संवैधानिक मान्यताओं के प्रति जवाबदेही
भारतीय सेना के इतिहास में इससे पहले कभी नहीं हुआ था कि किसी सेनाध्यक्ष ने अपना नया पद संभालते ही सेना की संवैधानिक भूमिका को एकदम साफ शब्दों में बताया हो। सेना दिवस से पहले हुई प्रेसवार्ता में जनरल एमएम नरवाणे ने कहा कि सेना की राजनिष्ठा केवल भारत के संविधान प्रति और इसकी मूल प्रस्तावना में निहित बुनियादों मूल्यों–स्वतंत्रता– समानता-भाईचारा के प्रति है। उन्होंने कहा कि सीमाओं को सुरक्षित और देश की सार्वभौमिकता एवं क्षेत्रीय अखंडता को यकीनी बनाकर इन मूल्यों की रक्षा की जाती है। फौज की आस्था और दृढ़विश्वास की इस रूपरेखा को उन्होंने किसी सवाल के जवाब में नहीं बल्कि अपने उद्गार के आरंभ में ही स्पष्ट कर दिया था।
हाल-फिलहाल जनरल नरवाणे की इस टिप्पणी से राजनीतिक रंगत वाले उस किस्म के वक्तव्यों पर रोक लग जाएगी जिस तरह के उनके पूर्ववर्ती जनरल बिपिन रावत और फौज के अन्य कुछ लोग नागरिकता संशोधन कानून पर मौजूदा विरोध प्रदर्शनों के मद्देनजर सरकार की नीतियों की ताईद करते दिखाई दिए थे।
पिछले महीने पूर्वी कमान के कमांडर ले. जनरल अनिल चौहान ने देश में जटिल बन चुके कुछ वैधानिक मुद्दों पर निर्णय लेने के लिए सरकार की प्रशंसा की थी, जिसमें उन्होंने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने से लेकर राम मंदिर निर्माण और नागरिकता संशोधन कानून और यहां तक कि नागा शांति समझौता गिनाया था। उनके इस वक्तव्य को लगभग हू-ब-हू ढंग से विदेश मंत्री एस जयशंकर ने हाल ही में एक पुस्तक विमोचन समारोह में दोहराते हुए कहा था कि सरकार द्वारा अर्जित शानदार उपलब्धियों के विशिष्ट रिकार्ड में सेना की भी भागीदारी है। यही हाल रहा तो यह चलन शायद रोके से भी नहीं रुकने वाला कि सशस्त्र सेनाओं से सरकारी नीतियों और इनके क्रियान्वयन की प्रशंसा करने के लिए कहलवाया जाए।
परंतु संविधान के मूल सिद्धांतों और इसके मौलिक प्रस्तावना मूल्यों को चेताता जनरल नरवाणे का वक्तव्य आज सड़कों पर उतरकर सरकार के नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वाले छात्रों से मेल खाता है क्योंकि वे लोग भी अपने भाषणों में संविधान की मौलिक भावना का जिक्र अक्सर करते हैं। इन दोनों की बातें वर्दी पहनने वाले तमाम पुरुष और महिला सैनिकों को याद दिलाती है कि यह केवल संविधान ही है, जिसकी सौगंध उन्होंने सेना में भर्ती होते वक्त उठाई थी, जिसकी पवित्रता बनाए रखना उनके लिए किसी राजनीतिक दल अथवा विचारधारा से कहीं ऊपर है। देखा जाए तो जनरल नरवाणे की बात का असल मंतव्य यह है : ‘हम लोगों के लिए लोगों की सेना हैं, इसका अगर अन्य अर्थ निकाला जाए तो सेना के लिए राष्ट्रीय हितों का पालन सर्वोपरि है न कि किसी सतारूढ़ दल के पक्षपाती हितों का पोषण करना।’ जनरल नरवाणे का यह उपदेश मौजूदा हालात को सही दिशा में ले जाने और सैनिकों को राजनीतिक रंगत से बचाने के लिए जरूरी था।
पिछले कुछ समय से, खासकर उड़ी और बालाकोट में हुई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद, सरकार ने सेना के महिमामंडन का इस्तेमाल अपने चुनावी स्वार्थों के लिए करना शुरू किया है, विशेष तौर पर कहें तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पिछले साल हुई चुनावी रैलियों में भारतीय सेना को ‘मोदीजी की सेना’ बता रहे थे। उड़ी सैन्य कार्रवाई को भुनाने के लिए चुनावी रैलियों में इसके मुख्य योजनाकार ले. जनरल रणबीर सिंह (वर्तमान में उत्तरी कमान के कमांडर) की फोटो के साथ प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के चित्र वाले पोस्टर लगाए गए थे।
