बॉलीवुड के सियासी बोल
उमेश चतुर्वेदी
साल 1999 की बात है..मीरा नायर की फिल्म ‘वाटर’ को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। शबाना आज़मी अभिनीत इस फिल्म की शूटिंग बनारस में हो रही थी, लेकिन शिवसेना के बनारसी कार्यकर्ताओं ने इस फिल्म के खिलाफ हल्ला बोल दिया था। शूटिंग नहीं होने दी जा रही थी। मीरा नायर की इसी सीरीज़ की पहले आई फिल्म ‘फायर’ के पोस्टर फाड़े जा रहे थे। लेकिन पूरा बालीवुड इसे लेकर अजीब-सी चुप्पी साधे हुए था। उन्हीं दिनों दिल्ली में एक बड़े औद्योगिक समूह की पहल पर दिल्ली की एलटीजी गैलरी में नाट्य समारोह हुआ। उस समारोह के मुख्य अतिथि जाने-माने अभिनेता नसीरूद्दीन शाह थे। इस समारोह के लिए आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में शाह से सवाल पूछ लिया गया कि बालीवुड इस मामले में क्यों चुप है? इस सवाल से आयोजक कॉरपोरेट घराने को परेशानी होने लगी थी। लेकिन संवाददाता अड़ गए तो नसीरूद्दीन शाह को अपनी राय रखनी पड़ी। उन्होंने तब कहा था कि ‘वाटर’ फिल्म के खिलाफ जारी अभियान को लेकर बॉलीवुड को बोलना चाहिए था।
बदला बॉलीवुड का नज़रिया
इस घटना के करीब दो दशक बाद बालीवुड का नज़ारा बदल गया है। आमतौर पर राजनीतिक रूप से तटस्थ बने रहने वाला हिंदी सिनेमा उद्योग इन दिनों ना सिर्फ मुखर है, बल्कि साफ-साफ दो खेमों में बंटा नज़र आ रहा है। राजनीति से दूर रहने की परिपाटी वाले हिंदी सिने उद्योग की हस्तियों के बीच यह बंटवारा नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर को लेकर नज़र आ रहा है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलन के साथ ही नागरिकता संशोधन कानून एवं राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ नसीरूद्दीन शाह, अनुराग कश्यप, विशाल भारद्वाज, अनुभव सिन्हा, दीपिका पादुकोण, फरहान अख्तर, सुशांत सिंह, स्वरा भास्कर, नंदिता दास, जावेद अख्तर, शबाना आज़मी और अनुराग बसु ने मोर्चा खोल रखा है तो दूसरी ओर अनुपम खेर, कंगना रनौत, परेश रावल, विवेक ओबेरॉय, प्रसून जोशी, मधुर भंडारकर और विवेक अग्नहोत्री जैसे अभिनेता और निर्देशक हैं। जो मोदी सरकार के खिलाफ खड़ी फिल्मी हस्तियों पर हमलावर हैं।
दीपिका का जेएनयू जाना
सोशल मीडिया के मंचों पर इन दोनों मसलों को लेकर जिस तरह की अदावत आम लोगों और राजनीतिक समूहों के बीच चल रही है, कुछ उतना ही स्तरहीन माहौल हिंदी फिल्म उद्योग का भी दिख रहा है। फिल्मी दुनिया के बीच का यह विवाद तब अपने चरम पर दिखने लगा, जब नौ जनवरी को जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के आंदोलनकारी छात्रों के बीच दीपिका पादुकोण जा पहुंची। इसके ठीक अगले ही दिन उनके द्वारा अभिनीत फिल्म छपाक रिलीज होनी थी। फीस बढ़ोतरी और नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रहे आंदोलनकारी छात्रों के बीच दीपिका बेशक पहुंचीं, लेकिन उन्होंने कहा कुछ भी नहीं। लेकिन उनकी मौजूदगी ने नागरिकता कानून के समर्थकों को उद्वेलित कर दिया। इससे नाराज़ वर्ग ने तेज़ाब पीड़िता महिलाओं की समस्या जैसे संजीदा विषय पर बनी दीपिका की फिल्म ‘छपाक’ के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। हालात ऐसे बने कि कुछ ही घंटों में बायकॉट ‘छपाक’ ट्विटर पर ट्रेंड करने लगा। दीपिका के बचाव में बौद्धिक जगत की हस्तियों के उतरने का असर नहीं हुआ और संजीदा विषय पर बनी यह फिल्म फ्लॉप हो गई। इसी दिन अजय देवगन द्वारा अभिनीत फिल्म तान्हा जी भी बॉक्स ऑफिस पर आई , जो कामयाबी के झंडे गाड़ती जा रही है। अब तक वह दो सौ करोड़ की कमाई को पार कर गई है। बायकॉट छपाक का भी इस फिल्म को फायदा मिला। दीपिका विरोधी नागरिकता कानून के समर्थक वर्ग ने देशभक्ति के नाम पर इस फिल्म को एक तरह से ‘छपाक’ के खिलाफ खड़ा कर दिया।
