सुनील मिश्र

बासु चटर्जी के बारे में इस समय इस पीढ़ी के सामने बात करने के लिए बहुत सारे उदाहरणों में जाना पड़ेगा। उम्र और अस्‍वस्‍थता, फिर सिनेमा की आज जो चाल है उसके अनुरूप उनका सिनेमा नहीं था लेकिन आज का सिनेमा कहीं न कहीं एक-दो उदाहरणों में उनके सिनेमा से प्रेरित या शिक्षित जरूर हो सकता है। बासु दा का सक्रिय फिल्‍म कार्यकाल 2010 तक का रहा है। आखिरी की फिल्‍में रिलीज न हो पायीं। एक फिल्‍म ‘कुछ खट्टा कुछ मीठा’ में अनुपम खेर और सतीश कौशिक जैसे कलाकार उनके साथ काम कर रहे थे। कई बार बड़े सितारों के हाथ में यह सब सामर्थ्य होता है जब आर्थिक कठिनाई और दूसरे कारणों से अच्‍छी-खासी बनती और पूर्णता के कगार पर पहुंचती फिल्‍म को अपने प्रभाव से पूर्ण करवा दें, मगर ऐसे मामलों में सितारों की अजीब-सी कृपणता देखने को मिलती है। ऐसा ही एक उदाहरण कुछ वर्ष पूर्व दिवंगत फिल्‍मकार निर्देशक एस. रामनाथन का भी है जिन्‍होंने अमिताभ बच्‍चन को लेकर ‘बॉम्‍बे टू गोवा’ और ‘महान’ जैसी फिल्‍में बनायीं थीं। वे आखिर में ‘जमानत’ फिल्‍म पूरी नहीं कर पाये क्‍योंकि बजट कहीं समस्‍या के मूल में था। इस फिल्‍म में भी अमिताभ बच्‍चन काम कर रहे थे। इस प्रकार उल्‍लेखनीय निर्देशकों के साथ कुछ ऐसे प्रसंग जरूर हमें विचलित करते हैं।
बासु चटर्जी ऐसे फिल्‍मकार थे जो हिन्‍दी सिनेमा में मध्‍यवर्गीय जीवन और संसार को बड़ी गहराई से देखते और अनुभव करते हुए फिल्‍में बनाया करते थे। वे राजस्‍थान में जन्‍मे थे और मुम्‍बई आकर पहले एक तरह से पत्रकारिता ही करने लगे थे। ब्लिट्स अखबार में कार्टून बनाना और इलेस्‍ट्रेशन का काम करना भी एक प्रकार की पत्रकारिता ही थी। वे उस तरह से बंगाली संस्‍कृति या परिवेश से अभिप्रेरित नहीं थे जिस तरह से बिमल रॉय, हृषिकेश मुखर्जी रहे। हिन्‍दी प्रान्‍त में उनका जन्‍म लेना, बड़ा होना और सर्जक बनना इस मायने में बहुत महत्‍वपूर्ण हुआ कि उन्‍होंने जिस तरह की फिल्‍में बनायीं, वे सारे देश में जानी गयीं, सराही गयीं और चर्चा में आयीं। सत्तर और अस्‍सी का दशक जो कि बासु चटर्जी की रचनात्‍मक सक्रियता का सबसे उल्‍लेखनीय कार्यकाल माना जायेगा, एक साथ अनेक दिलचस्‍प फिल्‍मों के प्रदर्शन का साल था। खास बात यह थी कि वे बेहतर सिनेमा की समाज में जगह बनाने के‍ लिए रचनात्‍मक काम भी कर रहे थे। उनकी प्रेरणा से ही देश में जगह-जगह फिल्‍म सोसायटियां स्‍थापित हुईं। राष्‍ट्रीय फिल्‍म विकास निगम, नेशनल‍ फिल्‍म आर्काइव, फिल्‍म डिवीजन, चिल्‍ड्रन फिल्‍म्‍स सोसायटी के उपक्रमों को लोगों तक पहुंचने का मार्ग खुला क्‍योंकि इन संस्‍थाओं के माध्‍यम से वे सब फिल्‍में जनता तक पहुंची जो अन्‍तत: बनकर डिब्‍बाबंद होकर रह जातीं।
