नेपाल का नया नक्शा संसद द्वारा संवैधानिक संशोधन के जरिए पारित कर दिया गया। भारत का मानना है कि संसद में नये नक्शे का प्रस्ताव पेश करने और इसे जारी करने की लाल लकीर पार करने के बाद नेपाल ने वार्ता के रास्ते बंद कर लिये हैं। इससे पहले नेपाली संसद में सीमा विवाद को लेकर प्रधानमंत्री केपी ओली ने भारत के प्रति काफी भावनात्मक भाषण दिया था, इसमें उन्होंने कहा था कि नेपाल संवाद के लिए सही माहौल बनाना चाहता है और नये नक्शे का प्रस्ताव पेश करना स्थगित किया जा सकता है, यह संकेत देते हुए रुख को नरम किया था। उन्होंने यह भी कहा था कि सीमा विवाद पर बातचीत कोरोना संकट टल जाने के बाद हो सकती है।
लेकिन पिछले साल से, जब से सीमा विवाद पुनः उठ खड़ा हुआ था, इस पर बातचीत हेतु तारीख तय करने को लेकर भारत के टालमटोल वाले रवैये ने नेपाल में क्षेत्रीय राष्ट्रवाद के उद‍्भव में तेल डालने का काम किया है, जिसका दोहन ओली ने अपने डूबते हुए राजनीतिक करिअर को फिर से उबारने के लिए किया है और इस काम में मौके का अधिक से अधिक फायदा लेते हुए चीन ने मदद की है, जबकि एक समय पर उसके लिए नेपाली की अंदरूनी राजनीति में घुसना बहुत मुश्किल था। जमीनी हकीकत यह है कि भारत और नेपाल ने केवल सुस्ता और कालापानी विवाद को छोड़कर पिछले 26 वर्षों के दौरान आपसी बातचीत में लगभग 98 प्रतिशत मसलों को सुलझा लिया है।

