मौजूदा चुनौतियों में बढ़े मदद का दायरा
कोरोना वायरस के चलते न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया में तालाबंदी है। विश्व के सभी देशों की गति पर कोरोना वायरस ने ब्रेक लगा दिया है। एक तरफ महामारी से लोग मर रहे हैं, तो दूसरी तरफ गरीबों को खाने के लाले पड़े हैं। पता चलता है कि मानवता को कई ऐसे हाथों की जरूरत है जो उनकी मदद के लिए आगे आए। ऐसे में रमजान का पवित्र महीना बेहद प्रासंगिक नजर आ रहा है।
दरअसल, रमजान अरबिक कैलेंडर का नौवां महीना है इसलिए रोजा रखने वाले इस महीने को रमजान कहा गया है। इस्लाम में रमजान के बारे में दी गई शिक्षा प्रेरक है। यह महीना इतना पवित्र है कि इसमें इनसान पाप करने से कोसों दूर रहता है। यह महीना पूरी दुनिया के लिए अमन व भाईचारे का पैगाम लाता है। यह महीना सबके लिए शांति का पैगाम लेकर आता है। इस माह के हवाले से इनसानियत को कायम करने का संदेश दिया जाता है।
रमजान लोगों के साथ प्यार बांटने और उनके दुख-दर्द में शिरकत करने का महीना है। पैगम्बर मुहम्मद साहब तो हमेशा ही गरीबों और भूखों के हिमायती रहे हैं, लेकिन रमजान के माह में गरीबों और भूखों के प्रति उनकी फिक्र और ज्यादा बढ़ जाया करती थी। यही कारण है कि रमजान में गरीबों पर खास तवज्जो दी जाती है। रमजान में जकात (साल भर की कमाई पर ढाई फीसद) के जरिये गरीबों को मदद पहुंचाने की अवधारणा इसी फिक्र का एक पहलू है।
दरअसल, अब तक केवल गरीब मुस्लिमों के लिए ही जकात निकाला जाता रहा है। लेकिन, अब इसका दायरा बढ़ाकर इसमें मुस्लिमों के साथ दूसरे मजहब के गरीब तबकों तक भी जकात का पैसा पहुंचाने की जरूरत है। मौजूदा लॉकडाउन में गरीब और प्रवासी मजदूरों का पोषण सबसे बड़ी समस्या के रूप में उभरा है। ऐसे में रमजान की अवधारणा का न केवल इसमें प्रयोग करना है, बल्कि कुछ रवायतों से तब्दीली भी लाने की जरूरत है। मौजूदा हालात को देखते हुए जकात का दायरा तो बढ़ाना है ही, इसमें इजाफा करने की भी जरूरत है। साल भर की कमाई में से ढाई फीसद के नियम में तब्दीली लाकर इसे बढ़ाकर पांच फीसद तक लाने की जरूरत है ताकि अधिकतम लोगों तक पहुंचा जा सके। हालांकि, इसमें कई लोग आगे आकर ऐसा कर भी रहे हैं। कर्नाटक के कोलार में रहने वाले दो भाइयों मुजम्मिल और तजम्मुल ने गरीबों को खाना खिलाने के लिए 25 लाख की अपनी जमीन बेच दी।
रमजान में अमूमन लोग इफ्तार पार्टी करते हैं। इस पार्टी में सैकड़ों और हजारों लोगों को दावत दी जाती है और लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। लेकिन, कोरोना वायरस और लॉकडाउन के चलते इस साल इफ्तार पार्टी मुमकिन नहीं हो सकेगी। लिहाजा, इससे बचने वाली राशि का इस्तेमाल भी गरीबों की मदद में दिल खोलकर करने की जरूरत है। कई मुस्लिम संगठन लगातार इस बात की अपील कर रहे हैं कि इस रमजान में फिजूल की शॉपिंग से बचे। हालांकि, लॉकडाउन के चलते किसी भी तरह की शॉपिंग मुश्किल ही जान पड़ती है। ऐसे में इन तमाम बचतों का इस्तेमाल गरीब और प्रवासी मजदूरों के पोषण में किया जा सकता है। कोई भी रवायत या नियम हमेशा के लिए नहीं बनते। वक्त के साथ इसमें बदलाव लाने की जरूरत है। वक्त की मांग है कि मजहब से परे हटकर रमजान में जकातों का वितरण किया जाए।
मुस्लिम समुदाय का हर वो शख्स जिन पर जकात देना फर्ज है, अगर जकात को पूरी तत्परता के साथ अदा करने की ठान लेते हैं तो इससे सरकार की कई सारी परेशानियां कम हो सकती हैं। मौजूदा वक्त में सरकार के सामने गरीब और मजदूर वर्ग के देखभाल की बड़ी चुनौती है। ऐसे में अगर आमजन बड़ी तादाद में सहयोग का हाथ बढ़ाए तो, सरकार के लिए यह बड़ी राहत की बात होगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि अब तक जकात का फायदा मुस्लिमों को ही मिलता रहा है और इसकी बड़ी वजह है कि मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा वर्ग निर्धनता के दुष्चक्र में फंसा हुआ है। लेकिन, लॉकडाउन की मार के चलते सभी धर्मों के मजदूर और गरीब वर्ग राशन-पानी की समस्या से दो-चार हो रहे हैं। ऐसे में मदद और परस्पर सहयोग की अवधारणा का प्रयोग करते हुए रमजान को प्रासंगिक बनाने की जरूरत है।
इससे इतर, हम सभी जानते हैं कि रमजान में खूब इबादत की जाती है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी रमजान में खूब इबादत करने की बात कही है ताकि ईद आने से पहले ही इस व्यापक महामारी का अंत हो जाए। अब तक कोरोना का कोई सटीक ईलाज नहीं मिलने से लोग धार्मिक कार्यों—पूजा-पाठ, नमाज की ओर भी रुख कर रहे हैं। लिहाजा, इस मामले में भी रमजान प्रासंगिक नजर आ रहा है। सामाजिक और धार्मिक सौहार्द के लिए तो यह महीना हमेशा ही प्रासंगिक रहा है। लेकिन, लॉकडाउन के बावजूद यह पवित्र महीना कम प्रासंगिक नहीं है।
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