पुस्तक समीक्षा

शील कौशिक
हिंदी साहित्य की कहानी विधा सदा से ही लोकप्रिय व सशक्त विधा रही है। प्रस्तुत संकलन ‘रिश्तों की महक’ में कुल 19 कहानियां हैं, जिन्हें डॉ. रमा कान्ता ने कुशलता से संपादित किया है। संग्रह में मधुकांत, विकेश निझावन जैसे मंझे हुए व वरिष्ठ साहित्यकार के साथ-साथ आशा खत्री ‘लता’, डॉ. लता अग्रवाल, हरनाम शर्मा, लाजपतराय गर्ग, प्रोफेसर शामलाल कौशल, डॉक्टर रामाकांता, विजय विभोर, अर्चना कोचर, प्रियंका ओमप्रकाश, नरेन्द्र श्रीवास्तव, डॉ. सरला सिंह, नफेसिंह, प्रदीपमणि तिवारी, हेमचंद सकलानी, नफेसिंह योगी, महेश राजा व रूबी प्रसाद की उल्लेखनीय कहानियां सम्मिलित हैं।
विकेश निझावन की ‘मुख्तियारनामा’ सरकार द्वारा एक्वायर की गई जमीन के बदले मुआवजे की राशि प्राप्त करने के लिए कानूनी दांवपेच, भय, आर्थिक शोषण तथा कोर्ट-कचहरी के चक्कर में अनावश्यक देरी की मार्मिक कहानी है। मधुकांत की कहानी ‘महक’ में नारी चाहे वह मां, पत्नी या बिटिया किसी भी रूप में हो परिवार में प्यार, सद‍्भाव व समरसता की सुगंध को बनाए रखती है। डॉ. रमा कान्ता की कहानी ‘पहला पत्र’ सास-बहू के परस्पर प्रेम और सौहार्द की कहानी है। लाजपतराय गर्ग की कहानी वर्तमान सदी में पति-पत्नी के बीच कटु होते रिश्ते व संबंधों के बीच आई उच्छृंखलता व स्वछंदता जैसी सामाजिक विडंबना को भलीभांति उजागर करती है। आशा खत्री लता की कहानी ‘सच्चा प्रतिदान’ रिश्तों में आई स्वार्थपरत्ता का कच्चा चिट्ठा है।
कुल मिलाकर समस्त कहानियां पारिवारिक व सामाजिक अच्छाइयों व विसंगतियों को अपनी-अपनी तरह से उजागर करती हैं और विषय का भली प्रकार निर्वहन करती हैं। कुछ कहानियां प्रतीकात्मक रूप से अच्छी बन पड़ी हैं जैसे विजय विभोर की ‘नाखून’, लज्जाराम राघव तरुण की ‘ध्रुव तारा’।
पुस्तक : रिश्तों की महक (कहानी-संग्रह) संपादक : डॉ. रमा कान्ता प्रकाशक : एजुकेशनल बुक्स सर्विस, नई दिल्ली पृष्ठ : 120 मूल्य : रु. 400.

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