ग्रीष्मकालीन राजधानी के अंतर्विरोध
मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत सरकार ने आखिरकार भराड़ीसैण में ग्रीष्मकालीन राजधानी की घोषणा तो कर दी, मगर बिना रोडमैप और बुनियादी ढांचे के यह घोषणा हकीकत में बदलती नजर नहीं आ रही है। वर्तमान में वैसे ही प्रदेश की न्यायिक राजधानी नैनीताल में है और अब तीसरी राजधानी की भी घोषणा हो चुकी है। कर्ज का ब्याज चुकाने के लिये भी कर्ज लेने वाले इस प्रदेश की माली हालत भी तीन-तीन राजधानियों को ढोने लायक नहीं है, और अगर ग्रीष्मकालीन राजधानी के नाम पर भराड़ीसैण में केवल कुछ दिन के लिये विधानसभा सत्र चलाना है तो यह अनुचित होगा, क्योंकि पहाड़ की जनता गैरसैण या भराड़ीसैण में सरकार और उसका सचिवालय देखना चाहती है, न कि मात्र विधानसभा का सत्र।
अगर भराड़ीसैण में सचमुच ग्रीष्मकालीन राजधानी चलाने की सरकार की मंशा है तो उसे भराड़ीसैण से कुछ महीनों के लिये प्रदेश का शासन विधान चलाने के लिये देहरादून का समूचा सचिवालय फाइलों समेत भराड़ीसैण ले जाना होगा। इसलिये ग्रीष्मकालीन राजधानी के लिये भराड़ीसैण में भी भवन आदि उतने ही बड़े ढांचे की जरूरत होगी जितनी कि देहरादून में उपलब्ध है। अगर ऐसा नहीं होता है और ग्रीष्मकालीन राजधानी का अभिप्राय केवल विधानसभा के ग्रीष्मकालीन सत्र से है तो यह पहाड़ की जनता के साथ छल और प्रदेश के बेहद सीमित संसाधनों का दुरुपयोग होगा। अगर भाजपा सरकार शेष दो सालों में वादा पूरा नहीं कर पायी, जिसकी पूरी संभावना है तो यह घोषणा पार्टी के लिये गले की फांस बन सकती है।
मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत ने 29 जून, 2019 को गढ़वाल कमिश्नरी के स्वर्ण जयन्ती समारोह के अवसर पर कमिश्नरी मुख्यालय पौड़ी में कमिश्नरी स्तर के सभी अधिकारियों की तैनाती सुनिश्चित करने वायदा किया था, वहां कमिश्नरी का कमिश्नर और डीआइजी को बिठाना तो रहा दूर, उस कृषि विभाग को वापस पौड़ी नहीं भेजा जा सका जो कि पौड़ी से खिसक कर देहरादून आ गया था। त्रिवेन्द्र सरकार इससे पहले गंदा नाला बनी रिस्पना को पुनर्जीवित कर ऋषिपर्णा बनाने, पहाड़ पर चकबंदी कराने, कोटद्वार से कार्बेट नेशनल पार्क के बीचों बीच रामनगर तक कण्डी मार्ग बनाने, श्रीनगर मेडिकल कालेज को सेना को सौंपने, देहरादून में गौरादेवी वाटर पार्क बनाने, 100 दिन में लोकायुक्त का गठन करने और सवा लाख करोड़ निवेश के उद्योग लगवाने जैसी कई घोषणाएं कर चुकी है जो कि धरातल पर नहीं उतर सकीं। इन घोषणाओं की शृंखला में ग्रीमकालीन राजधानी भी जुड़ने जा रही है।
भराड़ीसैण में पहाड़ की जनता पूरी सरकार को देखना चाहती है, न कि केवल विधानसभा का कुछ दिन का सत्र। भराड़ीसैण में अब तक जितना निर्माण हुआ है, उसी पर एनजीटी को एतराज है। गत 3 मार्च से भराड़ीसैण में चले विधानसभा के बजट सत्र के लिये कर्मचारियों और अधिकारियों के लिये बिस्तर और कुर्सियां तक देहरादून से गये। देहरादून से वहां सामान ढोने में और कुछ दिन के लिये राजनीतिक बारात ले जाने में सरकार को करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं और नतीजा ढाक के तीन पात है। वहां जाने के लिये सड़कें इतनी तंग हैं कि दो कारें भी हर जगह क्रास नहीं हो पातीं। भराड़ीसैण में विधानसभा सत्र पूरे एक सप्ताह भी नहीं चल पाता। जैसे कि इस बार भी सत्र के पांचवें दिन ही मुख्यमंत्री समेत भाजपा के 56 में 39 विधायक और 9 मंत्री खिसक कर देहरादून आ गये।
राज्य गठन के बीस साल से राजधानी के बारे में अनिर्णय और असमंजस के लिये कोई और नहीं बल्कि स्वयं उत्तराखण्ड का राजनीतिक नेतृत्व जिम्मेदार रहा है। 1 अगस्त, 2000 को राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम बना और उत्तरांचल राज्य के गठन की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी हुई । अधिनियम बनने के बाद तत्कालीन कैबिनेट सेक्रेटरी कमल पाण्डे द्वारा राजधानी स्थल के चयन के लिये उत्तर प्रदेश सरकार को लिखे पत्र पर जब तत्कालीन मुख्यमंत्री रामप्रकाश गुप्त ने 9 सितम्बर 2000 को सभी विधायकों एवं सांसदों की बैठक लखनऊ में बुलाई थी, जिसमें गैरसैण का नाम तो किसी ने नहीं लिया मगर अपने-अपने क्षेत्रों में या निकट राजधानी बनाने पर जोर देने लगे जिससे कोई निर्णय न हो सका।
राज्य बनने के बाद पहले मुख्यमंत्री नित्यानन्द स्वामी ने दीक्षित आयोग का गठन कर अपने सिर की बला आयोग पर डाल दी। राजनीतिक नेता गैरसैण के बारे में कितने ईमान्दार हैं, वह दीक्षित आयोग की रिपोर्ट से ही पता चल जाता है। आयोग ने अखबारों में विज्ञापन देकर स्थाई राजधानी के लिये जब सुझाव मांगे तो 70 विधायकों, 5 लोकसभा और 3 राज्यसभा सदस्यों में से केवल एक तत्कालीन सांसद एवं एक मंत्री तथा नेता प्रतिपक्ष सहित 5 विधायकों ने स्थायी राजधानी स्थल के लियेे आयोग को अपने सुझाव दिये थे।
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