शायरी में दर्द की टीस
जब कोई शायर समाज में व्याप्त विरोधाभासों से टकराता है तो स्वाभाविक तौर पर उसकी शायरी में विद्रोह व दर्द की टीस मुखर होने लगती है। डॉ. दीप बिलासपुरी समाज के इस विरोधाभास, टीस, दोमुंहेपन व विसंगतियों से संघर्ष करते हुए पूर्व में 6 हजार शे’रों की एक लंबी ग़ज़ल ‘शाहकार’ के रूप में प्रस्तुत कर चुके हैं जो शायद लंबी ग़ज़ल का एक रिकार्ड है।
डॉ. दीप बिलासपुरी का ताजा ग़ज़ल संग्रह ‘ग़ज़ल के शहर में’ प्रकाशित हो चुका है। यह उनका सातवां ग़ज़ल संग्रह है। समीक्ष्य ग़ज़ल संग्रह ‘ग़ज़ल के शहर में’ भी शायर जगह-जगह समाज के विरोधाभासों व विसंगतियों से जूझता नजर आता है। कहीं वह प्राचीन संस्कृति व विलुप्त हो रही परंपराओं पर निराशा व्यक्त करता है तो कहीं शहरीकरण की अंधी दौड़ में सिमट रहे गांवों व जंगलों की कटाई पर भी चिंतित है।
कहीं-कहीं पर शायर देशभक्ति की मशाल जलाता नजर आता है तथा देश के दुश्मनों को मिटाने व विकास की राह में आ रही दीवारों को हटाने की बात करता है। शायर सुहाने भविष्य के प्रति अटूट आशावादी भी नजर आता है।
शायर डॉ. दीप बिलासपुरी की खुद्दारी भी कमाल की है। एक शे’र में वह कहते हैं—
दीप करते ही रहे फाकाकशी हम मुद्दतों
पर कोई शय गैर से हमने कभी ली ही नहीं।
डॉ. दीप बिलासपुरी के शे’रों में उर्दू के साथ-साथ हिंदी के शब्दों का प्रयोग बहुत खूबसूरत ढंग से किया गया है।
पुस्तक : ग़ज़ल के शहर में शायर : डॉ. दीप बिलासपुरी प्रकाशक : क्रांति प्रकाशन, बिलासपुर, हरियाणा पृष्ठ : 108 मूल्य : रु. 500.
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