कहानी

चित्रांकन : संदीप जोशी

स्नेह गोस्वामी
धड़क-धड़क, लोहे की सड़क, धड़क-धड़क लोहे की सड़क, लय में गाती हुई रेलगाड़ी अपनी रफ्तार से भागी जा रही थी। बाहर सूरज अपनी आज की दिहाड़ी पूरी कर घर की ओर लौट रहा था। तारे निकल चुके थे। अगले कुछ ही पलों में अंधेरे ने धरती को अपने काले कंबल में लपेट लिया। बाहर कुछ भी सुझाई देना बंद हो गया तो खिड़की से बाहर देखती रूपाली ने डिब्बे में नजर घुमाई। इस समय डिब्बे में अधिकांश पुरुष थे। टिफिन लटकाये काम से लौटते थके-हारे पुरुष। देश की राजनीति पर अधिकारपूर्वक बहस करते पुरुष। ताश की बाजी लगाते पुरुष। बात-बेबात ठहाके लगाते पुरुष। इक्का-दुक्का औरतें थीं भी तो परिवार के साथ। डरी-सहमी औरतें। सिमटी-दुबकी औरतें। जरूरत-बेजरूरत मर्दों पर आश्रित औरतें।
कठपुतलिय़ां! रूपाली को अपने आप पर बहुत गुस्सा आया। अब भुगत रूपाली! कह नहीं सकती थी क्या? साढ़े पांच हो चुके सर, ट्रेन पकड़नी है। लेट हो जाऊंगी पर तुमसे नहीं कहा गया। इन रवि सर को भी आज छुट्टी के टाइम ही लैटर टाइप कराना था। बहुत अरजेंट है, आज ही जाना है। बस पांच मिनट का काम है। हुंह पूरे चालीस मिनट लग गये टाइप करके मेल करने, प्रिंट निकालने, फाइल करने में। काम निपटा कर दौड़ती हुई ऑफिस से बाहर आई तो ऑटो ही नहीं मिला। बड़ी मुश्किल से एक ऑटोरिक्शा आया तो दुगने पैसे देकर किसी तरह स्टेशन पहुंची। वहां पता लगा, गाड़ी निकले तो दस मिनट हो चुके थे। अक्सर गाङियाँ लेट हो जाती हैं पर आज उस ट्रेन को सही टाइम पर ही जाना था। कोई चारा नहीं। एक घंटा स्टेशन पर ही इंतजार करना पड़ा। तब यह गाड़ी मिली साढ़े सात वाली। घर पहुंचते-पहुंचते पौने नौ हो जाएंगे। सोच कर ही उसे घबराहट होने लगी थी। बाहर सारी कायनात अंधेरे में छिपी बैठी थी।
दौड़ती हुई ट्रेन अब धीरे-धीरे सरकने लगी थी। स्टेशन पास आ रहा था। शहर की इमारतें एक-एक कर अंधेरे से बाहर आने लगी। गाड़ी यहां एक मिनट ही रुकती है। उसने अपना पर्स और टिफन उठाया। छोटा-सा स्टेशन। गाड़ी कुछ पल के लिए रुकी और रूपाली के उतरते ही फिर से चल पड़ी। स्टेशन पर स्टेशनमास्टर एक हाथ में हरी झंडी और दूसरे हाथ में टार्च लिए खड़ा था। गाड़ी से उतरने वाली कोई और सवारी उसे नहीं दिखी। बाहर निकली। कोई रिक्शा या ऑटोवाला भी नहीं मिला। रुक कर इंतजार करने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। पैदल ही चल पड़ी। एक चौराहा सामने है, एक उससे अगले वाला और उससे आगे एक गली छोड़ कर दूसरी गली में उसका घर है। पंद्रह मिनट का रास्ता है। तेज कदम चली तो हद से हद दस मिनट। अकेले चलते हुए उसकी चाल अपने आप तेज हो गयी। सड़क एकदम सुनसान। सड़क के दोनों ओर की अधिकतर दुकाने बंद हो चुकी थीं।
