात्रा में अभूतपूर्व जनसैलाब उमड़ पड़ा था। ऐसे अनेक एेतिहासिक तथ्य हैं, जिन्हें जुटाने के लिए लेखक साधुवाद के अधिकारी हैं। पुस्तक अच्छी और संग्रहणीय होने का बावजूद महंगी कीमत के कारण, हिंदी के साधन-संपन्न पाठक ही इसे खरीद पाएंगे।
पुस्तक : रवीन्द्रनाथ टैगोर : चित्रों और शब्दों में जीवन कथा प्रकाशक : नियोगी बुक्स, नई दिल्ली लेखक : नित्यप्रिय घोष अनुवाद : श्रीकांत अस्थाना पृष्ठ : 236 मूल्य : रु. 995.

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