व्यर्थ न जाये बलिदान
हमले को सबक मान तय हो रणनीति
लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा के निकट गलवान घाटी पर कब्जे के मंसूबों के साथ चीनी सेना ने भारतीय जवानों के साथ जो बर्बरता दिखाई, उसने भारत को सतर्क किया है कि 1962 वाला चीन ज्यादा घातक अंदाज में घात लगाये बैठा है। चीन ने एक बार फिर पीछे से घात किया है, वह भी तब जब भारत समेत सारी दुनिया चीन-जनित कोरोना महामारी से कराह रही है। यह हमला तब हुआ जब उच्च सैन्य अधिकारियों में चीन के अतिक्रमण वाले इलाके से पीछे हटने पर सहमति बन गई थी। कहने को भारतीय व चीनी सैनिकों में खूनी संघर्ष 1975 के बाद हुआ है लेकिन चीन अपनी हरकतों से बाज कब आया। अपने धनबल और कूटनीतिक चालों से भारत के खिलाफ जब-तब षड्यंत्र रचता ही रहा है। दक्षिण एशिया के छोटे देशों को ऋणों के जाल में फंसाकर भारत विरोधी अभियानों को अंजाम देता रहा है। नेपाल का हालिया प्रपंच चीन की शह के बिना संभव नहीं था। पंद्रह जून को गलवान घाटी में जो कुछ घटा, वह चीनी मंसूबों का आईना है। भारत ने तो अपने बीस रणबांकुरे खोये हैं, मगर चीन के भी 45 के करीब जवान हताहत हुए हैं। यही वजह है कि बुधवार को देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने बेबाकी से कहा कि भारतीय जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा। हमारे जवान मारते-मारते मरे हैं, हमें उन पर गर्व करना चाहिए। नि:संदेह भारत की नीति रही है कि वह किसी की भूमि पर नजर नहीं रखता है, लेकिन अपने देश की अखंडता और संप्रभुता से किसी भी कीमत पर समझौता भी नहीं करता। भारत को गलवान की घटना से सबक लेना चाहिए कि चीन आगे भी ऐसी हरकतें करेगा और हमें अपनी पूरी तैयारी रखनी है। अपनी क्षमताओं को धार देनी है। सीमा पर सैन्य ताकत से और अंतर्राष्ट्रीय राजनय में कूटनीति के बूते चीन को करारा जवाब देना है।
अब चीन को बताना है कि शांति जरूर चाहते हैं पर उकसाने पर जवाब देना भी जानते हैं। नि:संदेह गलवान की घटना चीनी दुस्साहस का नतीजा है। तानाशाह चीन को उसी की भाषा में जवाब देने का वक्त आ गया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि 19 जून को प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में देश के राजनीतिक दल एक स्वर में चीनी निरंकुशता के विरुद्ध आवाज बुलंद करेंगे। संकेत हैं कि भारत सरकार चीन के खिलाफ कड़े आर्थिक फैसले ले सकती है। उन बड़े प्रोजेक्टों को रद्द किया जा सकता है, जिनमें चीनी कंपनियों की बड़ी भूमिका है। ध्यान रहे कि चीन ने भारतीय सीमा पर तब हमला बोला है जब प्रधानमंत्री आत्मनिर्भर भारत का आह्वान करते हुए स्वदेशी पर बल दे रहे हैं। चीन से पलायन कर रही कंपनियों को देश आमंत्रित कर रहा है। कहीं न कहीं कोरोना संकट के कोहराम के चलते समूची दुनिया और मानवता को संकट में डालने वाला चीन खुद अलग-थलग पड़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन में वायरस के स्रोत की जांच की मांग के पक्ष में समर्थन जुटाकर तथा डब्ल्यू.एच.ओ में महत्वपूर्ण पद पाकर भारत चीन की आंख की किरकिरी बना हुआ है। यही हताशा उसके हमले के रूप में सामने आई है और भारत को डराने की असफल कोशिश में लगा है। दरअसल, जब से भारत ने चीन से लगने वाली सीमा पर सड़क व संरचनात्मक निर्माण तेज किया है, चीन बौखलाया हुआ है। भारत ने उत्तराखंड से लेकर लद्दाख के सीमावर्ती क्षेत्रों में सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सड़कों का निर्माण किया है, जिसके चलते वह बार-बार अतिक्रमण के जरिये अपनी भड़ास निकालता है। बहरहाल, भारत इस समय कोरोना संकट से जूझ रहा है। आर्थिक मंदी व तालाबंदी के कुप्रभावों से अर्थव्यवस्था उबर रही है। ऐसे में युद्ध का विस्तार भारत हित में भी नहीं है। घटना को सबक मानते हुए विवाद को टालने के लिए कूटनीतिक-सैन्य स्तरों पर प्रयास हों।
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