वहीं देखा गया कि आरकेएस भदूरिया (वर्तमान वायुसेनाध्यक्ष) फ्रांस की दासो कंपनी के साथ हुए रफाल विमान सौदे पर सार्वजनिक तौर पर तत्कालीन रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ बैठकर उनकी ईमानदारी का बचाव किया करते थे। इस तरह राजनीतिक विजय पाने में थल और वायुसेना की छवि के खतरनाक दुरुपयोग का नतीजा यह निकला कि कई वर्तमान और सेवानिवृत्त सैनिकों का झुकाव सत्तारूढ़ दल की ओर हो गया है। जबकि इससे पहले भारतीय सेना को विलक्षण रूप से गैर-राजनीतिक, धर्मनिरपेक्ष और सीविलियन सत्ता के लिए प्रतिबद्ध रहने के लिए जाना जाता रहा है। इन आदर्शों पर चलने के लिए सेना पूर्व में बनाए अपने नैतिक मूल्यों, आचार-व्यवहार, तौर-तरीकों और रिवायतों का पालन करती आई है ताकि गैर-संवैधानिक गतिविधियों से दूर रहा जा सके।
पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने अपनी किताब ‘ए चैकर्ड ब्रिलियंस’ में बहुत पहले रक्षा मंत्री रहे वीके कृष्ण मेनन द्वारा वरिष्ठ सैनिक अफसरों के बीच रार पैदा करने के यत्नों का उल्लेख किया है, मेनन ने इस मंतव्य हेतु अपनी बात बिना हील-हुज्जत मान लेने वाले अफसरों को उन अधिकारियों से ज्यादा अधिमान देना शुरू किया जो अपना खुद का स्वतंत्र विचार रखते थे। इस प्रक्रिया में मेनन ने तत्कालीन करिश्माई सेनाध्यक्ष जनरल केएस थिम्मैया और बाद में किवदंती बने फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ को एक तरफ लगाने के लिए अपने कोपभाजन का निशाना बनाया था। उनको हटाकर अपनी पसंद के अफसरों जैसे कि पीएन थापर, बीएम कौल और अन्यों को बढ़ावा दिया था।
इसके अलावा सेना के इतिहास में जो एकमात्र अन्य मुश्किल उस वक्त खड़ी हुई थी जब एक पूर्व सेनाध्यक्ष ने तत्कालीन सरकार को उम्र-विवाद मामले में अदालत में घसीटा था। उस वक्त रहे रक्षा मंत्री ए.के. एंथनी से जब पूछा गया कि इसके लिए उक्त जनरल पर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई तो इस सवाल से हड़बड़ाए और उक्त जनरल से सकते में रहे एंथनी ने कहा : ‘लेकिन कैसे? …क्योंकि सेनाध्यक्ष एक बड़े आदमी हैं।’
काफी साल पहले जब देहरादून की राष्ट्रीय मिलिटरी अकादमी से मैं पास हुआ तो हमें जो शपथ दिलावाई गई थी, वह संविधान की नहीं बल्कि वह सिद्धांत पालन और ध्येय की थी, जिसकी इबारत फील्ड मार्शल चैटवुड ने लिखी थी : ‘सर्वप्रथम है देश की सुरक्षा और सम्मान… हमेशा और हर वक्त; इसके बाद आता है उन लोगों का मान, भलाई और आराम, जिनका तुम नेतृत्व करोगे; सबसे अंत में आती है तुम्हारी अपनी आसानी, आराम और सुरक्षा… हमेशा और हरवक्त!’
जहां तक उस वक्त सैनिक (गैर-अधिकारी रैंक) की बात है तो सेना में विधिवत शामिल किए जाने वाले दिन शपथ ग्रहण समारोह में वे अपने-अपने धर्म के नाम पर सौगंध खाकर उस आस्था-पत्र का अहद लेते थे, जिसकी शब्दावली यूं है : ‘थल, समुद्र, नभ में और अंदरूनी अथवा बाहरी खतरों से देश की सुरक्षा की खातिर अपने से ऊपर वालों के आदेश का पालन करेंगे।’ इन रंगरूटों को देश की सार्वभौमिकता और क्षेत्रीय अखंडता की सुरक्षा को अक्षुण्ण रखने वाली कसम उठवाने के लिए विभिन्न धर्मों के पुजारी इन नए सैनिकों की कतारों से होते हुए एक-एक के पास जाकर उनके हाथ अपने-अपने मजहब की पवित्र पुस्तक पर रखवा कर सौगंध दिलवाते थे और इस तरह वे प्रतिबद्ध सैनिक बनते थे।
सैनिकों (वर्तमान और हमारे जैसे सेवानिवृत्त) को फिर से अपना असली संवैधानिक फर्ज-मय लोकतंत्र के मूल मूल्य-याद दिलवाने के लिए जनरल नरवाणे आपका बहुत शुक्रिया।
लेखक सेना संबंधी विषयों के टिप्पणीकार हैं।
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