एकदा
प्रार्थना-सी आभा
फकीर बुल्लेशाह हर रोज गौर से देखते कि गांव की एक बुजुर्ग महिला कुछ न कुछ गुनगुनाती हुई बड़े मनोयोग से गोबर के उपले बनाती है। पाठशाला जाते हुए कुछ शरारती बच्चे उसके बुढ़ापे पर मजाकिया गीत गाते हैं तो वो भी हंस देती है, लेकिन गुस्सा नहीं करती। इतना ही नहीं, आते-जाते हर जरूरतमंद को खुशी-खुशी सूखे उपले दे देती है ताकि उसकी मदद हो जाये। बुल्लेशाह ने एक बार एक सवाल के जवाब में अपने अनुयायियों से कहा कि खुदा को यहां-वहां मत खोजो वो आजकल उस उपले भी थापने वाली मां के अगल-बगल रहता है। अनुयायियों ने बूढ़ी महिला के नजदीक जाकर सचमुच किसी प्रार्थना स्थल जैसी पवित्रता को महसूस किया।
प्रस्तुति : पूनम पांडे
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