आर्थिकी का आईना
मगर हकीकत भी बने गुलाबी तस्वीर
बजट से ठीक पहले बीते साल की अर्थव्यवस्था का लेखा-जोखा और भविष्य की रीति-नीतियों पर केंद्रित आर्थिक सर्वेक्षण देश के सामने है। आज संसद में पेश किये जाने वाले आम बजट से पहले शुक्रवार को आये आर्थिक सर्वेक्षण में इस साल की सकल घरेलू उत्पाद दर पांच फीसदी रहने तथा आगामी वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए इसके छह से साढ़े छह फीसदी रहने का अनुमान है। संकेत दिया गया है कि वर्ष 2025 तक चार करोड़ नये रोजगारों का सृजन हो सकता है। यह संख्या वर्ष 2030 तक आठ करोड़ रहने का अनुमान है। जो चीनी मॉडल पर ‘एसेम्बल इन इंडिया’ और ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रमों से श्रम आधारित रोजगार बढ़ाने पर केंद्रित है, जिससे देश का दुनिया के निर्यात बाजार में योगदान 3.5 फीसदी हो जायेगा, जिसे 2030 तक छह फीसदी करने का लक्ष्य है। सर्वे में अमीर देशों को निर्यात बढ़ाने तथा निर्यात नीति अनुकूल बनाने पर बल दिया गया है, जिससे 2025 तक भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाया जा सके। नि:संदेह इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए श्रम आधारित नेटवर्क उत्पादों के क्षेत्र में विस्तृत स्तर पर विशेषज्ञता हासिल करने की जरूरत है। तभी हम उत्पादों की एसेम्बलिंग की गतिविधियों को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बना सकते हैं। इसके लिये सरकार को राजस्व घाटे के लक्ष्य से समझौता करना पड़ सकता है, तभी अर्थव्यवस्था को गति देकर मंदी के प्रभाव को दूर किया जा सकता है। सरकार भी विश्वास जता रही है कि वह आर्थिक सुधारों पर तेजी से काम करेगी। हर साल साठ लाख नई नौकरियों के लक्ष्य के लिये देश में अनुकूल औद्योगिक वातावरण बनाने की भी अावश्यकता होगी, जिसके लिये श्रम सुधारों की जरूरत है। तभी गुणवत्ता के रोजगार का सृजन हो सकेगा और नरेंद्र मोदी सरकार की पांच ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी का लक्ष्य हासिल कर पाना संभव हो पायेगा।
इसमें दो राय नहीं कि ग्लोबल ग्रोथ में कमी से भारतीय अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुई है। चालू वित्तीय वर्ष में एक दशक की सबसे कम विकास दर रहना उसका उदाहरण है। फाइनेंशियल सेक्टर में बाधाओं के चलते निवेश घटने से भी विकास दर में कमी दर्ज की गई है। आर्थिक सर्वे में दावा किया गया है कि जितनी ग्रोथ रेट कम होनी थी, वह हो चुकी है, अब आर्थिकी गति पकड़ेगी। सर्वे में किसानों की आय दुगनी करने के लक्ष्य का भी जिक्र है, जिसके लिये कृषि क्षेत्र की चुनौतियों से निबटने पर बल दिया गया है। साथ ही कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और श्रम सुधारों को लागू करने पर भी जोर दिया गया है। महंगाई कम होने का दावा करते हुए सर्वे में कहा गया है कि मांग कम होने की वजह से अर्थव्यवस्था दबाव में आई है। सर्वे में स्वीकार किया गया कि पांच ट्रिलियन डॉलर की आर्थिकी के लिये संरचनात्मक विकास पर 1.4 ट्रिलियन डॉलर खर्च करने होंगे। इसके लिये वित्तीय घाटे के लक्ष्य से भी पीछे हटना पड़े तो सरकार गुरेज न करे। इसके साथ ही निर्यात बढ़ाने के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करना होगा। जरूरी है कि बंदरगाहों पर लालफीताशाही को खत्म किया जाये। इसके साथ ही कारोबारी माहौल को अनुकूल बनाने का प्रयास होना चाहिए। नि:संदेह इस आर्थिक सर्वेक्षण की छाया आज संसद में प्रस्तुत किये जाने वाले आम बजट पर भी होगी, लेकिन जरूरी नहीं है कि बजट इसी पर आधारित हो। सरकार पहले ही कह चुकी है कि अगले पांच वर्ष में इन्फ्रास्ट्रक्चर में 102 लाख करोड़ का निवेश किया जायेगा, ताकि विकास दर बढ़ाने में किसी तरह की बाधा उत्पन्न न हो। इसके लिये औद्योगिक क्षेत्र व विनिर्माण क्षेत्र में गति लाने की भी जरूरत है। सर्वेक्षण में सरकारी बैंकों का संचालन बेहतर बनाने और निवेशकों का भरोसा बढ़ाने पर भी बल दिया गया है। नि:संदेह आर्थिक सर्वेक्षण देश की आर्थिकी का आईना दिखाता है, मगर इसे हकीकत में बदलने की चुनौती सरकार के सामने है।
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