थोड़ा-सा दूर सड़क के बीचोबीच एक रोशनी का टुकड़ा झिलमिला रहा था। बाईं ओर किसी हलवाई की दुकान खुली थी जो अब अपना काउंटर संभाल रहा था। एक पैर से उस सड़क को पार कर जब उसने अगला पैर आगे बढ़ाया तो मानो पाताल में प्रवेश कर गयी। सड़क पर जोर-जोर से बोलते बतियाते तीन पुरुष हाथों में बैग या थैला लटकाये उसी की दिशा में बढ़े चले आ रहे थे। शायद ये भी उसी गाड़ी से उतरे थे। पर उसके साथ ही उतरे थे तो अब तक उसे दिखाई क्यों नहीं दिये। उसे अपनी सांस रुकती हुई लगी। पर्स पर पकड़ मजबूत हो गयी।
पहला चौराहा पार हो गया। आवाजें उसके थोड़ा और करीब आ गयी थीं। उसने पर्स में रखी लाल मिर्च की पुड़िया निकाली और अपनी मुट्ठी में रख ली। पीछे आ रहे लोग उसी तरह बातें करते चले आ रहे थे। उसने अपने मन को समझाया, डरने की कोई बात नहीं। पर डर था कि तन और मन के भीतर तक धंस गया था। डर के मारे रौंगटे खड़े हो गये थे। लगा, दिल उछल कर सड़क पर आ गिरेगा। लड़के लापरवाही से चलते बिल्कुल उसके पास से गुजर कर आगे निकल गये। कुछ ही मिनटों में काफी दूर हो गये। आसमान में असंख्य तारे और सड़क किनारे खड़े खंभों पर टंगे चालीस वॉट के ट्यूब दोनों की रोशनी भी सड़क के अंधेरे और मन की घबराहट को कम नहीं कर पा रहे थे।
रोज ऐसी सुनसान सड़कों पर कई लोग लुट जाते हैं। चोर-लुटेरे, झपटमार और कभी-कभी तो ऑटोवाले भी अकेला आदमी देखकर किसी को घेर लेते हैं। उससे मारपीट करते हैं। चेन घड़ी, पर्स, सामान जो भी मिल जाए, छीन कर भाग जाते हैं। तब तो कोई नहीं कहता कि मर्द की मर्दानगी लुट गयी या पुरुष के पुरुषत्व पर प्रश्नचिह्न लग गया। इसे बेहद सामान्य घटना मान लिया जाता है। चर्चा होती भी है तो बङे सामान्य ढंग से। पीड़ित पुरुष के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए। पर किसी औरत को अकेला पा गुंडे घेर लें तो देश, समाज और परिवार सब की अस्मिता खतरे में पड़ जाती है। परिवार की प्रतिष्ठा का प्रश्न हो जाता है। सारी उंगलियां उस औरत की ओर मुड़ जाती हैं। बेचारी पीड़ित औरत सबसे बड़ी गुनहगार घोषित कर दी जाती है। समझ नहीं आता, समाज उसका जीना दूभर क्यों कर देता है जैसे उसने खुद न्योता देकर बदमाश बुलाए हों और खुद को लुटवा दिया हो। महिला और उसके परिवार के सदस्य कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहे, ऐसा दुष्प्रचार फैलाया जाता है। क्या ऐसी वारदात को लूट-खसोट की घटना नहीं कहा जा सकता।
सोचते-सोचते इतनी बेचैनी में भी उसके चेहरे पर फीकी-सी मुस्कुराहट आ गयी–क्या उटपटांग सोचती रहती है वह और साथ ही मन के किसी कोने से इच्छा भी जागी– काश! वे लोग फिर से उससे कुछ कदम पीछे चले तो इस सुनसान रास्ते का सूनापन कुछ कम हो जाए।
