पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले बुके
पुष्पा गिरिमाजी
मुझे फूलों से प्यार है और खास मौकों पर अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को बुके देना पसंद है। हाल ही में मेरे व्हाट्सएप पर अनेक ऐसे मैसेज आए, जिनमें कहा गया कि बुके पर्यावरण के अनुकूल नहीं होते हैं और इन्हें किसी को भी देने से परहेज करना चाहिए। यह बात मुझे समझ नहीं आ रही है। क्या आप इस पर प्रकाश डाल सकते हैं और यह भी कि इसका विकल्प क्या है?
समस्या फूलों को लेकर नहीं है, बल्कि इन्हें पैक करने में इस्तेमाल किए जा रहे प्लास्टिक को लेकर है और यही कारण है कि पर्यावरणविद् बुके के खिलाफ आंदोलन चला रहे हैं। इससे पहले बुके सुंदर फूलों का गुच्छा होता था, जिसे कागज के एक टुकड़े में ढीला लपेटा जाता था। कोई भी कागज को हटाकर फूलों को गुलदान में रख सकता था, लेकिन आज हर जगह मौजूद प्लास्टिक ने कागज की जगह ले ली है, जो कि चिंता का कारण है, खासतौर पर तब, जब शहरी भारत में बुके की लोकप्रियता बढ़ रही है।
असल में ज्यादातर लोगों को इस बात का अहसास नहीं होता कि फूल वालों द्वारा जिस आकर्षक और पारदर्शी प्रिंटेड चीज से फूलों को लपेटा जा रहा है, वह कागज नहीं, प्लास्टिक है। आपने ध्यान दिया होगा कि जिस चमकीले रंग वाली चीज से फूलों को लपेटा जाता है, वह कागज की तरह लगता है। असल में मात्रा ज्यादा दिखाने या खराब फूलों को ढकने के लिए सिंथेटिक सामग्री से बनी इस चीज का इस्तेमाल बुके को लपेटने में किया जाता है।
यहां तक कि बुके के चारों ओर लपेटा गया रिबन भी प्लास्टिक ही होता है। अक्सर फूलों के गुच्छे को आपस में बांधे रखने के लिए फूल वालों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाला सिलोफन टेप भी नहीं गलने वाला पदार्थ होता है और फूल वाले इसका खूब इस्तेमाल करते हैं। पूरी बात इतनी ही नहीं है। फूलों को और व्यवस्थित तरीके से सजाने के लिए प्लास्टिक से बने स्पॉन्ज और पिंस में भी फूलों को रखा जाता है। कुछ बुके के मध्य में सिंथेटिक सजावटी टुकड़ों को भी डाला जाता है। असल में एक बुके में से ही बहुत अधिक मात्रा में नहीं गलने वाला सिंगल यूज प्लास्टिक कचरा निकलता है और इससे हमारी मिट्टी, पानी और हवा प्रदूषित होती है।
शादियों और इस तरह के अन्य समारोहों में, यदि आप मेजबान को मिलने वाले बुके की संख्या देखते हैं तो आप महसूस करेंगे कि उनके द्वारा उत्पन्न प्लास्टिक के मलबे की मात्रा कितनी है! और हम, उपभोक्ता, इन गुलदस्तों पर हजारों रुपये खर्च कर रहे होते हैं। अपनी बात में मुझे यह भी जोड़ना चाहिए कि इन दिनों बुके में कई फूल और पत्तियां कृत्रिम रूप से रंगी हुई होती हैं। जब इन पत्तियों को आप छूते हैं तो उसी समय इनका रंग आपके हाथों में लगता है। कुछ पत्तियों पर ऐसा रंग किया होता है कि जैसे वह सोने के बने हों। मुझे तो कुछ फूल ऑर्किड जैसे भी मिले हैं, जिनका रंग नीला या बैंगनी रहता है। फिर से कहना चाहूंगी कि यह उनकी खराब गुणवत्ता को ढकने या फिर उसे अलग रंगत देने के लिए किया जाता है।
अब इसका विकल्प क्या है? यदि आप अपने घर को फूलों से सजाना चाहते हैं तो आप फूल वाले से कहें कि बिना प्लास्टिक के फूल वह आपको दे और यदि आप इन्हें किसी को गिफ्ट देना चाहते हैं तो इन्हें उसी स्थिति में रखें। बेहतर होगा अगर आप गमले में लगे पौधे को ही बतौर उपहार दें। वे पर्यावरण अनुकूल होते हैं, देर तक चलने वाले होते हैं और आपके पास चयन की बहुलता होगी। आप सब्जियों और फलदार पौधों को भी खरीद सकते हैं, खाना बनाने में इस्तेमाल होने वाली औषधियों, दवा के तौर पर इस्तेमाल होने वाले या मौसमी फूलों के पौधों का भी चयन कर सकते हैं। इनडोर सजावटी पौधे या सड़क किनारे लग सकने वाले पेड़ों के बिरवों का भी चयन कर सकते हैं। वास्तव में, इस तरह के उपहार उपभोक्ताओं को पौधे लगाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं जो भी उनके पास थोड़ी-सी जगह हो। या यह सड़क के किनारे हरे क्षेत्र को बढ़ा सकते हैं।
बदलाव तो उपभोक्ताओं को ही लाना होगा। एक बार जब उपभोक्ता की वरीयता फूलों से पौधों में बदलेगी तो मुझे यकीन है कि सड़क किनारे अभी मिल रहे फूलों की तरह पौधे मिलने लगेंगे और तब किसी की भी पौधों को लेकर विस्तृत पसंद होगी।
क्या राज्य सरकारों ने इस समस्या का संज्ञान लिया है और क्या कोई कार्रवाई की है?
पर्यावरण विभाग, चंडीगढ़ द्वारा ‘एकल उपयोग (सिंगल यूज) प्लास्टिक और थर्मोकोल प्रतिबंध पर चित्रमय गाइडबुक पेश की गयी है, जिसमें प्रतिबंधित प्लास्टिक उत्पादों को सूचीबद्ध किया गया है। इनमें सजावट के लिए इस्तेमाल की जाने वाली प्लास्टिक सामग्री, लपेटने वाली प्लास्टिक रिबन आदि शामिल हैं। पुस्तक में यह भी स्पष्ट किया गया है कि पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम की धारा 15 के तहत इसका उल्लंघन करने पर पांच साल तक की सजा और एक लाख तक जुर्माना हो सकता है। हालांकि मुझे नहीं मालूम कि फूलों को लपेटने में सिंगल यूज प्लास्टिक के इस्तेमाल पर किसी फूल वाले के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई या नहीं।
दूसरी ओर बेंगलुरू में नागरिक अधिकारियों ने इस तरह की समस्याओं पर ध्यान दिया। पिछले साल वेलेंटाइन डे के दिन उन्होंने 89 फूल वालों पर छापे मारे और फूलों को लपेटने में इस्तेमाल किए जाने वाले सिंगल यूज एवं नहीं गलने वाला 160 किलो प्लास्टिक जब्त किया। साथ ही उन पर 84,500 रुपये का जुर्माना लगाया, लेकिन जैसा कि मैंने पहले कहा, उपभोक्ता जागरूकता और खरीदारी की आदतों से फर्क पड़ सकता है।
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