आलोक पुराणिक

2020-21 का बजट आ लिया, बजट से पहले आर्थिक सर्वेक्षण आया। सरकार की उम्मीद है कि 2020-21 में अर्थव्यवस्था की विकास दर 6 से 6.5 प्रतिशत रहेगी। जो बंदे या बंदी चालू हैं, उनकी विकास दर इससे भी बहुत ज्यादा रहेगी।
इधर तरह-तरह की आर्थिक खबरें आती हैं, कई बार लगता है कि इनसे हमारा रिश्ता क्या है। फोर्ब्स की लिस्ट में इतने अरबपति भारत के। मतलब क्या इन खबरों से नान-अरबपतियों को प्रेरित होना चाहिए और लग जाना चाहिए अरबपति बनने। लखपति बनने की कोशिश भी कामयाब ना होने देते तमाम कंपनी वाले।
एक बार बीस हजार रुपये पड़े थे मेरे पास, इतने इश्तिहार आये कि बीस हजार देकर बाकी की नब्बे हजार की रकम ईएमआई में दे दो और वो वाला मोबाइल ले लो। घरवालों ने मार मचा दी कि ले लो वो वाला मोबाइल, बीस हजार मेरे निकल गये। उस उद्योगपति के पास पहुंच गये, जिसका नाम अरबपतियों की लिस्ट में था। अरबपति कोई कैसे बन जाता है, क्योंकि वह बीस हजार उसकी जेब से निकाल लेता है, जो खुद लखपति बनने की आकांक्षा पाले हुए था।
कोई अरबपति बने, इसके लिए जरूरी है कि किसी की जेब में बीस हजार न रहें।
मेरी न बढ़ी इनकम, 6.5 जीडीपी कैसे बढ़ जायेगी। क्या मैं देश में नहीं हूं। मैं समझाता हूं खुद को बेटे बढ़ोतरी वाला देश तेरा न है। बढ़ोतरी वाला देश कोई और है, कहीं और रहता है। ग्रेटर कैलाश में रहता है, नरीमन पाइंट में रहता है। मैं बढ़ोतरी तो दूर, पुरानी इनकम बनी रहे, इस पर ही परेशान रहता हूं। नत्थू पकाैड़ी वाला इस परेशानी में न रहता, यद्यपि वह ग्रेटर कैलाश में भी नहीं रहता। उसने पकाैड़ी के रेट दस प्रतिशत बढ़ा दिये। पब्लिक पकौड़ी के रेट बढ़ाकर दे दे देती है, लेखक किताबों के पांच परसेंट रेट बढ़ाकर मांग लें तो पाठक लेने से इनकार कर देता है। हिंदी के लेखक की जीडीपी उसकी शालों से नापी जाये तो हर साल करीब दस परसेंट बढ़ जाती है। बाकी दुनियाभर के पेशों की जीडीपी रकम की शक्ल में बढ़ती है, हिंदी के लेखक की जीडीपी शाल में बढ़ती है। किसी को कुछ रकम मिल जाये, तो वो उसे बाजारू घोषित कर देते हैं, जिन्हें अपनी किताब भी रकम देकर छपवानी पड़ती है। हिंदी का लेखक कुछ रकम भी इस तरह से अंदर करता है, मानो कहीं से जेबकटी कर ली हो।
हिंदी के लेखक की जीडीपी न बढ़ी, पकौड़ी वाले की बढ़ गयी, गोलगप्पे वाले की बढ़ गयी।
तो क्या करें-पकौड़ी, गोलगप्पे बेचें। जी कई लेखक वैसे यही कर रहे हैं। एक बार छान लिये थे गोलगप्पे और पकौड़ी सत्तर के दशक में, वही अभी भी बेचे जा रहे हैं। ग्राहक लेने से इनकार करता है, तो उसे सुनना पड़ता है, इसे पकौड़ी की, असली पकौड़ी की समझ नहीं है। यह समझता नहीं है।
खैर 6.5 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ जाये तो भी बुरा नहीं है, हिंदी के लेखक को कौन नीरव मोदी होना है, जो इनकम 878787389739073 प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद करे।

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