दो पल उजाले में खुद को भुला लो
विशिष्ट लोगों के जीवन में उन्हें पूर्व आभास हो जाता है कि वह अब इस दुनिया में अपना रोल अदा कर परलोक जा रहे हैं। उनकी कृति में वह परिलक्षित होता, जिसकी उम्मीद न उनको होती है न ही उनके परिवारजन और प्रशंसकों को।
जोधपुर की वरिष्ठ कवयित्री, प्रगतिशील विचारक और हिंदी भाषा की प्रोफेसर डॉ. सावित्री डागा का लंबी बीमारी के बाद गत अप्रैल 13 को निधन हो गया। कोरोना वायरस में लॉकडाउन के चलते उनकी अंतिम यात्रा परिवारजनों ने ही सम्पन्न कराई।
सावित्री की एक कविता के अंश :-
ए दुनियां अब तुझे प्रणाम/ अच्छी है तू अच्छी रहना/ कभी बुराई को मत सहना/ कठिन लगे चाहे ऐसा काम! कोई मेरा खास नहीं है/ खास जो था, अब पास नहीं है/ पास खड़ा है राम का नाम! तूने मुझ को कैसे झेला/ जीवन तुझ संग कैसे खेला/ बड़ा विकट था सारा काम! जाती हूं फिर आऊंगी मैं/ बेहतर तुझे बनाऊंगी मैं/ अभी अधूरा मेरा काम! ऐ दुनियां! अब तुझे प्रणाम।
लेखिका ने सरल और मौलिक अंदाज में जब यह कविता लिखी थी, तो हम में से किसी ने सोचा भी नहीं होगा इसमें छुपा जिंदगी का रहस्य है।
राजस्थान साहित्य अकादमी प्रदत्त कविता के सर्वोच्च सुधींद्र पुरस्कार-1977, विशिष्ट साहित्यकार सम्मान-1984, पंडित जनार्दन राय नागर सम्मान-2013 से सम्मानित डॉ. सावित्री की अद्यतन 35 पुस्तकें (मूल और संपादित) प्रकाशित हैं। लेखिका का जन्म 10 मार्च, 1938 को बीकानेर में हुआ था, मगर अध्ययन और साहित्य सेवा जोधपुर से ही हुई थी।
लेखिका के संग्रहों में आधे संसार की आत्मकथा, उगाळी री उडीक, अग्निकुसुम, बूंद-बूंद में सागर, संदर्भों से कटे हुए, क्या फर्क पड़ता है, ये गीत कोई और गुनगुनायेंगे, एक प्यास जिंदगी, आस्था के शिला लेख, मुक्तावली, समय में हम, सपनों का पिंजरा, शताब्दी की सरहद पर, अंत:सलिला, सार्थकता की तलाश, आधुनिक हिंदी मुक्तक काव्य में नारी और तुम्हारे जाने के बाद बहुत चर्चित रहे।
डॉ. सावित्री और उनके पति स्व. डॉ. मदन डागा जो स्वयं जाने-माने साहित्यकार थे। उन्होंने मुझे और अन्य नवांकुर लेखकों के लेखन को सराहा और प्रोत्साहित भी किया।
हम सब इस कोरोना वायरस से मुकाबला करते हुए अप्रैल 9 की रात को 9 बजे 9 मिनट के लिए घर के अहाते में दीपक की लौ प्रज्वलित कर रहे थे और इस लेखिका ने वर्षों पहले ही लिख दिया था आज के समय पर :-
जला लो दीये, चाहे घर जगमगा लो/ यों दो पल उजाले में खुद को भुला लो/ न इस रोशनी से वो तम छिप सकेगा/ जो तम जिंदगी में बसे जा रहा है! जो सोया हुआ हो तो उसको जगाएं/ यहां हर जगा दृग मुंदे जा रहा है! अंधेरा कहीं हो दीया भी जलाएं!
काव्य-संसार के अलावा सावित्री ने अपने पति की स्मृति में राज्य सरकार की सहमति से सरदारपुरा पार्क स्थित पार्क में सरकारी पुस्तकालय की ऊपरी मंजिल पर ‘मदन डागा साहित्य भवन’ का निर्माण कराया और महिला रचनाकारों के लिए ‘संभावना’ साहित्य संस्था की स्थापना की थी। उनकी इन्हीं स्मृतियों को याद करते हुए उनकी ये कविता बहुत हिम्मत देती है :-
आंसू जो बहता है/ अपने ही दुखड़े पर/ वह सच्चा आंसू नहीं/ बस खारा पानी है/ आंसू जो टपका है/ अपनों के दुखड़ों पर, वह आंसू पानी से मोती बन जाता है…/ वह आंसू अमृत की बूंदें बन ढलता है/ धरती के प्रांगण में/ मानवता के मन में/ अमृत की बेली बन शाश्वत हो फलता है!
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