एकदा
कर्मफल के सुख-दुख
एक व्यक्ति ने मुनि से पूछा—कृपया यह बताएं कि जिन्दगी क्या है तथा हम सब (जीव) कौन हैं? मुनि ने कहा—वत्स! जिन्दगी एक जेल है तथा हम सब सजायाफ्ता कैदी के समान हैं। मुनि की बातें सुन उस व्यक्ति को आश्चर्य हुआ। मुनि ने कहा—जिस प्रकार वर्तमान विधि व्यवस्था को कायम रखने के लिए कलियुग में भी जेलों का निर्माण किया गया है और जिस प्रकार सब सजायाफ्ता कैदियों को उनके अपराध के अनुरूप एक निश्चित समय तक जेलों में रखा जाता है। ठीक उसी प्रकार भगवान भी सभी अपराधियों को उनके अपराध के अनुरूप एक निश्चित समय तक नजरबंद रखने लिए उन्हें जीवन प्रदान करते हैं। उस व्यक्ति ने मुनि से पूछा—आपके अनुसार जिन्दगी एक जेल है, फिर कुछ मनुष्य बड़े ही मौज व सुख-सुविधाओं से जीवनयापन कर रहे हैं। जबकि वर्तमान विधि व्यवस्था में बनी जेलों में कैदियों को आराम व सुख-सुविधाओं से वंचित होकर रहना पड़ता है। फिर आप जिन्दगी को जेल की संज्ञा कैसे दे सकते हैं? मुनि ने कहा—वत्स, तुम्हारी यह धारणा तथ्यों से परे है कि मनुष्यों द्वारा बनाई गयीं जेलों में सभी कैदियों को सुख-सुविधाओं से वंचित होकर रहना पड़ता है। वास्तव में हमारी सरकार कैदियों के अपराध को मद्देनजर रखते हुए उन्हें सुख-सुविधा से वंचित करती है। ठीक उसी प्रकार भगवान भी सभी जीवों के कर्म को देखते हुए उसे यथोचित सुख-सुविधा से अभिभूत करते हुए जीवन प्रदान करते हैं।
प्रस्तुति : शशि सिंघल
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