पुस्तक समीक्षा

केवल तिवारी
रोज उपद्रव मचवाती घर में, जब हाथों में आ जाता प्याला… लीवर जलाती, आंत गलाती और शरीर बना देती कंगाल… मुंह से बदबू रहे धधकती, कीड़ों ने तन पर डेरा डाला… कितने संबंध विच्छेद कराये और दुर्दिन दिखाये बैरन हाला।
ये चंद पंक्तियां कवि शैलेंद्र शैल की किताब ‘बैरन हाला शतक’ की हैं। अपनी इस किताब में लेखक ने शराब के कारण जिंदगी के उजड़ने, परिवारों के बिखरने और शरीर के नष्ट होने के प्रति आगाह किया है। शराब की लत वाला एक व्यक्ति कैसे अपने कर्त्तव्य पथ से भटकते हुए नशे के जाल में फंसता चला जाता है, इसका बेहद ‘जीवंत’ चित्रण कवि ने किया है। आज कई जगह शराब को स्टेटस सिंबल समझने की भूल करने वालों को आगाह करते हुए कवि ने लिखा है, ‘मदिरा तुम सब कहां पीते हो, तुमको पीता जाता हर प्याला।’ बेहद सरल, सहज अंदाज में कवि ने शराब के सेवन के प्रति आगाह किया है। किताब की हर एक पंक्ति एक नयी चेतावनी सी देती प्रतीत होती है।
इन मुक्तकों को गीतात्मकता में ढालकर समाज को बेहतरीन संदेश देने के इस काम को और आगे बढ़ाया जा सकता है। कवि ने स्वीकार किया है कि उनका उद्देश्य समाज को दिशा दिखाना है। उन्होंने एक जगह लिखा है, ‘मेरी कृति आपको समर्पित, सन्मार्ग दिखाएगी बैरन हाला।’ निश्चित रूप से किताब सन्मार्ग दिखाने वाली है।
पुस्तक : बैरन हाला शतक लेखक : शैलेंद्र शैल प्रकाशक : निरुपमा प्रकाशन, मेरठ पृष्ठ : 128 मूल्य : रु. 150.

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