याद रही जो सीख

विनती यादव
पड़ोस में रहने वाली वृद्धा के निधन के बाद नाते-रिश्तेदारी की महिलाएं आतीं और गीत-भजन गाकर चली जाती। इनके विषय होते-प्रभु सुमिरन, संसार की असारता, जीवन की क्षणभंगुरता, रिश्तों की स्वार्थपरता और मृत्यु की सत्यता। इसी क्रम में एक दिन एक आंटी भजन गा चुकी तो मम्मी ने भी वैसा-सा ही गा दिया। गाने की समाप्ति पर एक बुजुर्ग महिला ने, ‘जुग-जुग जी, मेरी बेटी, अर इसे ही मनभांवते गीत गाती रह्या कर’ कहकर असीसते हुए, मम्मी को गले से लगा लिया। असीसने वाली आंटी की आंखों में उतरी नमी बहुत देर तक सूख नहीं पाई। मैं समझ नहीं पाई कि यह सब क्या था?
मैंने मम्मी से उस घटना का खुलासा करने के लिए कहा तो वे बोलीं, ‘पहले वाली गायिका के बोलों में कोरी नेगेटिविटी थी। वे बोल मुझे बेचैन कर गए इस तर्क के साथ कि पारिवारिक व्यवस्था गड़बड़ाई ज़रूर है लेकिन सौ फीसदी तक नहीं। मौके की नज़ाकत को देखते हुए गाने वाली को टोकना ठीक नहीं था। उसके बोल थे – ‘मेरै चार बहू, च्यारूँ नाग्गी (बुरी), मेरी सुरत राम तै लाग्गी। मैंने पहली तै रोटी मांग्यी, उनै बासी ही पकड़ाई। मैंने दूजी तै पाणी मांग्या, उनै झट से आंगल़ी हलाई। मैंने तीजी तै बिस्तर मांग्या, उनै टूटी खाट दिखाई। मैंने चौथी ………।’ तभी नकार को सकार में बदलते हुए मैंने गाया, ‘मेरै च्यार बहू, च्यारूं आच्छी, मेरी सुरत…। मैंने पहली तै रोटी मांग्यी, उनै ताती सेंक खुवाई। मैंने दूजी तै पाणी मांग्या, वा लोटा भरकै ल्याई। मैंने तीजी तै बिस्तर मांग्या वा झालर तकिया ल्याई। मैंने चौथी….।’
मुझे सम्बोधित कर मम्मी ने पूछा, ‘अब बताओ, इस प्रसंग से क्या सीखा?’
मैंने कहा, ‘जो सीखा, वह बताने की नहीं, महसूस करने की बात है।’ सच तो यह है कि आज भी वह बात जब-तब मार्गदर्शन करती है।

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