परमात्मा भली करेंगे
कहानी
सुशील कुमार फुल्ल
जब कोई भी शशि की बात मानने को तैयार नहीं हुआ तो राजा राम ने शिमला में तैनात अपने एक पुराने दोस्त को फोन किया कि वह कोई जुगाड़ बिठाकर उसकी सहायता करे।
भुवनेश्वर ने कहा—मैं कोशिश करता हूं। वैसे कर्फ्यू में कोई कहीं जा नहीं सकता।
‘भाई, मैं मानता हूं लेकिन मेरी भी समस्या समझो। शशि रातभर ठण्ड में बाहर बैठी ठिठुरती रहे और मैं अन्दर कमरे में सोया रहूं। अस्पताल वाले उसे अन्दर भी नहीं रहने देते। और गांव वह जा नहीं सकती। कोई वाहन ही नहीं चलता।’ राजा राम ने कहा।
भुवनेश्वर इधर-उधर फोन घुमाता रहा। अन्ततः उसे लगा कि बात बन सकती है। उस ने राजा राम को फोन किया—देखो, मैंने सब स्रोतों से पता कर लिया। केवल रोगी को ले जा रही एम्बुलेंस में ही शशि जा सकेगी। इसके लिए एमएस से मिलो। मैं यहां से भी उसे फोन करवाता है।
राजा राम की जान में जान आई। वह एमएस से मिला और सारी स्थिति बताई।
एमएस ने कहा—एम्बुलेंस केवल मरीजों के लिए होती है, सवारियां ढोने के लिए नहीं। आपने यह सोच भी कैसे लिया। आज कल तो वैसे ही इतनी एमरजेंसी है।
‘तो क्या करें सर?’
‘सर पटको या कर्फ्यू खुलने का इन्तजार करो।’ बड़ी बेरुखी से उसने कहा।
राजा राम को लगा उसे सैकड़ों घमौरियां लड़ गई हों।
***
‘आप तुरन्त बाहर चलो। अब यहां कोई नहीं रुक सकता।’ अस्पताल के एक अधिकारी ने कहा।
‘क्यों? मेरा भाई यहां एमरजेंसी में एडमिट है।’ शशि ने अनुनय-विनय के स्वर में कहा।
‘और भी है कोई साथ?’
‘जी, मेरे पिता हैं।’ लड़की ने बिना किसी बात को छिपाए कहा।
‘तो बस एक ही तीमारदार रह सकता है। आप बाहर जाओ।’ वह बोला।
वह सुनने को ही तैयार नहीं था। एकदम ठण्डी रात। वह अस्पताल के गेट पर आ गई। पुलिस का पहरा था। उसे किंचित संकोच हुआ परन्तु वह वहां खड़ी रही। रात के नौ बजे जाती भी कहां। कर्फ्यू लगा हुआ था। एक पुलिस वाले ने देखा और कहा— चलो, चलो। यहां मत ठहरो। खामखा हम पर गाज गिरेगी। साहिब आने वाले हैं।
‘इतनी रात में मैं कहां जाऊं?’ वह गिड़गिड़ाई।
उस पुलिस वाले को दया आई। सचमुच, बेचारी कहां जाएगी। कर्फ्यू लगा है। जवान लड़की है। बोला—बेटी आप थोड़ी देर के लिए गेट से बाहर बैठ लो। साहिब आकर चले जाएंगे। फिर आप गेट के अन्दर आ जाना।
‘बहुत धन्यवाद।’ शशि ने कहा और वह थोड़ा आश्वस्त हो गई। जानती थी कि एक कोरोना रोगी की आज यहां मृत्यु हो गई थी और सारे हलचल मच गई थी। इतना शान्त सुशील प्रदेश, फिर भी हादसा हो गया। वास्तव में वह रोगी अमेरिका से आया था और किसी तरह चालाकी से दिल्ली एयरपोर्ट से निकल आया था। फिर कुछ दिन चुपचाप घर में पड़ा रहा और जब उसे श्वास की समस्या बढ़ गई तो अस्पताल में भर्ती हुआ परन्तु बहुत देर हो चुकी थी।
ग्यारह बजे रात को साहिब अपनी तसल्ली करके धर्मशाला के लिए रवाना हो गए। उसके बाद उस पुलिसकर्मी ने संकेत करके शशि को अन्दर बुला लिया और गेट केबिन में बैठने दिया।
***
वह अभी अस्पताल से निकलने का प्रयत्न कर ही रही थी कि आकाशवाणी पर खबर आ गई थी कि पूरे प्रदेश में कर्फ्यू लगा दिया गया था। उसका भाई अभी एमरजेंसी वार्ड में ही एडमिट था। उसके पिता भी बरसालपुर से उसके साथ ही आ गए थे।
