स्वदेशी सुरक्षा कवच
निर्यात व रोजगार वृद्धि से आर्थिकी को संबल
एशिया के सबसे बड़े डिफेंस एक्सपो का लखनऊ में आयोजन मोदी सरकार की रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता की नीति की दिशा में एक सार्थक प्रयास है। तीस से अधिक मित्र देशों के रक्षा मंत्रियों तथा 70 से अधिक विदेशी रक्षा कंपनियों व रक्षा विशेषज्ञों की इसमें भागीदारी आयोजन के महत्व को ही जाहिर करती है। सरकार का यह बयान भरोसा जगाता है कि पिछले दो सालों में 17000 करोड़ के रक्षा उत्पादों का निर्यात हुआ है और अगले पांच वर्षों में इसे 35 हजार करोड़ करने का लक्ष्य है। यह विडंबना ही रही है कि आजादी से पहले रक्षा उत्पादन में अग्रणी रहा भारत सत्ताधीशों की काहिली से दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा खरीददार बन गया। भारत ने अपनी इस क्षमता का उपयोग नहीं किया। न जाने क्यों देश की रणनीति और नीति हथियारों की खरीद पर केंद्रित होकर रह गई। यह अच्छी बात है कि राजग सरकार ने रक्षा अनुसंधान व विकास की उच्च क्षमता तथा रक्षा उत्पादों के देश में उत्पादन को अपनी प्राथमिकता बनाया है। इसके लिये देश में मूलभूत ढांचा तैयार करना भी जरूरी है ताकि स्वदेशी निर्माण से बहुमूल्य विदेशी मुद्रा बच सके और रोजगार के अवसर भी बढ़ सकें। नि:संदेह इससे देश में निवेश और नवोन्मेष का वातावरण बन सकेगा। लेकिन यह सिर्फ रक्षा निर्माण में लगी सरकारी संस्थाओं के भरोसे संभव नहीं है, इसमें निजी क्षेत्र की बड़ी भूमिका तलाशी जानी चाहिए। इतना ही नहीं, रक्षा साजो-सामान उत्पादकों और उपयोगकर्ताओं के बीच भी सामंजस्य जरूरी है। तभी राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। बदलते वक्त के साथ रक्षा तकनीकों में भारी बदलाव आया है। आधुनिक युद्ध परंपरागत हथियारों के बूते नहीं लड़े जा सकते । आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की उसमें निर्णायक भूमिका होने वाली है। यह अच्छी बात है कि सरकार ने इस दिशा में पहल की है और बजट में इस लक्ष्य हेतु संसाधन उपलब्ध कराये हैं।
सरकार ने उत्तर प्रदेश को रक्षा उत्पादों का हब बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इससे पहले भी रूस की मदद से हथियार उत्पादन इकाई का विस्तार किया गया था। लखनऊ में ग्यारहवें डिफेंस एक्सपो का आयोजन इसी कड़ी का विस्तार है जो कि रक्षा निर्माण गलियारा योजना का हिस्सा है। उ.प्र. के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दावा कर रहे हैं कि इस आयोजन के बाद उ.प्र. में पचास हजार करोड़ का निवेश होगा और तीन लाख लोगों को रोजगार मिलेगा। हालांकि यह आंकड़ा कब हकीकत में बदलेगा, कहना कठिन है मगर इसे एक अच्छी शुरुआत तो कहा ही जा सकता है। ‘डिजिटल ट्रांसफॉरमेशन ऑफ डिफेंस’ थीम पर आधारित इस आयोजन में रक्षा कंपनियों ने जैसा उत्साह दिखाया है, वह उम्मीद जगाता है। सरकार ने जिस तरह भारतीय आयुध निर्माता कंपनियों के लिये इंडस्िट्रयल लाइसेंसिंग प्रणाली को उदार बनाया है, उससे देश में रक्षा उत्पादन में निजी कंपनियों की बड़ी भूमिका आने वाले दिनों में हो सकती है। सरकार ने रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नियमों में ढील दी है। इससे अब रक्षा क्षेत्र में सौ फीसदी विदेशी निवेश का रास्ता साफ हुआ है। जिसके चलते पिछले पांच सालों में रक्षा और एयरोस्पेस सेक्टर में तकरीबन सत्रह हजार करोड़ रुपये का विदेशी निवेश संभव हो पाया है। डिफेंस एक्सपो में स्वदेशी-विदेशी रक्षा उत्पादों व सुरक्षा प्रणालियों का प्रदर्शन नि:संदेह स्वदेशी उत्पादकों को प्रेरित करेगा। इस आयोजन में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ के अलावा अस्सी से अधिक स्वदेशी कंपनियों के उत्पादों का प्रदर्शन हमारी प्रगति की गाथा को दर्शाता है जो मौजूदा दौर में रक्षा उत्पादों में आत्मनिर्भरता के साथ ही आतंकवाद व साइबर अपराधों से निपटने की तैयारियों में मददगार साबित होगा। नि:संदेह मोदी सरकार की रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में प्राथमिकता समय की नब्ज पर हाथ रखने जैसा है। जो आतंकवाद से जूझने और सीमाओं की सुरक्षा के लिये बेहद जरूरी भी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि दुनिया में रक्षा उत्पादकों का सबसे बड़ा खरीददार देश आने वाले दशकों में बड़े निर्यातक देशों में शुमार हो जाये।
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