मेजर जन. (अ.प्रा.) अशोक मेहता

दरअसल, भारत ने वार्ता की मेज पर नेपाल को लाने के एक नहीं… दो नहीं… बल्कि तीन मौके गंवाए हैं, वरना नेपाल की सड़कों पर भारत विरोधी प्रदर्शनों और संसद में नक्शे को लेकर कानून में संशोधन की नौबत न बनती। इनमें कम से कम दो मर्तबा–2019 के नवंबर-दिसंबर और 2020 के मार्च में–नेपाल में उपस्थित रहते हुए, मैंने कालापानी पर भारत की लंबी चुप्पी साधने से रुष्ट होकर किए गए विरोध और आलोचनात्मक प्रदर्शन देखे हैं। जिस बात ने नेपाल के मीडिया, जनता और राजनीतिक संभ्रांत वर्ग में हालिया भारत-विरोधी लहर को उठाया है, वह है सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा 2 नवंबर, 2019 को प्रकाशित किया गया भारत का नया राजनीतिक नक्शा–जो वास्तव में आठवां अंक है–इसके बाद नौवां अंक वह है, जिसमें जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक दर्जे में आए बदलाव के बाद 8 नवंबर को अगला नक्शा प्रकाशित किया गया था। उक्त दोनों नक्शों में सीमा रेखांकन में बाकी सब तो लगभग एक जैसा है, बस 8 नवंबर वाले नक्शे में काली नदी का नाम नदारद है। एक रेडियो इंटरव्यू के दौरान नेपाल के जाने-माने रेडियो-टीवी पत्रकार ऋषि धमाला ने इसको लेकर मुझसे सवाल किया था। यह बिंदु सीमा विवाद जैसे अत्यंत भावनात्मक मुद्दे में उफान का कारण बनने को काफी था। नक्शे में भारत के गफलत भरे कदम के बाद नेपाल ने विदेश सचिव स्तर की वार्ता की मांग की थी और इस बाबत 20 और 22 नवंबर और फिर 30 दिसंबर को संदेशे भेजे थे। लेकिन नेपाल के अनुसार भारत की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।
इसी बीच भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 8 मई को लिपुलेख दर्रे से होकर कैलास मानसरोवर तीर्थ और चीन के साथ पुराने व्यापार केंद्र तक जाते संपर्क मार्ग यानी ब्लैकटॉप रोड के निर्माण कार्य का ऑनलाइन उद‍्घाटन कर दिया। जबकि जहां से होकर यह सड़क बननी है यानी लिम्पियाधुरा-लिपुलेख दर्रा-कालापानी का त्रिभुजाकार क्षेत्र, उसे नेपाल अपना हिस्सा बताकर दावा करता आया है।
भारत को ‘सोए हुए को सोते ही रहने’ देना चाहिए था क्योंकि उक्त सड़क पर काम पिछले एक दशक से ज्यादा समय से चला हुआ है और नेपाल ने कभी इस पर आपत्ति नहीं की थी। इस सड़क मुद्दे ने घरेलू मोर्चे पर बदइंतजामी, राजनीतिक ज्यादतियां और घमंड भरा व्यवहार रखने के कारण बुरी तरह घिरे ओली को जीवनरेखा प्रदान कर दी है। ओली ने अपना राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व सुनिश्चित कर लिया है। 11 मई को नेपाल सरकार ने सड़क के मुद्दे पर काठमांडू स्थित भारतीय राजदूत विनय क्वात्रा और भारत के विदेश मंत्रालय को राजनयिक पत्र भेजे गए थे। नेपाल के मुताबिक इन पत्रों की पावती जारी नहीं की गई। भारत ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस विषय पर वार्ता कोविड संकट टल जाने के बाद हो सकती है। जबकि कायदे से दोनों देशों के विदेश सचिवों के बीच दूरभाष वार्ता की जानी बनती थी। इससे वार्ता की तिथि पर औपचारिकता भी पूरी हो जाती। हालांकि, पिछले नवंबर माह में प्रधानमंत्री ओली ने कहा था कि नेपाल अपना नक्शा नहीं जारी करेगा, लेकिन 13 दिसंबर को उनके भू-प्रशासन एवं सहकारी मंत्री पदम अरियाल ने कहा कि नेपाल नया नक्शा प्रकाशित करेगा। इस वक्तव्य पर तभी भारत को सावधान हो जाना चाहिए था।
नेपाली मीडिया के अनुसार इस बात की उम्मीद थी कि 19 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने नेपाली समकक्ष ओली को फोन कॉल करेंगे, लेकिन शायद मोदी अपनी व्यस्तता के चलते बात नहीं कर पाए। अगले दिन नक्शा जारी कर दिया गया। तत्पश्चात 26 मई को बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में इसका अनुमोदन कर दिया गया और 31 मई के दिन संसद में प्रस्ताव रखा गया। 13 जून को संसद में अभूतपूर्व सर्वसम्मति से यह संवैधानिक संशोधन पारित हो गया, इसमें 34 मत नई जनता समाजवादी दल के भी हैं, जिसके अधिकांश सदस्य भारत समर्थक मधेसी सांसद हैं।
इस सारे घटनाक्रम पर भारत का मानना है कि नेपाल ने मानचित्र संबंधी आक्रामकता अपनाकर एवं कृत्रिम नक्शा जारी करके वार्ता से पहले ही यथास्थिति को एकतरफा भंग किया है। कनाडा में बसे नेपाली चिंतक नरेश कोइराला ने कहा है कि इतिहास ही बताएगा कि क्या नेपाल द्वारा नया नक्शा जारी करना सीमा विवाद हल करने में एक प्रभावशाली नीति रहा है अथवा एक ऐसा जुआ, जिसका दीर्घकालीन असर भारत-नेपाल रिश्तों पर होगा। नि:संदेह इससे दोनों मुल्कों के बीच रहे सेना-से-सेना विशिष्ट संबंधों को भी चोट पहंुचेगी, साथ ही भारत समर्थक सेवानिवृत्त नेपाली सैनिक समुदाय को अपने लोगों के ताने सहने पड़ेंगे। भारत और नेपाल के सेनाध्यक्षों को एक-दूसरे की यहां मानद जनरल का पद मिलने की परंपरा रही है और नेपाल के राजनीतिक और राष्ट्रीय आपदाओं के समय भारत ही सबसे पहले पहुंचता आया है।
नवीनतम घटनाक्रम का असर भारत-नेपाल के बीच मुक्त-सीमा और नेपाली नागरिकों को मिले विशेष अधिकारों पर हो सकता है। हालांकि, दोनों देशों के बीच सदियों से रहा बहुप्रचारित विशेष संबंध दशकों पहले गायब हो चुका है, क्योंकि भारत के कर्णधार गृह-युद्ध के बाद उपजे नए नेपाल की आकांक्षा को पहचानने में असफल रहे थे, न तो वे वैश्विक पहचान बनाने को आतुर नेपाली नागरिकों की महत्वाकांक्षा को और न ही राष्ट्रवादी पुट लिये उस राजनीतिक नेतृत्व को भांप पाए, जिसका झुकाव चीन की ओर था। बंटे हुए विपक्ष के चलते आज नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी वहां पूर्ण नियंत्रण में है और यह स्थिति 2023 के चुनाव तक बनी रहेगी।
नये नक्शे के बिना भारत बखूबी गुजारा कर सकता है, हालांकि मनमुटाव का नुकसान दोनों मुलकों को होगा, लेकिन नेपाल पर असर ज्यादा कड़ा रहेगा। अति राष्ट्रवादी भावना अपनाने की कीमत बहुत भारी होगी और इसका मुख्य लाभार्थी चीन रहेगा। नेपाल के अंदर, वर्ष 2015 में संविधान की पुनर्संरचना करते वक्त भारत के प्रभाव से खुद को मुक्त रख पाना और आर्थिक नाकेबंदी को झेल जाने पर जो जोशीला भाव पनपा था, उसका खुमार अभी तक कायम है। तथापि यह फैसला इतिहास करेगा कि क्या भारत वक्त रहते उस स्थिति को संभाल सकता था, जिसकी संभावना नियति बनने की थी।

लेखक सैन्य मामलों पर विशेषज्ञ टिप्पणीकार हैं।

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