दरअसल, दुर्घटना की खबर सुनते ही राजा राम ने अपनी बेटी को फोन किया था कि यदि वह भी साथ चल सके तो बेहतर होगा क्योंकि वह लैब टेक्निशियन का कोर्स कर रही थी और अस्पताल में सहायक हो सकती थी।
राधेश धर्मशाला की एक कम्पनी में मार्केटिंग का काम करता था उसका काम था फील्ड में चले रहना। पहले बी.टेक. की डिग्री ली और बड़ा जोर लगाया कि कोई नौकरी मिल जाए परन्तु कहीं भी कोई बात बनी नहीं। एक दो साल वह प्रयत्न करता रहा परन्तु कोई भी उसे सात हजार रुपये मासिक देने को तैयार नहीं था। इतनी मेहनत की और इतना पैसा भी खर्च किया लेकिन सब व्यर्थ। एक जगह वह इंटरव्यू देने गया तो उसे यह देखकर हैरानी हुई कि उस कालेज का गेटकीपर भी बी.टेक. डिग्री धारी था। शिक्षा का इतना बुरा हाल। उसके अपने बैच का भी केवल एक ही लड़का कोई ढंग की नौकरी ले पाया था और वह भी इसलिए कि कम्पनी का मालिक उसका दूरपार का रिश्तेदार था।
राधेश ने केन्द्रीय विश्वविद्यालय में जब बी.टेक. में प्रवेश के लिए प्रार्थनापत्र दिया तो उस के पिता ने कहा भी था—कोई ऐसा फील्ड देखना जिसकी मांग भी हो।
‘पिता जी, आप को क्या पता? आप पुराने जमाने के लोग हैं। हमें अपने पंखों पर उन्मुक्त विचरण करने दो।’ राधेश ने कहा था।
राजा राम चुप हो गया था। उसका कर्तव्य तो उसे आगाह करना मात्र था।
देश में नई सरकार आई थी और वह शिक्षा नीति को आमूलचूल बदल देना चाहती थी। पाठ्यक्रम तो अपने हिसाब से बदलने शुरू किए ही, साथ ही शिक्षा का निजीकरण भी शुरू कर दिया। विधायकों, मंत्रियों, सांसदों ने अपनी यूनिवर्सिटियां खोल दीं और धड़ाधड़ पैसा बनाना शुरू कर दिया। नए कोर्सों की बाढ़-सी आ गई और छात्र विज्ञापन की चकाचौंध में भ्रमित हो गए। भेड़चाल में अपना करिअर चुनने लगे। एग्रीकल्चर में जाने लगे तो सब एग्रीकल्चर में पढ़ने चले गए। एकाध साल नौकरियां मिलीं, फिर सेचुरेशन हो गई और एग्रीकल्चर ग्रेजुएट मूंगफली बेचने लगे। ऐसे ही इंजीनियरिंग में जाने लगे तो वहां भी बाढ़ आ गई। और दस बारह वर्ष बेकार बैठने की नौबत आ गई। पांच-सात हजार में कोई लगने को तैयार नहीं होता था।
राधेश ने समय गंवाए बिना एमबीए भी कर ली और एक निजी कम्पनी में सात हजार महीने की नौकरी पर लग गया। मोटरसाइकिल पिता ने ले दिया था परन्तु पेट्रोल कम्पनी दे देती थी। सो दौड़ा रहता।
इस बार बारिश हटने का नाम ही नहीं ले रही थी और देहरा के आसपास कीचड़ होने की वजह से दोपहिया वाहन वालों को खासकर परेशानी हो रही थी। राधेश के किसी दोस्त की शादी थी। इसलिए उसने सोचा कि जल्दी-जल्दी काम पूरा कर ले फिर वह बारात में शामिल हो लेगा। निजी कम्पनियों को तो टारगेट पूरा चाहिए फिर कर्मचारी भाड़ में जाना चाहे तो चला जाए। इसी भागदौड़ में उसका मोटरसाइकिल किसी पैदल यात्री को बचाते-बचाते बस से टकराते-टकराते बचता हुआ फिसलकर नाली में जा गिरा। परमात्मा का लाख शुक्र कि वह बस के नीचे नहीं आ गया। उसे घुटने में फ्रैक्चर हुआ और थोड़ा जबड़ा हिल गया।
