अर्थ-लय-चिंतन की त्रिवेणी
योगेंद्र नाथ शर्मा ‘अरुण’
कवयित्री डॉ. अनु सपन का गीत-संकलन ‘आ, मन! तुझ से बात करूं’ बरबस मन को खींचता है और लगता है कि आज की भयंकर आपाधापी और भौतिकता की अंधी दौड़ में कोई तो है जो ‘मन के दरवाजे पर दस्तक देकर, ‘मन’ से बात करने की हिम्मत कर रहा है।’ डॉ. अनु सपन के गीतों को पढ़ने, समझने और गुनने के बाद मुझे लगा कि कवयित्री के ये गीत तो सच में ‘गीत-प्रयाग’ बन गए हैं, जहां अर्थवत्ता की गंगा, लयात्मकता की यमुना और चिंतन की त्रिवेणी दिखाई देती है।
कवयित्री के इस गीत संकलन के फ्लैप पर गीत-शिल्पी डॉ. कुंअर बेचैन ने लिखा है :- ‘मन भले ही एक हो किंतु मन:स्थितियां अलग-अलग समय पर अलग-अलग रूप ग्रहण करती रहती हैं। मन जहां स्थित होता है, वहीं उसकी मन:स्थिति जन्म लेती है और फिर मन उसी मन:स्थिति में रंगने लगता है। इसी मन:स्थिति के अनुसार मन में भाव जन्म लेते हैं। इस संदर्भ में यदि विचार किया जाए तो जो भी गेय कविता होती है, वह कवि के भाव और मन की तरंग के सबसे निकट होती है।’
डॉ. कुंअर बेचैन के इन शब्दों के चिंतन की संपुष्टि कवयित्री डॉ. अनु सपन के ‘समर्पण’ की पंक्तियों से हो जाती है, जहां कवयित्री एक ‘विराट शब्द ब्रह्म’ का स्मरण करती है। यह ‘समर्पण’ उदात्त मन:स्थिति का दर्पण है :-‘उस शब्द-ब्रह्म को/ जिसने मेरे हृदय-प्रदेश की/ दमित एवं मूक अनुभूतियों को/ भाषा दी, विस्तार दिया और उनकी/ सीमाओं को संज्ञायित किया/ कभी गीत-ग़ज़लों में ढाल कर तो कभी/ मुक्तकों में पिरो कर।’
कवयित्री डॉ. अनु सपन अपने ‘समर्पण’ में जो भाव लेकर गीत-साधना के मार्ग पर चलीं तो वागीश्वरी से भी उन्होंने कुछ ऐसा ही मांगा, जो कवयित्री से पहले ‘गीत’ को महत्व देता है। कवयित्री की कामना देखिए :- ‘छन्द-ताल-सुर सजे, गीत की लहर उठे,/ मां तेरा आशीष भी तो शब्द-शब्द में दिखे/ कंठ में हो रागिनी, तू व्याकरण निखार दे।’
गीत है क्या? क्यों रचा जाता है गीत? आखिर ऐसा क्या है गीत में, जो श्रोता या पाठक को बांध लेता है? ऐसे प्रश्नों के उत्तर में गीतकार राजेंद्र ‘राजन’ ने लिखा है :-‘कभी मुझे लगा कि जीवन का पहला उपवास है गीत, जिसमें पात्र हर पल अपने इष्ट प्रेम के रस में सराबोर रहता है, उसी के ध्यान में मग्न रहता है। हजारों मील दूर रहते हुए भी अपने प्रिय के अ-दीखे, अ-बोले संवाद का शब्दिक अनुवाद है गीत। हृदय की धड़कनों का सद्य: स्नात रूप है गीत, जो गुनगुनी धूप का संयोग पाकर और भी निखर-निखर जाता है। रोज नया-सा खिला-खिला हो जाता है।’
कवयित्री डॉ. अनु के गीत उपर्युक्त कसौटी पर पूर्णत: खरे उतरते हैं। ‘आ, मन! तुझ से बात करूं’ गीत-संकलन की भूमिका में स्वयं को गीतों में ढालने वाली कवयित्री इंदिरा गौड़ ने गीत को अतीन्द्रिय अनुभवों का दस्तावेज बताते हुए बहुत बड़ी बात कह दी है :-‘गीत के रचने के पल समाधि के पल होते हैं। संत के समान ही ध्यान में उतरता है गीत का साधक। ध्यानस्थ संत को अनिर्वचनीय आनंद की मात्र प्रतीक्षा ही करनी होती है।’
कभी-कभी तो मुझे लगा है कि उपमा, रूपक, पद-मैत्री, ध्वन्यात्मकता जैसे अलंकार अनायास डॉ. अनु सपन के गीतों में आ जाते हैं और गीत का शृंगार कर देते हैं। विश्वासपूर्वक कह सकता हूं कि डॉ. अनु सपन के गीतों में प्रवाहित स्वर-गंगा प्रत्येक मन को पावन कर रही है।
पुस्तक : आ, मन! तुझसे बात करूं कवयित्री : डॉ. अनु सपन प्रकाशक : सहज प्रकाशन, मुजफ्फरनगर, उ. प्र. पृष्ठ : 104 मूल्य : रु. 300.
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