सहीराम

न सरकार के खिलाफ कोई हड़ताल हुई, न बंद का आह्वान। फिर भी सब बंद है। जिम्मेदार विपक्ष नहीं। इस बार इस बंद के लिए थोड़ी बहुत अगर जिम्मेदार है तो सरकार ही है कि उसने स्कूल-कालेज, सिनेमा हाल, मॉल सब बंद कर दिए। तो जनाब सब बंद है। स्कूल बंद, कालेज बंद, सिनेमा हाल बंद, मॉल बंद। बाजार खुले हैं, पर हालात बंद से भी बुरे हैं। दुकानदार त्योहार के दिन बोहनी तक को तरस गए। होली का त्योहार था। उस दिन कुछ भी बंद नहीं होता। सब खुला खेल फर्रूखाबादी होता है। उस दिन मन तो खुलता ही है। लोग कुर्ताफाड़ होली खेलकर तन को भी खोल देते हैं।
इस बार तन खुले तो दंगों में। कुर्ताफाड़ होली में नहीं खुले। पर इस बार कुछ भी न खुला। न मन खुला, न तन। मन इसलिए नहीं खुला कि दंगे थे। दंगों में भी सब बंद ही होता है। बस दंगई खुले होते हैं, आगजनी खुली होती है, चाकू-छुरे खुले होते हैं, गालियां निकालती, ताने देती, उलाहने देती और अफवाहें फैलाती जुबान खुली होती है। मकान-दुकान इसलिए बंद होते हैं कि डर होता है कि दंगे में जल न जाएं। बाजार इसलिए बंद होता है कि कर्फ्यू लगा होता है। और मन इसलिए बंद होता है कि उसमें कई गांठें होती हैं। मन की गांठ खुले तो फिर कुछ भी बंद न हो। पर इस बार मन भी बंद था।
खैर, अभी तो न कोई दंगा है, न फसाद, न धारा एक सौ चवालीस है, न कर्फ्यू। फिर भी सब बंद है। न तूफान आया है और न ही उसके आने की कोई भविष्यवाणी है मौसम विभाग की ओर से, इसलिए इसे तूफान के आने से पहले की शांति भी नहीं कह सकते। वैसे इस बार दंगों का जो तूफान आया, उससे पहले शांति कहां थी। धरने और प्रदर्शन थे। हालांकि शांतिपूर्ण थे फिर भी दंगों का तूफान आया। इसलिए सबक यही है कि दंगे, शांति की जरा भी परवाह नहीं करते। खैर अभी तो स्कूल, कालेज, सिनेमा हाल, मॉल वगैरह जो बंद हैं, वे सब कोरोना के डर से बंद हैं।
यह डर का समय है। इसलिए डरो कि कहीं कोई नेता डराने वाला कोई बयान न दे दे। किसान बेचारे बेमौसम की बारिश और ओलों से डरे हुए हैं। डरे हुए हैं कि मुआवजे के नाम पर बीमा कंपनियां उन्हें ठेंगा दिखाने वाली हैं। और अब इस कोरोना वायरस की बीमारी से डरो। सरकार कह रही है कि बीमारी नहीं है जनाब, महामारी है। सो डरो। डरो और कोशिश करो कि घरों में ही बंद रहो। हाथ मिलाने से डरो, जफ्फियां पाने से डरो, गले लगने से डरो, बाहर निकलने से डरो, बाजार जाने से डरो। असली बात यह है कि बस डर कर रहो।

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