वह सड़क पर पड़ा तड़प रहा था। किसी भद्रपुरुष ने 108 नंबर एम्बुलेंस को फोन किया और वह पन्द्रह मिनट के भीतर पहुंच भी गई। राधेश ने मन ही मन फोन करने वाले व्यक्ति को नमन किया और उस महापुरुष का धन्यवाद किया, जिसने इस 108 नम्बर एम्बुलेंस की नि:शुल्क सेवा की परिकल्पना की थी, नहीं तो बहुत से लोग सड़क पर ही दम तोड़ देते थे।
उसे काफी चोट लगी थी और वह बेहोश होता जा रहा था परन्तु समय पर क्षेत्र के बड़े अस्पताल के आपातवार्ड में पहुंच गया था। वहां पहुंचते ही वह बेहोश हो गया था।
राजा राम को फोन पहुंचा तो वह अपनी बेटी को लेकर टांडा मेडिकल कालेज अस्पताल में पहुंच गया था।
अस्पताल में ज्यादा रोगी नहीं थे लेकिन स्टाफ सब मुस्तैद था। कोरोना वायरस की तलवार हवा में लटकी हुई थी। जल्दी ही राधेश के घुटने का आपरेशन करके उस पर पलस्तर चढ़ा दिया गया था। लेकिन अभी उसे अस्पताल में ही रहना था।
डाक्टर उसे देखने आया तो उसने कहा—राधेश मुझे आप के जबड़े में भी फर्क लगता है। आपको नहीं महसूस होता कि कोई गड़बड़ है?
‘सर लगता तो है परन्तु अभी मेरा ध्यान घुटने में ही था।’
लगता है तुम्हारे जबड़े का भी छोटा-सा आपरेशन करना पड़ेगा। लेकिन अभी कुछ दिन बाद।
‘सर, जैसा आप ठीक समझें।’
चिड़ियों की चहचहाहट अन्दर भी सुनाई दे रही थी। आमतौर पर यहां रोगियों का रोना-धोना ही सुनाई देता था। अब वातावरण में मरघट-सी शान्ति थी।
***
‘यह तो मुसीबत खड़ी हो गई।’ शशि ने अपने पिता से कहा।
‘तो तुम निकल जाओ। मैं तो राधेश को छुट्टी मिलने पर ही गांव लौट सकूंगा। शायद अभी भारत में एमरजेंसी न हो। यहां तो अभी इतने केस नहीं आ रहे।’ राजा राम ने कहा।
‘लेकिन पापा, कोरोना के केस दुनिया में जितनी जल्दी से बढ़ रहे हैं वह विचार डराने वाला है। आप कहें तो मैं बसरसालपुर चली जाती हूं। मां भी वहां अकेली है और फिर पशुओं का चारा पानी भी करना होता है, उसे दिक्कत होती होगी।’ शशि ने कहा।
‘ठीक है तुम कल चले जाना। आज का दिन और देख लेते हैं कि डाक्टर क्या कहते हैं।’
‘ठीक है पापा, जैसा आप उचित समझो।’ शशि ने सहज भाव से कहा।
अगले दिन वह अपना बैग लेकर जाने लगी तो रेडियो पर उद्घोषणा हो रही थी कि सारे हिमाचल में कर्फ्यू लगा दिया गया है। कोई बाहर नहीं निकल सकता। लोग 31 मार्च तक अपने अपने घरों में ही रहें।
शशि ने गेटकीपर से पूछा—क्या मैं अपने गांव नहीं जा सकती?
‘नहीं। कोई नहीं जा सकता। बसें तथा अन्य सभी वाहन बन्द हो गए हैं। कोई पैदल भी नहीं जा सकता। अब तो तुम्हें यहीं रहना पड़ेगा।’
वह अपना बैग लेकर अस्पताल के आंगन में एक बैंच पर बैठ गई। उसे लगा सारे विश्व में कोरोना ने कर्फ्यू लगा दिया था। इनसान वायरस के आगे कितना बौना हो गया था। बड़ी-बड़ी राक्षसी ढींगे मारने वाला एटमी मानव कितना बेबस दिखाई दे रहा था।
अचानक कहीं अटक जाना, छटपटाहट को कितना बढ़ा देता है, यह तो कोई शशि से ही पूछे।
स्वप्नों में खोई शशि को लगा अन्दर से एक एम्बुलेंस बाहर आ रही थी। शायद उसमें उसका भाई और पिता ही हों। वह चढ़ने के लिए उठी लेकिन एम्बुलेंस तो रुकी ही नहीं। चहकती हुई चिड़िया शशि को मुंह चिढ़ा रही थी लेकिन वह फिर किसी एम्बुलेंस के बाहर निकलने की प्रतीक्षा करने लगी।
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