कोरोना को दावत देने में जुटे शराबी
शमीम शर्मा
पता नहीं दारू सरकार की लाइफ लाइन है या जनता की। यूं लगता है कि सरकार ने हर दारूबाज के कान में कह दिया है :-
उठो प्यारे अब आंखें खोलो
ठेके खुल गये गिलास धो लो।
तो क्या यह मान लिया जाये कि देश इन शराबियों के सहारे ही चल रहा है। पियक्कड़ नौजवान बोतलों के लिए लाइन में खड़े डंडे खाने को तैयार हैं और कोरोना को दावत देने में जुट गये हैं। जिनके पास खाने को राशन नहीं था बेचारे पीने पर मजबूर हो गये। बोतलधारी कोरोना को सिंहासन पर बिठाकर ही दम लेंगे। एक-एक कोने से आवाज़ आ रही है—अरे दीवानों सिर्फ बोतलें ही लाना, कोरोना मत ले आना। पर दूरदर्शी कहते हैं कि जैसे एक के साथ एक फ्री आइटम मिलती है, वैसे ही बोतलों के साथ कोविड-19 का कीटाणु भी आयेगा और जान की जोखिम को भी बढ़ायेगा।
घरों में तपस्या करते लोगों की 40-45 दिनों की मेहनत पर शराब ने पानी फेर दिया और सबके लिए संकट के दरवाजे खोल दिये।
मेराज फैजाबादी का एक शे’र दिमाग में गोते लगा रहा है :-
मैकदे में किसने कितनी पी खुदा जाने मगर,
मैकदा तो मेरी बस्ती के कई घर पी गया।
दुनिया के बड़े-बड़े देश तो कोरोना की दवा ढूंढ़ने में लगे हैं और हमारे नौजवान दारू के ठेके खुलवाने की जुगत में। क्या कमाल की बात है कि दारू की दुकान को दुकान नहीं कहते, ठेका कहते हैं। तो मुझे इसका यही कारण लगता है कि दुनिया के सभी पेय पदार्थों में से दारू ने ही आदमी का ठिकाने लगाने का और सरकार चलाने का ठेका ले रखा है।
मतलब यही निकलता है न कि देश की अर्थव्यवस्था पियक्कड़ों के हाथों में है। बेचारे अपना घर लुटाकर देश को बचा रहे हैं। लगता है आरबीआई गवर्नर को भी कहना ही पड़ेगा कि दो-तीन क्वार्टर में अर्थव्यवस्था पटरी पर आने की संभावनायें बलवती हो रही हैं। सोशल डिस्टेंसिंग की सारी हिदायतों को दरकिनार कर बोतलों ने सबको करीब ला दिया है। कोरोना के भी करीब।
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एक बर की बात है अक रामप्यारी कै कसूती खांसी होगी तो पड़ोस का छोरा नत्थ किसी काम तै शहर जावै था। रामप्यारी बोल्ली—बेट्टा! मेरे खात्तर खांसी की दुआई भी ला दिये। नत्थू नैं दुआई की जगहां एक पव्वा ल्या कै ताई के हाथ मैं पकड़ा दिया। आगले दिन रामप्यारी बोल्ली— रै बेट्टा! खांसी डिगी तो कोनीं। नत्थू बोल्या—तेरी खांसी का तो बेरा नीं पर इस दुआई तै तो सारी धरती डिग ज्यै है।
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