जहान के लिए जान जोखिम डालने के मायने
वैश्विक महामारी कोरोना के विरुद्ध जंग में लॉकडाउन समेत तमाम कदमों के लिए 3 मई तक विकसित देश भी जिस भारत सरकार और समाज की प्रशंसा कर रहे थे, वे अब यहां शराब की दुकानों के आगे लगी लंबी कतारों तथा सरकारों में शराब और पेट्रोल-डीजल पर बेतहाशा शुल्क लगाने की होड़ देख कर क्या सोच रहे होंगे? अब जबकि कोरोना के मरीज और उससे मौतों के आंकड़े तेजी से बढ़ रहे हैं, केंद्र से लेकर राज्य सरकारों तक के सरोकार लॉकडाउन-3 में दी गयी छूटों को राजस्व-वृद्धि की लूट में तब्दील करने तक सिमटते नजर आ रहे हैं। जान है तो जहान है के नारे के साथ 24 मार्च की रात से 14 अप्रैल तक लॉकडाउन का ऐलान करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था : जो जहां है, वहीं रहे। वैसा ही हुआ भी। लाखों की संख्या में लोग देश भर के अलग-अलग हिस्सों में फंस कर रह गये। वह भी तब जबकि खाने-पीने तक के जरूरी सामानों की दुकानें भी बंद थीं। इन लोगों ने जैसे-तैसे लॉकडाउन का पहला चरण काटा तो 14 अप्रैल को उसे फिर 3 मई तक के लिए बढ़ा दिया गया। इस बीच देश के विभिन्न हिस्सों से प्रवासी मजदूरों-छात्रों द्वारा अपने घर पहुंचने की कवायद की खबरें आती रहीं।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दिल्ली में जमा हो गये अपने राज्य के प्रवासी मजदूरों की वापसी के लिए हरियाणा से रोडवेज बसें मांगने के बाद राजस्थान के कोटा से भी अपने राज्य के छात्रों को वापस लाने का इंतजाम किया। उनसे सबक लेकर कुछ अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी ऐसी पहल की तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार इसे लॉकडाउन की मर्यादा का उल्लंघन बताते रहे। हालांकि खुद को ‘सुशासन बाबू’ कहलवाना पसंद करने वाले नीतिश के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं कि फिर सहयोगी दल भाजपा के विधायक समेत प्रभावी लोगों को अपने बच्चों को लाने के लिए विशेष पास क्यों जारी किये गये? घटते राजस्व से चिंतित राज्य सरकारों और बंद उद्योगों का दबाव लॉकडाउन के दूसरे चरण के अंत में, साफ नजर आने लगा था। शायद तभी जान है तो जहान है बताने वाले प्रधानमंत्री ने भी कहा : जान भी, जहान भी। बेशक उनका कथन गलत नहीं था। कोरोना का कहर शुरू भले ही चीन से हुआ हो, पर आज उससे सबसे ज्यादा प्रभावित-पीड़ित देश अमेरिका है। विश्व की महाशक्ति माने जानेवाले अमेरिका को भी अंतत: लॉकडाउन से बाहर निकलने की कवायद करनी पड़ी। हैरत की बात यह भी है कि ऐसे विकसित और संपन्न देश में लॉकडाउन खोलने की मांग को लेकर लोग सड़कों पर निकल आये, और चिकित्सा विशेषज्ञों की चेतावनी के उलट खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लॉकडाउन खोलने की मांग का समर्थन करते नजर आये।
अब जरा अमेरिका के इस उदाहरण के मद्देनजर भारत में 25 मार्च से 3 मई तक के लंबे लॉकडाउन को देखिए-समझिए। असुरक्षा-अनिश्चितता से आतंकित प्रवासी मजदूरों तथा अनावश्यक घूमने वाले कुछ सिरफिरों के अलावा ज्यादातर भारतीयों ने इसे जीवन-मरण का प्रश्न मानते हुए पूरी आस्था के साथ लॉकडाउन का पालन किया, क्योंकि उन्हें बताया गया कि सामाजिक दूरी तथा लगातार हाथ धोने के अलावा कोरोना से बचाव का फिलहाल कोई और उपाय नहीं है, लेकिन 3 मई के बाद जान भी, जहान भी के तर्क के सहारे जिस तरह अपेक्षित सीमित रियायतें लगभग अराजकता में बदलती दिख रही है, वह तो कोरोना से जंग लड़ रहे जांबाजों से लेकर आम आदमी तक के त्याग-तपस्या को ही खतरे में डाल सकती है। लॉकडाउन के तीसरे चरण में दवाओं और दैनिक उपभोक्ता वस्तुओं समेत अन्य जरूरी चीजों की दुकानें-सेवाएं शुरू होना तो समझ में आता है, लेकिन शराब की दुकानें खोलने से तो जहान की खातिर जान खतरे में पड़ती नजर आ रही है। जो जहां है, वहीं रहे के मूल में सामाजिक दूरी ही थी, ताकि कोरोना संक्रमण रोका जा सके। इसी तर्क के सहारे लाखों प्रवासी मजदूरों को मानवता के बचाव के लिए लॉकडाउन के कष्ट झेलने को कहा गया था, लेकिन छूट के बाद शराब की दुकानों पर जिस तरह भीड़ उमड़ रही है, उसमें सामाजिक दूरी कहां है?