अपनी उखड़ती सांस को फिर से लय पर लाने के लिए उसने हनुमान जी को याद किया संकट से हनुमान छुड़ावै। अगली पंक्तियां चाह कर भी याद ही नहीं आ रही थी, इसलिये यही आधी लाइन ही कई बार दोहरा डाली। सामने एक और रोशनी का टुकड़ा जगमगा रहा था। कोई पनवाड़ी अपना खोखा खोले बैठा था और वे तीनों उसी के सामने खड़े पान या सिगरेट जैसा कुछ खरीद रहे थे। एक कदम से उस टुकड़े को भी पार कर वह दूसरे चौराहे तक पहुंच गयी। आवाजें फिर से आने लगी थी। परीक्षा में पूछे गये प्रश्नों और उनके संभावित उत्तरों की चर्चा में मस्त उसे अनदेखा कर अपने आप में डूबे लोग। तो ये विद्यार्थी थे जो कोई प्रतियोगी परीक्षा देकर लौट रहे थे।
उसके मन में पीछे मुड़ कर देखने की चाह जागी पर अपने आप को समेटे हुए वह लपकती हुई आगे बढ़ती गयी। घर के बड़े-बुजुर्ग कहते हैं—कुलीन और खानदानी लड़कियां हमेशा सिर झुका कर चलती हैं। फालतू के ठहाके नहीं लगातीं। अजनबी लड़कों से फालतू बात नहीं करती वगैरा-वगैरा। ऐसी ही बातें सोचते-सोचते वह चलती चली गयी। थोड़ी ही देर में वह अपनी गली के मुहाने पर पहुंच चुकी थी। उसके अपने घर के सामने रोशनी की लकीर खिंची थी, जिसके सिरे पर खड़ी मां इस समय उसे समंदर में बने किसी प्रकाशस्तंभ की तरह लगी। मां उसी की प्रतीक्षा कर रही थी। आगे बढ़ उसने तीसरे घेरे में कदम रखा और लंबी-सी सांस ले अपनी धरती पर पहुंच गयी।
दरवाजे की चटकनी बंद कर इत्मीनान से उसने खुद को देखा। राजकुंवरी अपने दुर्ग में आ गयी थी। हर अंधेरे को पार कर वह अब जलते बल्बों की रोशनी से घिरी हुई सही-सलामत घर की दहलीज के भीतर खड़ी थी। घर जहां पर गीजर का गर्म पानी और तौलिया उसका इंतजार कर रहे थे। उसे मुंह धोने जाते देख मां उसके लिए गर्म फुलके सेंकने रसोई में जा चुकी थी। टीवी में खबरें देखते पापा ने सुकून और वात्सल्य से उसे देखा और टीवी बंद कर सोने चले गये। बेडरूम में चुपचाप बैठे दोनों छोटे भाइयों में फिर से धक्का-मुक्की और शरारतें शुरू हो गयी थीं।
फ्रैश होने के लिए घड़ी उतारते हुए उसने घड़ी देखी, अभी आठ अड़तीस ही हुए हैं यानी सामान्य तौर पर पंद्रह मिनट में पार होने वाला रास्ता आज उसने सात मिनट में ही पार कर लिया था। पर ये सात मिनट! एक युग जैसे ये सात मिनट आज उसने कैसे बिताए, ये सिर्फ वही जानती है।
वॉश बेसिन पर हाथ धोते हुए रूपाली सोच रही थी, कल फिर अखबारों में लूटपाट की कई खबरें होंगी। कहीं किसी झपटमारी की और कहीं किसी बलात्कार की भी। अतिरंजना से भरे विवरण। लोग मजे ले-लेकर ये खबरें पढ़ेंगे और चटखारे लेकर यें खबरें सबको सुनाएंगे। चर्चाएं होंगी। बहस होगी। नहीं होगी तो उसके रात के सन्नाटे में सही सलामत घर लौट आने की खबर नहीं होगी। किसी लड़की के इस तरह अकेले घर से निकलने में तो लोगों की रुचि हो सकती है, पर उसके सुरक्षित लौट आने में किसी को क्या मजा आएगा। धत! ये भी कोई सोचने, चर्चा करने या पढ़ने की बात हुई।

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