श्रीकृष्ण प्रेम की सरस अभिव्यक्ति
सरस्वती रमेश
श्रीकृष्ण के प्रेम में न जाने कितनी स्त्रियों को जोगन बना दिया और न जाने कितनों को कवयित्री। श्रीकृष्ण के प्रेम में डूबी ऐसी ही स्त्री किरण मिश्रा ‘स्वयंसिद्धा’ का काव्य संग्रह है ‘परिणीता प्रेम।’ संग्रह की कविताएं श्रीकृष्ण से प्रेम की अभिव्यक्ति है। इन कविताओं से ध्वनि निकलती है कि प्रेम को मानने पर खुद को खोना पड़ता है। अपने अहं, वैभव तथा विलास को त्यागना पड़ता है।
कवयित्री ने श्रीकृष्ण के प्रति सम्पूर्ण समर्पण का इज़हार किया है :-
मेरा मन,मेरा शरीर/ मेरी आत्मा,/ अपने पूरे होशोहवास में/ तुम्हें अर्पित करती हूं।
उनकी अनेक कविताओं में कृष्ण के लिए प्रेम के इस इजहार के साथ ही एक प्रतीक्षा भी है। यह प्रतीक्षा बहुत लंबी प्रतीत होती है। लेकिन यह लंबी प्रतीक्षा उनको उनके प्रेम से डिगा नहीं पाई है।
‘तुम्हारी प्रेम कस्तूरी की तलाश में/ इस बियाबान सहरा रूपी/ मृगतृष्णा में भटकती /पागल हिरनी सी!/ तुम बिन तुम्हारी प्यास लिये/ तुम्हारी तलाश में अस्तित्वविहीन।’
कवयित्री श्रीकृष्ण से बिल्कुल वैसे ही प्रेम करती हैं जैसे कोई भी आम स्त्री अपने प्रेमी से। वो श्रीकृष्ण से मनुहार करती हैं, कभी निवेदन, तो कभी थोड़ी हठ भी। प्रेम में मिलने वाले दर्द को वह सहज भाव से स्वीकार करती हैं और मन में मीत से मिलन की आस संजोए प्रतीक्षा जारी रखती हैं। उनमें व्याकुलता तो है, मगर हताशा नहीं।
कविता की भाषा और शब्दों का चयन प्रभावपूर्ण है। लेकिन भाव कहीं-कहीं रूहानी तो कहीं एकदम साधारण हो गए हैं। कुछ उपमाएं आकर्षित करती हैं।
पुस्तक : परिणीता प्रेम कवयित्री : किरण मिश्रा ‘स्वयंसिद्धा’ प्रकाशक : एम.के. पब्लिकेशंस पृष्ठ : 160 मूल्य : रु. 299.
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