भारत विरोध की हदें लांघता पाक
पिछले सप्ताह पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने प्रेस वार्ता में खाद्य एवं कृषि संगठन के तत्वावधान में काम करने वाले दक्षिण एशियाई आयोग को अपने देश की ओर से मरुस्थलीय टिड्डी दल को काबू करने पर प्रतिबद्धता जतायी है। पाकिस्तान के अलावा भारत, ईरान और अफगानिस्तान भी इस संगठन के सदस्य हैं। फिलवक्त भारत और पाकिस्तान पिछले दो दशकों में सबसे बड़ा टिड्डी हमला झेल रहे हैं। खाद्य एवं कृषि संगठन ने हाल ही में कहा था ‘वंसत ऋतु में पैदा होने वाली टिड्डियां का रुख इस बार वक्त से पहले स्थानांतरण पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से से भारत के राजस्थान की ओर मई माह में होगा… इसके कुछ झुंड 1962 के बाद पहली बार उत्तर भारतीय सूबों की ओर बढ़ेंगे।’ संगठन ने यह चेतावनी भी जारी की है कि वर्षा ऋतु शुरू होते ही टिड्डी दल अंडे देने के लिए राजस्थान वापस लौटेगा। आगे जून माह में टिड्डियों के एक के बाद एक झुंड दक्षिणी ईरान से तो आएंगे ही, जुलाई में हॉर्न ऑफ अफ्रीका क्षेत्र से आने वाले टिड्डी दल भी राजस्थान में अंडे देने पहुंचेंगे।
पाकिस्तानी प्रवक्ता ने यह भी कहा ‘हमें विश्वास है कि हमारी अनेक माहिर तकनीकी टीमें टिड्डी रोकथाम पर खाद्य एवं कृषि संगठन के साथ समन्वय कर माकूल ढंग से काम कर रही हैं।’ हालांकि, ऐसा लगता है कि सच इस कथन से अलग है। पाकिस्तानी का कथित सहयोग, कम से कम भारत के संदर्भ में, कभी तसल्लीबख्श नहीं रहा है। खाद्य एवं कृषि संगठन अपनी जगह केवल सूचनाओं का आदान-प्रदान केंद्र भर है और क्षेत्रीय स्तर पर भावी स्थिति से अवगत कराता है। यह काम उस सीधे तकनीकी सहयोग का विकल्प नहीं हो सकता जो दोनों देशों के लिए टिड्डियों की समस्या को काबू करने में फायदेमंद हो। पहले ही टिड्डी दल ने इनके यहां कृषि पर बुरा असर डाल रखा है, वह भी कोविड-19 महामारी जैसे महासंकट के दौरान। समस्या यह है कि भारत के विरुद्ध पाकिस्तान का रिवायती अतार्किक रवैया जम्मू-कश्मीर में संवैधानिक बदलाव किए जाने के बाद और ज्यादा बढ़ गया है। लिहाजा इसने खुद को एक कोने में बंद कर लिया है, यहां तक कि उन विषय़ों पर भी, जो आम जीवन और जीवनयापन से संबंधित हैं।
बहुपक्षीय संदर्भ में भी, पाकिस्तान के नेतृत्व ने नकारात्मक रुख दिखाया है। जहां अन्य सभी दक्षेस संगठन के राष्ट्राध्यक्षों ने प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर कोरोना महामारी की चुनौती से साथ मिलकर निपटने के उपायों पर आपेक्षित वीडियो शिखर सम्मेलन में भाग लिया, वहीं पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने खुद न उपस्थित होकर अपने स्वास्थ्य सलाहकार को आगे किया था, जो इस नाजुक मौके पर भी कश्मीर का राग अलापने से बाज नहीं आया। हालांकि, इमरान खान का मकसद अपनी गैर-मौजूदगी से मोदी को नीचा दिखाना था। पाकिस्तान ने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा प्रस्तावित कोरोना आपदा कोष बनाने के तंत्र में रोड़े अटकाने का यत्न किया है। भारत ने दक्षेस राष्ट्रों को मदद देने के लिए अपनी ओर से 1 करोड़ डॉलर का आरंभिक योगदान किया है।
पिछले तीन महीनों से हालांकि पाकिस्तान खुद भी अन्य मुल्कों की तरह कोरोना महामारी का दंश झेल रहा है, इससे उसका स्वास्थ्य तंत्र और अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गए हैं, तथापि भारत-विरोधी कृत्य और दुष्प्रचार पहले की तरह निर्बाध है। इनमें जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों की घुसपैठ जारी रखना भी शामिल है। हालांकि, ऐसे कई प्रयत्न भारतीय सुरक्षा बलों ने समय रहते निष्फल कर दिए हैं। सीमा पर गोलाबारी की घटनाएं हुई हैं और कुछ सिविलियन मारे गए हैं। पाकिस्तानी सेना आतंकी करतूतों को उकसावा देना जारी रखे हुए है। इमरान खान ने भारत पर झूठे मुठभेड़ अभियान चलाने का आरोप भी लगाया है।