लॉकडाउन के पहले दो चरणों में दूध-फल-सब्जी और किराना की दुकानें चंद घंटे के लिए ही खुलती थीं, लेकिन कभी उन पर ऐसी भीड़ नहीं दिखी, जैसी अब शराब की दुकानों पर दिख रही है। शराब खरीदने के लिए दो-तीन किलोमीटर लंबी कतारें तो शराब पीने के लिए बदनाम देशों में भी कभी नहीं देखी गयीं। निश्चय ही यह हमारे सामाजिक संस्कारों पर एक बड़ा सवाल है, लेकिन कोरोना खतरे के मद्देनजर सरकार ने इस समस्या का क्या समाधान निकाला? स्वाभाविक ही सरकार सामाजिक दूरी को धता बता कर कोरोना संक्रमण को आमंत्रण दे रही शराब की दुकानों को बंद करने का फैसला कर सकती है, लेकिन राज्य सरकारों को इस छूट को राजस्व कमाई की लूट में तब्दील करना बेहतर लगा। क्या इसका अर्थ यह भी नहीं निकलता कि जहान की चिंता जान से ज्यादा है? देश में ज्यादातर राज्य सरकारों ने शराब पर भारी-भरकम कोरोना शुल्क लगाने का विकल्प चुना। आंध्र प्रदेश ने 75 प्रतिशत तक दाम बढ़ा दिये तो मद्य निषेध के पैरोकार अन्ना हजारे के शिष्य दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 70 प्रतिशत। तेलंगाना में यह वृद्धि 50 प्रतिशत है। पंजाब और छत्तीसगढ़ सरकारों ने भीड़ से बचने का उपाय शराब की होम डिलीवरी में खोजा है। जाहिर है, होम डिलीवरी की कीमत अलग देनी पड़ेगी। हरियाणा में तो और भी चमत्कार हुआ : तमाम जगह ठेके खुलने से पहले ही लॉकडाउन में शराब खत्म हो गयी। इसमें दो राय नहीं कि लॉकडाउन के चलते खासकर राज्य सरकारों के ज्यादातर राजस्व स्रोत सूख गये। कोरोना से जंग के खर्चों का बोझ खजाने पर बढ़ा सो अलग । ऐसे में कई राज्यों के लिए तो अपने कर्मचारियों को वेतन देना भी मुश्किल हो गया। बेशक शराब पर कोरोना शुल्क लगा कर राज्य सरकारें राजस्व घाटे की भरपाई का आसान और कारगर रास्ता अपना रही हैं, लेकिन सामाजिक दूरी को धता बता कर दुकानों पर उमड़ती भीड़ से कोरोना संक्रमण बढ़ने के खतरे की कीमत को नजरअंदाज करना देश-समाज के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
दरअसल शासन तंत्र और व्यवस्था चलाने के लिए राजस्व तो चाहिए ही, लेकिन हर समय की कुछ प्राथमिकताएं होती हैं। सही समय पर सही प्राथमिकताएं ही किसी शासन की वास्तविक कसौटी होती हैं। पिछले महीने तक, प्रधानमंत्री की तरह, लॉकडाउन को ही कोरोना से बचाव का एकमात्र तरीका बताने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अब बता रहे हैं कि हमें कोरोना के साथ जीने की आदत डालनी होगी। कोरोना की वैक्सीन बनने तक शायद यही सच भी हो, पर राजस्व घाटे की भरपाई के लिए कुछ सप्ताह और इंतजार नहीं किया जा सकता था? लॉकडाउन के पहले दो चरणों में समाज को जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशीलता का पाठ पढ़ाने वाली सरकारें खुद तीसरे चरण में जिस तरह आम आदमी के दोहन को उतावली दिख रही हैं, उससे उनकी छवि निखरती तो नहीं। आम नागरिकों-व्यापारियों-उद्योगपतियों को नसीहत दी जाती है कि लॉकडाउन पीरियड में बिना काम के भी अपने कर्मियों को पूरा वेतन दें, लेकिन जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें रसातल को चली गयी हैं, तब केंद्र से लेकर राज्य सरकारों तक में पेट्रोल-डीजल पर दुनिया में सर्वाधिक कर लगा कर अपना खजाना भरने की होड़ लगी है। सरकारों का यह आचरण न तो भारतीय जीवन दर्शन के अनुरूप है और न ही जिम्मेदार-जवाबदेह लोकतंत्र की भावना के।
journalistrksingh@gmail.com
The post जहान के लिए जान जोखिम डालने के मायने appeared first on दैनिक ट्रिब्यून.
from दैनिक ट्रिब्यून https://ift.tt/2yAIQnR
via Latest News in Hindi

0 Comments