अनुपम से भिड़े नसीरुद्दीन
‘छपाक’ के बायकॉट किए जाने के लिए चलाए गए अभियान को बॉलीवुड के एक वर्ग ने असहिष्णुता के तौर पर भी बताने-जताने की कोशिश की। इसी दौरान समानांतर सिनेमा के दौर के साथ तकरीबन साथ-साथ शुरूआत करने वाले दो दिग्गज अभिनेता भी एक-दूसरे के सामने आ गए। नागरिकता कानून और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर का विरोध करते-करते नसीरूद्दीन शाह ने एक कार्यक्रम में अनुपम खेर पर हमला बोलते हुए उन्हें ना सिर्फ ‘जोकर’ बताया, बल्कि लोगों को यह भी सुझाव दे डाला कि लोगों को उन्हें गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। ऐसे में में भला अनुपम खेर क्यों चुप रहते, उन्होंने नसीरूद्दीन शाह को कुंठित अभिनेता बताने में देर नहीं लगाई। ये वही नसीरूद्दीन शाह हैं, जिन्हें दो दशक पहले वाटर फिल्म पर जारी विवाद पर प्रतिक्रिया जाहिर करने में काफी हिचक हुई थी। लेकिन अब वे फिर मुखर हैं।
फिल्मों के ज़रिये विरोध
बॉलीवुड में राजनीतिक मुद्दों पर मचे घमासान के बीच करीब एक साल पुराना वाकया याद आता है। तब जोया अख्तर की फिल्म ‘गली ब्वॉय’ आई थी। जिसमें रणवीर सिंह और आलिया भट्ट ने अभिनय किया है। उस फिल्म के एक गाने में जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया कुमार के आज़ादी के नारे, पर आधारित रैप भी है। इस फिल्म के प्रमोशन के दौरान एक इंटरव्यू में जब रणवीर सिंह से सवाल पूछा गया गया तो उन्होंने खुद को अराजनीतिक बताने में देर नहीं लगाई थी। यही हाल फिल्म की हीरोइन आलिया भट्ट का भी था। रणवीर कुछ ही दिन पहले कुछ अभिनेताओं के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले थे और उन सबने प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी ली थी। सवाल यह था कि प्रधानमंत्री के साथ फोटो खिंचाने और फिल्म मेंे कन्हैया के आजादी के नारे वाले रैप गीत के बीच वे खुद को कहां पाते हैं? दूसरे शब्दों में कहें तो रणवीर से यह सवाल, कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की मशहूर कविता, ‘पार्टनर, आपकी पॉलिटिक्स क्या है’ की तर्ज पर रणवीर और आलिया के राजनीतिक रूझान पर था। इस सवाल के बाद रणवीर और आलिया चुप्पी साध गए थे। उनकी चुप्पी खुली भी तो खुद को राजनीतिक बताने तक ही सीमित रही।
विवादों से बचना ज़रूरी
दरअसल बॉलीवुड की फिल्मों में करोड़ों की पूंजी लगती है। अगर किसी फिल्म पर विवाद भी हुआ और अगर वाटर जैसी फिल्म की शूटिंग भी रूक गई तो निर्माता-निर्देशक को करोड़ों का नुकसान होता है। शायद यही वजह है कि बॉलीवुड राजनीति मसलों पर अपना रूख स्पष्ट करने से हिचकता है। उसे लगता है कि अगर उसके एक बयान के बाद विवाद हुआ तो करोड़ों की पूंजी डूब सकती है। यही वजह है कि फिल्मकार, अभिनेता और अभिनेत्री विवादों से बचते हैं, अपना राजनीतिक रूख स्पष्ट करने से हिचकते हैं। अगर दबाव बना तो वे खुद के कलाकार होने का हवाला देकर किनारा करते रहे हैं। अतीत में देवानंद, ख्वाजा अहमद अब्बास, किशोर कुमार और विजय आनंद अपवाद रहे हैं। जिन्होंने आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के विरोध में आवाज बुलंद की थी। उनके विरोध की वजह आपातकाल के दौरान फिल्मों पर चली कैंची और दबाव था। जब आपातकाल खत्म हुआ तो देवानंद, उनके छोटे भाई विजय आनंद, वी.शांताराम, ‘जीपी सिप्पी, श्री राम बोहरा, आईएस जौहर, रामानंद सागर, आत्माराम आदि ने मिलकर नेशनल पार्टी का गठन कर लिया। जिसका शत्रुघ्न सिन्हा, धर्मेंद्र, हेमामालिनी, संजीव कुमार जैसे दूसर सितारों ने भी इसका साथ दिया। बहरहाल चुनाव के बाद जब इंदिरा गांधी की सरकार बनी तो कांग्रेसी नेताओं ने पर्दे के पीछे फिल्मकारों को समझाया कि इससे विवाद होंगे और आने वाले समय में फिल्म उद्योग को संकट का सामना करना पड़ सकता है, लिहाजा इस पार्टी से सिप्पी, जौहर आदि ने पहले किनारा करना शुरू किया और धीरे-धीरे यह पार्टी निस्तेज एवं खत्म हो गई।