पाकिस्तान का मुख्य इल्जाम है कि मोदी सरकार के तहत भारत हिंदू श्रेष्ठता बनाने की ओर अग्रसर हुआ है और ‘इस्लाम के हौव्वे’ से ग्रस्त है। सात सप्ताह पहले पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह कुरैशी ने इस्लामिक देशों के संगठन (ओआईसी) से कहा था कि वह भारत द्वारा मुस्लिमों के प्रति भेदभाव वाला व्यवहार रखने पर संज्ञान लेकर निंदा करे। कुरैशी ने चिरपरिचित इल्जाम दोहराए, लेकिन उकसावे के बावजूद संगठन की ओर से सख्त प्रतिक्रिया बनाने में नाकामयाब रहे। लेकिन लगभग दो हफ्ते पहले इस्लामिक संगठन के सदस्य देशों के संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधियों की बैठक में पाकिस्तान ने फिर से भारत के खिलाफ जमकर आरोप लगाए थे। उसने कहा कि भारत में ‘इस्लामोफोबिया’ की जांच हेतु एक समूह भेजा जाए। लेकिन उसका यह अभियान असफल हो गया क्योंकि कथित तौर पर यूएई और मालदीव ने उस प्रस्ताव का साथ देने से साफ मना कर दिया, जो भारत के विरुद्ध जाता हो।
तथ्य यह है कि कुछ इस्लामिक देशों में भले ही इस बात की चिंता जताई है कि भारत अपने धर्म-निरपेक्ष सिद्धांतों से परे हट रहा है, उन्होंने अपने यह संकेत सीधे किंतु ढके-छिपे तरीके से दिए हैं, केवल चंद देश जैसे कि तुर्की पाकिस्तान का साथ खुलकर देने को इच्छुक है। इससे पाकिस्तान का मायूस होना स्वाभाविक है, अन्यथा वह इस्लामिक जगत से भारत के खिलाफ सक्रिय होकर प्रचार चलवाना चाहता था। इस बात की संभावना कम ही है कि आतंकवाद के साथ नाम जुड़ने और अत्यंत कमजोर आर्थिकी की वजह से वह इस काम में सफल हो पाएगा। वह भी इस्लामिक देशों में केवल पाकिस्तान ही परमाणु शक्ति संपन्न होने के बावजूद!
कोई हैरानी नहीं कि हालिया चीन-भारत सीमा तनाव पर पाकिस्तान ने एक पिछल्लगू की भांति चीन का समर्थन किया है। पिछले महीने के आखिर में शाह कुरैशी ने चीन सीमा पर भारत के ‘गैर-कानूनी निर्माण’ को इसके लिए उत्तरदायी बताया था। कुरैशी सीमा पर यथास्थिति बदलने को आतुर अपने आका के कृत्यों को सही ठहराने की हद तक चले गए और जोर देकर कहा कि चीन भारत द्वारा की जा रही नई कार्रवाई से अनजान बनकर नहीं रह सकता। इमरान और कुरैशी, ने ही मौजूदा संकट का फायदा उठाते हुए कहा है कि भारत विस्तारवाद की राह पर चल रहा है और अपने पड़ोसी देशों के लिए खतरा है। समझदारी की बात है कि भारतीय प्रवक्ता ज्यादातर इस तरह के वाहियात इल्जामों पर प्रतिक्रिया नहीं देते हैं। इसकी बजाय जब जरूरी होता तब ही आतंकवाद को प्रायोजित करने पर पाकिस्तान की मिलीभगत पर ध्यान केंद्रित करवाना चाहते हैं।
31 मई को भारत ने दिल्ली स्थित पाकिस्तानी दूतावास में नियुक्त दो अधिकारियों को जासूसी करने के आरोप में धरा था। उनसे सवाल पूछे गए, गिरफ्तार किया, छोड़ा और ‘गैर-वांछित व्यक्ति’ करार देकर निकाल देश से बाहर किया। यह अपने आप में नई बात नहीं थी, राजनयिक स्टाफ के चोले की आड़ में जासूसी करने वालों को पहले भी वापस भेजा जाता रहा है। हैरानी की बात तो यह है कि बदले की परंपरा वाली कार्रवाई में पाकिस्तान ने निष्कासन करने जैसा रिवायती कदम अभी तक नहीं उठाया है। ऐसा लगता है कि इस बार वह अपने यहां ‘निकाल बाहर’ करने जैसा जवाबी कदम न उठाकर, कम से कम दो भारतीय दूतावास अधिकारियों को पकड़कर पहले दुर्व्यवहार करना चाहता है। जाहिर है इसके लिए वह मौके की तलाश में है। अफसोस की बात है कि कोविड-19 जैसा विपत्तिकाल भी भारत के प्रति पाकिस्तानी रवैये में नरमी का भाव नहीं ला पाया है। उसकी प्रतिक्रियावादी दुश्मनी बदस्तूर जारी है।
लेखक विदेश मंत्रालय में सचिव रह चुके हैं।
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