भक्ति को कर्म से जोड़ने वाले संत
अनुपम कुमार
समाज में जाति के कड़े बंधन, उच्च-नीच और धार्मिक भेदभाव के खिलाफ मध्ययुग में जिन संत, कवियों ने आगे बढ़कर आवाज उठाई, उनमें संत रैदास अग्रगण्य हैं। जाति-पाति और धर्म के आधार पर भेदभाव के खिलाफ उनके दोहे जिरह करते नजर आते हैं-
जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।
उनके शब्दों में कहें तो मनुष्य में आपसी भाईचारा और प्रेम सब कोरी कल्पना बनकर रह जाती है, क्योंकि जाति व्यवस्था के बंधन अब भी जड़ जमाए हुए हैं। रैदास जाति व्यवस्था से आगे बढ़कर उस धार्मिक व्यवस्था पर भी चोट करते नजर आते हैं जो एक-दूसरे के खिलाफ खड़ी कर दे। ऐसे भेदभाव को मिटाने का आह्वान वह खुलेआम करते हैं और कहते हैं –
रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं। तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि। हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा। दोउ एकउ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।
भगवान को अलग-अलग नामों से पुकारने का मतलब यह नहीं कि ईश्वर अनेक हैं। उनकी मानें तो- ‘कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा, वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।’
रैदास की रचनाएं भगवान की चरम भक्ति को समर्पित हैं। उन्होंने कहा कि ईश्वर हीरे से भी कीमती है। जो लोग इसे छोड़कर अन्य चीजों की आशा करते हैं उन्हें नर्क जाना ही पड़ता है।
हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आस
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास।
भगवान से लौ लगने पर वह उसी की रट लगाते रहते हैं। भक्ति के इस रूप का वर्णन करते हुए वह लिखते हैं- अब कैसे छूटे राम रट लागी। प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग अंग बास समानी।।
वह अपने को भाग्यशाली मानते हैं क्योंकि उन्हें ईश्वर की भक्ति करने का मौका मिला है। ऐसे जीवन को सफल भी मानते हैं। अहंकार को तजकर ही उन्होंने ईश्वर की भक्ति का रास्ता चुना है। अहंकार रखने वाले की गति वैसी ही होती है जैसे हाथी की। विशाल शरीर वाला हाथी शक्कर के दानों को बीन नहीं सकता, लेकिन एक तुच्छ-सी दिखने वाली चींटी शक्कर के दानों को आसानी से बीन सकती है।
कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै। तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।
वे भक्ति को कर्म से जोड़कर देखते हैं। वे व्यक्ति को हमेशा कर्म करते रहने की सीख देते हैं, साथ ही इसके बदले मिलने वाले फल की आशा भी रखने को कहते हैं। रैदास कहते हैं, ‘करम बंधन में बन्ध रहियो, फल की ना तज्जियो आस, कर्म मनुष्य का धर्म है, सत् भाखै रविदास।’ वह कर्म करने के अलावा भक्ति को निर्मल मन से जोड़कर देखते हैं। यह निर्मल मन भक्ति को आडम्बरविहीन बनाता है। उनका मानना है कि निर्मल मन में ही ईश्वर वास करते हैं, यदि किसी के प्रति बैर भाव या लालच द्वेष नहीं है, तो ऐसा मन मंदिर के समान है। ऐसे मन में ही ईश्वर का वास होता है।
ऐसे भक्ति भाव और उच्च मानवीय मूल्यों से भरे उनके दोहे जन-जन में प्रचलित हैं। वह भारत में उत्पीड़ित और मानवीय सुविधाओं से वंचित लाखों लोगों के लिए ईश्वर के समान हैं। यही कारण है कि उनकी जयंती हर वर्ष धूमधाम से मनाई जाती है। उनकी जन्मस्थली बनारस ऐसे लोगों के लिए तीर्थस्थली बनती है। देखा जाए तो रैदास ने जिन मानवीय मूल्यों का आह्वान किया है वह देश और समाज को मजबूत बनाने वाली कड़ियां हैं। उन्हें जाति विशेष या समाज विशेष का कवि न मानकर आज देश और संस्कृति की धरोहर के रूप में देखना चाहिए।
उन्होंने श्रम आधारित ईश्वर भक्ति को भी केन्द्र में रखा और इसके लिए मन की निर्मलता पर जोर दिया। खुलकर कहा- ‘मन ही पूजा मन ही धूप, मन ही सेउं सहज स्वरूप।’ इन सबकी राह में बाधक बनने वाली चीजों का खंडन किया। निर्गुण भक्ति की राह पर चलने वाले रैदास जिन संदेशों को लेकर समाज में आगे बढ़े, उसका प्रचार प्रसार करना और अमल में लाना ही उनकी जयंती मनाने को सार्थक बनाना है।
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