सत्ता की खिलाफत के खतरे
इन अर्थों में देखें तो तब भी सत्ता के खिलाफ खड़े होने के खतरे थे। वैसे पंडित नेहरू की फिल्मी दुनिया की कुछ हस्तियों के साथ दोस्ती थी, इसलिए तकरीबन हर चुनाव में कांग्रेसी उम्मीदवारों के प्रचार में फिल्मी हस्तियां जुटती रहीं। लेकिन आपातकाल के बाद यह रिश्ता कमजोर हुआ। आंधी फिल्म पर उठे विवाद के बाद तो इंदिरा के खिलाफ फिल्मी दुनिया का एक वर्ग खड़ा हुआ, यह बात और है कि वह ज्यादा मुखर नहीं था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद आम चुनाव हुए तो तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी ने सुनील दत्त को मुंबई, वैजयंतीमाला बाली को चेन्नई और अमिताभ बच्चन को इलाहाबाद से उम्मीदवार बनाया। इंदिरा लहर और अपनी लोकप्रियता के चलते तीनों ही फिल्मी हस्तियां चुनाव जीतकर संसद पहुंचीं। लेकिन बाद में बोफोर्स सौदे में जब अमिताभ के भाई अजिताभ का नाम आया तो अमिताभ भी विवादों में फंस गए और दबाव में ना सिर्फ संसद सदस्यता से इस्तीफा दे दिया, बल्कि राजनीति से अलग ही हो गए। लेकिन इन नेताओं की लड़ाइयां राजनीतिक ही रहीं, फिल्मी दुनिया में आपसी विवाद की वजह नहीं बनीं। नब्बे के दशक में नई दिल्ली लोकसभा सीट से कांग्रेस की ओर से राजेश खन्ना ने भारतीय जनता पार्टी के शत्रुघ्न सिन्हा को हराया, तब भी बॉलीवुड दो किनारों पर खड़ा नज़र नहीं आया। भारतीय जनता पार्टी से विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा आदि भी सक्रिय रहे, लेकिन बॉलीवुड में आपसी विवाद नहीं हुआ।
सेंसर बोर्ड पर भी सियासत हावी
लेकिन साल 2014 में जब से केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार आई है, तब से बॉलीवुड में आपसी विवाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। सबसे पहला विवाद तब हुआ, जब पहलाज निहलानी को फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष बनाया। आमतौर पर राजनीति के ऐसे फैसलों पर सवाल उठाने से बचने वाला हिंदी सिने समाज मोदी सरकार के इस फैसले के खिलाफ मुखर हो उठा। इसके बाद जब पुणे के मशहूर फिल्म और टेलीविजन इंस्टीट्यूट का प्रमुख, अभिनेता गजेंद्र चौहान को बनाया गया तो यहां के छात्रों ने विरोध शुरू कर दिया। तब खबरें आईं कि इस विरोध प्रदर्शन को फिल्मी दुनिया की एक धारा ने सहयोग किया। पर्दे के पीछे से नाम आया उन अभिनेताओं, गीतकारों, निर्देशकों और फिल्मकारों का, जो मोदी विरोधी माने जाते हैं। तब गजेंद्र चौहान के खिलाफ बयान देने वालों में जावेद अख्तर, शबाना आज़मी, अनुराग कश्यप, स्वरा भास्कर आदि शामिल थे। तब से लेकर फिल्मी दुनिया खेमेबंदी दिखने लगी।
विरोधियों को जवाब देता धड़ा
वहीं राष्ट्रवादी खेमे की ओर से अर्बन नक्सल फिल्म बना चुके फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री मुखर हुए। मुखर अभिनेत्री और चंडीगढ़ से भाजपा सांसद किरण खेर और उनके पति अनुपम खेर भी हैं। कंगना रनौत तो हर मोर्चे पर मोदी विरोधियों को अपने अंदाज़ में ज़ोरदार जवाब दे रही हैं। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच गईं दीपिका की आलोचना करने से भी कंगना पीछे नहीं रहीं। जब जामिया विश्वविद्यालय के आंदोलनकारी छात्रों पर कार्रवाई करते हुए दिल्ली पुलिस ने लाठी चार्ज किया तो उसे लेकर प्रकारांतर उस ट्विंकल खन्ना ने भी सरकार की आलोचना की, जिनके पति अक्षय कुमार प्रधानमंत्री मोदी के नजदीकी माने जाते हैं। माना जाता है कि अक्षय की फिल्म ‘टॉयलेट, एक प्रेमकथा’ को टैक्स फ्री उनके मोदी समर्थक होने के चलते ही की गई। ट्विंकल ने कहा था,“यहां गाय की हिफाजत की जाती है, लेकिन इंसान की नहीं।”
चुप क्यों हैं खान ?
