चंडीगढ़, 8 मार्च (ट्रिन्यू)
पंजाब विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. अरुण ग्रोवर के खिलाफ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला प्रोफेसर ने इंटरनल कंप्लेंट कमेटी (आईसीसी) की चेयरपर्सन हरियाणा की वरिष्ठ आईएएस अधिकारी धीरा खंडेलवाल को एक 9 पन्ने का पत्र लिखा है और पूरे घटनाक्रम को विस्तार से लिखते हुए कहा है कि आरोपी प्रो. ग्रोवर अब रिटायर हो चुके हैं और उनके व चांसलर के बीच अब नियोक्ता-कर्मचारी का कोई रिलेशन नहीं रह गया है। प्रो. ग्रोवर रिटायर होने के बाद टाइफर (टाटा इंस्टीच्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च) से पेंशन आदि के लाभ ले चुके हैं। ऐसे में आईसीसी द्वारा जांच को आगे बढ़ाने का कोई अर्थ नहीं रह जाता और पूरी कार्यवाही व्यर्थ हो जाती है। उन्होंने चेयरपर्सन से कहा है कि वह इस संबंध में कोई ऐसा वाजिब आदेश जारी कर सकती हैं, जो चांसलर आफिस के स्टैंड को बनाये रखने के पहलू की लिहाज से अपरिहार्य हो।
उनका कहना है कि सीनेट-सिंडिकेट ने कमेटी के कुछ नाम सुझाकर चांसलर आफिस को भेज दिये जिन्हें चांसलर ने अपनी मंजूरी दे दी। उन्होंने पत्र में आरोप लगाया है कि तत्कालीन रजिस्ट्रार के साथ मिलीभगत करके आईसीसी बनायी जो नियोक्ता द्वारा गठित नहीं की गयी थी। कुछ गोपनीय दस्तावेज और फोटो वगैरह भी इरादतन सर्कुलेट किए गये। उन्होंने आरोप लगाया कि तथाकथित आईसीसी के मैंबर उन्हीं लोगों को बनाया गया जो उनके माफिक बैठते थे। उन्होंने अपने खत में वर्कप्लेस एक्ट 2013 के विभिन्न प्रवाधानों का हवाला देते हुए कहा कि प्रतिवादी के दोषी पाये जाने पर उसके वेतन भत्ते और अन्य पैसे रोक लिये जाते हैं मगर इस मामले में आरोपी प्रो. ग्रोवर के रिटायर होने के चलते कुछ रोक नहीं सकते, ऐसे में जांच सिर्फ औपचारिकता भर रह जायेगी और अर्थहीन होगी।
किसी कमेटी के समक्ष पेश नहीं हुई शिकायतकर्ता : शिकायतकर्ता महिला प्रोफेसर अभी तक किसी भी कमेटी के समक्ष पेश नहीं हुई हैं। प्रो. निष्ठा जसवाल की अध्यक्षता वाली पहले पीयूकैश के समक्ष शिकायतकर्ता महिला इसलिये पेश नहीं हुई कि उसे कमेटी में कोई फेथ नहीं था। कई बार बुलाने पर भी उनके सामने पेश नहीं हुई। मामले की जांच बाद में मीनाक्षी आनंद चौधरी को दी गयी मगर उन्होंने यह कहा कि वह रिटायर हो चुकी हैं और अब कोई सरकारी अधिकारी नहीं है। इसके बाद चांसलर ने हरियाणा की एक अन्य वरिष्ठ आईएएस अधिकारी नवराज संधू को कमेटी का चेयरपर्सन बनाया जबकि मैंबर पहले वाली कमेटी के ही रहे। नवराज संधू ने दो बार शिकायतकर्ता महिला को बुलाया मगर वह हाजिर नहीं हुई। तीसरी बार फिर बुलाया और चेतावनी दी कि अगर पेश नहीं हुई तो एक्स-पार्टी डिसीजन दे दिया जायेगा। तीसरी बार की डेट से एक दिन पहले वे हाईकोर्ट चली गयी। हाईकोर्ट ने भी 15 अक्तूबर, 2019 को इसका निस्तारण कर दिया। नंवबर में नवराज के रिटायर होने पर आईएएस धीरा खंडेलवाल को कमेटी का चेयरपर्सन लगाया गया। धीरा ने भी महिला प्रोफेसर को बुलाया मगर वे पेशी पर नहीं गयी और एक दिन पहले यह चिट्ठी लिख दी। तीन मार्च को बैठक थी और इसी दिन मीडिया को भी इसकी भनक लग गयी। बैठक में क्या हुआ इसका अभी तक कुछ पता नहीं चल पाया।
कोर्ट ने पहले ही कर दिया है निपटारा
हाईकोर्ट ने इस केस का 15 अक्तूबर, 2019 को निपटारा करते हुए साफ किया था कि अगर इंटरनल तौर पर कोई जांच चाहे तो करवाई जा सकती है। कोर्ट ने कहा था कि शिकायतकर्ता चाहती हैं कि वे कमांडिंग पोजीशन में रहे। उनकी यह सनक ही है कि वे चाहती हैं कि दबाव बनाकर या अपनी शर्तें थोंपकर उसी के हिसाब से कमेटी के नुमाइंदे चुनें। कोर्ट ने साफ किया कि पटीशनर ने कोई ऐसा वाजिब या तार्किक आधार नहीं दिया कि कमेटी सही नहीं है।

जांच प्रभावित करने का प्रयास : प्रो. ग्रोवर
उधर, पूर्व कुलपति प्रो. अरुण ग्रोवर ने कहा कि आरोप लगाने वाली महिला प्रोफेसर ने 2 मार्च को आईसीसी की चेयरपर्सन को प्रभावित करने के लिये लेटर लिखा। सुनवाई से एक दिन पहले 3 मार्च को जानबूझकर चुनिंदा पत्रकारों को लीक किया गया ताकि सुनवाई को प्रभावित कर सके। पीयू के तत्कालीन रजिस्ट्रार जीएस चड्ढा का मानना है कि आरोप तब लगाये, जब चांसलर एक नियोक्ता थे, इसलिये चांसलर द्वारा जांच कराना उनके न्यायाधिकार का मामला है। ऐसे कई सारे मामले हैं जब सेना अधिकारी रिटायर हो जाते हैं और रिटायरमेंट के बाद भी जांच होती है, और दोषी पाये जाने पर रिकवरी आदि की पैनल्टी लगती है, जिसके लिये लीगल प्रोटेक्शन है। उन्होंने कहा कि जो भी दोषी पाया जाये उसे कानून के मुताबिक रिटायर होने पर भी सजा मिलनी चाहिए। कोई कारण नहीं कि जांच बंद कर दी जाये।

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