बासु चटर्जी ने जिस तरह की फिल्‍में बनायीं, सारा आकाश, रजनीगंधा, स्‍वामी, खट्टा-मीठा, बातों-बातों में, प्रियतमा, शौकीन, उस पार, चक्रव्‍यूह, मंजिल, एक रुका हुआ फैसला, अपने-पराये, मनपसन्‍द, कमला की मौत, चमेली की शादी, दिल्‍लगी, गुदगुदी वगैरह में वह फिल्‍म नहीं एक तरह से मनोरंजन की नयी परिभाषा को स्‍थापित करते और सफल होते सिनेमा के उस पिटारे का खुल जाना था, जिसमें से अमोल पालेकर, विद्या सिन्‍हा, दिनेश ठाकुर, जरीना वहाब जैसे कलाकारों को हमने जाना पहचाना। यही नहीं, वे धर्मेन्‍द्र, अमिताभ बच्‍चन और राजेश खन्‍ना को लेकर भी फिल्‍में बना रहे थे और मिथुन चक्रवर्ती को लेकर भी जिन्‍हें तब तक बी ग्रेड सितारा ही माना जाता रहा था और डिस्‍को डांसर से ज्‍यादा उनकी छवि बन नहीं पायी थी। बासु चटर्जी ने अमजद खान, ओम प्रकाश, पंकज कपूर, अनिल कपूर आदि को भी अपनी फिल्‍म में दिलचस्‍प और रोचक किरदारों में प्रस्‍तुत किया। इन कलाकारों के साथ उनकी फिल्‍म ‘चमेली की शादी’ थोड़ी एडल्‍ट कॉमेडी थी, मगर उसका स्‍तर और सभ्‍य माहौल फिल्‍म को कहीं भी गिरने नहीं देता था। इसी तरह की कॉमेडी फिल्‍म ‘शौकीन’ भी थी, जिसमें उत्‍पल दत्त, ए.के. हंगल और अशोक कुमार ने काम किया था। धर्मेन्‍द्र और हेमा मालिनी की फिल्‍म ‘दिल्‍लगी’ को भी इसी श्रेणी की फिल्‍म माना जा सकता है।
बासु चटर्जी की सबसे बड़ी विशेषता, उनका बहुत सहज और अहंकारमुक्‍त होना था। बड़े से बड़े कलाकारों के बीच भी बहुत सम्‍मान से देखे जाने वाले बासु दा सभी से समरस हुआ करते थे। वे सिनेमा के समारोहों और उत्‍सवों में हिस्‍सा लिया करते थे। वे साहित्‍य और सिनेमा विषयों पर देश में आयोजित बड़े सेमिनारों और संवादों में बोला करते थे। ‘सारा आकाश’ और ‘रजनीगंधा’ बनाकर वे इस विषय पर एक फिल्‍मकार के रूप में आधिकारिक वक्‍तव्‍य देने वाले एक विशिष्‍ट फिल्‍म सर्जक माने जाते थे। बासु दा सिनेमा सर्जकों की जिस पीढ़ी और समकालीनता से आते थे, उनमें से बहुत सारे फिल्‍मकार हमारे बीच से जा रहे हैं। यह एक बड़ी क्षति और संकट माना जाना चाहिए क्‍योंकि भारतीय सिनेमा के स्‍वर्णिम समय और युग में बासु दा और उनके जैसे और भी बड़े फिल्‍मकारों और कलाकारों ने जो योगदान दिया है उसे ठीक से रेखांकित करने वाला समय भी दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। इस तरह की क्षतियां हमें विचलित करती हैं, लेकिन यह भी है कि हमारे पास ऐसे सर्जकों के योगदान के पुनरावलोकन की भी इच्‍छाशक्ति या रचनात्‍मक चाह दिखाई नहीं देती।

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