जब उत्तर प्रदेश में अखलाक की हत्या हुई तो उन दिनों मोदी विरोधियों ने मॉब लिंचिंग नाम का नया शब्द दिया। शाहरूख खान और आमिर खान तक ने ‘डर लगता है’ का नारा दिया था। इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई। आमिर खान की फिल्म ‘ठग्स ऑफ हिंदुस्तान’ और शाहरूख की फिल्म ‘फैन’ फ्लॉप हो गईं। लोगों ने दोनों की फिल्मों के बॉयकॉट की अपील की। बहरहाल तब से आमिर खान और शाहरूख विवादों में पड़ने से बचते रहे हैं। जब अनुराग कश्यप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला किया तो उत्तर प्रदेश भाजपा ने उन पर सबूतों के साथ हमला बोल दिया। भाजपा का कहना था कि चूंकि उनकी फिल्म को उत्तर प्रदेश सरकार के फिल्म बंधु (फिल्म विभाग) ने टैक्स फ्री और दो करोड़ की सहायता नहीं दी, क्योंकि नियमानुसार उन्हें नहीं दी जा सकती थी, लिहाजा वे अपनी खुन्नस में प्रधानमंत्री को गालियां दे रहे हैं।
नरेंद्र मोदी बनाम विपक्ष की खेमेबंदी में भले ही बॉलीवुड बंटा नज़र आ रहा है, सलमान खान और अमिताभ बच्चन जैसी हिंदी सिनेजगत की बड़ी हस्तियों ने चुप्पी साध रखी है।
राजनीतिक रुझान के मायने
अतीत में अपवादों को छोड़ दें तो बॉलीवुड राजनीतिक रूझानों का फिल्मों के ज़रिए ना सिर्फ फायदा उठाता रहा है, बल्कि उसके ज़रिए अपने विचारों की अभिव्यक्ति भी देता रहा है। हाल के दिनों में ‘उड़ता पंजाब’ को जहां आम आदमी पार्टी के विचारों की अभिव्यक्ति देने वाला माना गया, वहीं विवेक अग्निहोत्री निर्देशित और विवेक ओबेरॉय अभिनीत फिल्म ‘नरेंद्र मोदी’ तो प्रधानमंत्री मोदी की बायोपिक ही थी। इसी तरह ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ में मनमोहन सिंह के ढुलमुल चरित्र पर सवाल उठाया। ‘यंगिस्तान’ नाम से आई फिल्म में कहा गया कि उसका चरित्र राहुल गांधी से मिलता है। मधुर भंडारकर ने ‘इंदु सरकार’ के बारे में कहा गया कि वह इंदिरा गांधी के चरित्र पर आधारित है। इन फिल्मों के ज़रिए बॉलीवुड ने अपने राजनीतिक रूझान का परिचय दिया।
इसी तरह विक्की कौशल अभिनीत फिल्म ‘उरी’ में मोदी सरकार के सर्जिकल स्ट्राइक का ही राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश माना गया। कहा गया कि इन फिल्मों के ज़रिए मोदी सरकार को चुनावों में फायदा दिखाने की कोशिश की गई। बहरहाल कुछ एक अपवादों को छोड़ दें तो बॉलीवुड आपस में लड़ता और खेमे में बंटता कम ही नज़र आता रहा है। लेकिन अब ऐसा साफ नज़र आ रहा है।
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