जन्मशती : इंद्र कुमार गुजराल
अस्सी का दशक उथल-पुथल से भरा समय था : पंजाब में पाकिस्तान प्रायोजित सिख अलगाववादी आंदोलन के चलते आंतरिक उपद्रव, फिर आप्रेशन ब्लू स्टार और सेना का स्वर्णमंदिर में प्रवेश, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और अकाली नेता हरचरण सिंह लौंगोवाल की हत्या, जम्मू-कश्मीर में 1987 में विधानसभा चुनाव में बिना सोचे-समझे हस्तक्षेप, पाकिस्तान द्वारा छद्म युद्ध छेड़े जाने से उत्पन्न आंतरिक अशांति ने देश को गंभीर जख्म दिये। इसी क्रम में नब्बे के दशक में भी परिस्थितियां निराशाजनक थीं, जिसकी शुरुआत आर्थिक संकट के रूप में हुई, फिर बोफोर्स और पनडुब्बी घोटाले की गूंज, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या, बिहार के मुख्यमंत्री लालू यादव की कथित भूमिका वाले चारा घोटाले का खुलासा और सूटकेस घोटाले के जरिये बड़ी रकम प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के आवास पर पहुंचना, पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या तथा अन्य गंभीर समस्याएं जिन्होंने सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कीं।
वर्ष 1994 के मध्य में मेरे सेवानिवृत्त होने से पहले वीपी सिंह सरकार और पीवी नरसिम्हा राव सरकारों के दौरान यह वातावरण मेरे रक्षा सचिव और गृह सचिव कार्यकाल का था। अपने कार्यकाल के दौरान तनाव की लंबी अवधि में अपने दायित्वों का बखूबी पालन करने के कारण मेरी इच्छा इस तरह की भूमिकाओं के फिर से निर्वहन में नहीं थी। हालांकि, नियति ने फिर मुझे प्रधानमंत्री गुजराल के प्रधान सचिव का दायित्व निभाने का अवसर दिया।
पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे लगता है कि गुजराल साहब की समकालीनों द्वारा जो छवि बनायी गई थी, वे उससे कहीं बेहतर श्रेय के हकदार थे। खासकर उन लोगों द्वारा, जिनके राजनीतिक समर्थन से उनकी सरकार का अस्तित्व कायम था। गुजराल शायरी के शौकीन, विनम्र, शालीन स्वभाव, गर्मजोशी वाले दिल के ऐसे इंसान थे, जिनके पास अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की साजिशों का मुकाबला करने का कौशल नहीं था। उनकी पत्नी पुष्पा गुजराल भी साहित्यिक रुझान की महिला थीं और उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखी थीं।
सरकार के उच्चतम स्तर पर व्यापक भ्रष्टाचार के प्रसार ने गुजराल साहब को व्यथित किया था। फलत: उन्होंने एक नया सत्याग्रह चलाने का निश्चय किया, जिसके जरिये रिश्वत लेने व देने वालों का सामाजिक बहिष्कार करने का आह्वान किया गया। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह रही कि अपने शासन की अमिट छाप छोड़ने वाले अपने पसंदीदा काम करने के लिये उन्हें लंबे कार्यकाल का अवसर नहीं मिल पाया।
मुझे याद है उनकी झुंझलाहट भरी प्रतिक्रिया जब मैंने प्रधानमंत्री कार्यालय में भ्रष्टाचार निरोधक सैल की व्यावहारिकता को लेकर सवाल उठाये थे। वर्षों बाद उन्होंने दुखी मन से मुझसे कहा कि इस बाबत मैं सही था। सीधे-सीधे भ्रष्टाचार के खिलाफ हमलावर नहीं हुआ जा सकता, धीरे-धीरे इसके उन्मूलन के प्रयास किये जाने चाहिए। ऐसे लक्ष्यों को हासिल करने के लिये हमारी राजनीतिक बिरादरी और समाज को पूरी तरह प्रतिबद्धता जाहिर करनी होगी।
प्रधानमंत्री देवेगौड़ा के मंत्रिमंडल में भारत के विदेश मंत्री के रूप में (उन्होंने प्रधानमंत्री की पारी में इस दायित्व को बरकरार रखा), गुजराल साहब को ‘गुजराल सिद्धांत’ के लिये याद किया जाता है, जिसके अंतर्गत हमारे पड़ोसी देशों के साथ शांतिपूर्ण व मैत्रीपूर्ण संबंध बनाये रखने के दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी गई। मगर उनके इन प्रयासों को सकारात्मक प्रतिसाद नहीं मिला। उनकी इस बात के लिए आलोचना की गई कि वे पाकिस्तान के प्रति सख्ती नहीं दिखा पाये। उनके सौम्य व्यक्तित्व व व्यवहार को उनके कमजोर व्यक्तित्व के रूप में परिभाषित करने का प्रयास किया गया जो कि पूरी तरह गलत आकलन था। तब और अब भारत अन्य दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के साथ तनावपूर्ण संबंध नहीं रख सकता क्योंकि पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने वाली भूमिका में लगातार बना हुआ है।
विभिन्न मोर्चों पर बढ़ रही समस्याओं से निपटने में मैंने प्रधानमंत्री की लगातार सहायता की। मामला राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) के सुपुर्द किए जाने से पहले मैं प्रधानमंत्री का अंतिम प्रधान सचिव था। मेरे तत्काल उत्तराधिकारी ब्रजेश मिश्र प्रधानमंत्री के पहले एनएसए थे। उस समय पीएम ने कई कठिन परिस्थितियों का सामना किया, मैं एक घटना को याद करना चाहूंगा जो वाकई परेशान करने वाली थी।
उत्तर प्रदेश विधानसभा में अभूतपूर्व हिंसा के बाद राज्य की भाजपा नीत कल्याण सिंह सरकार को विश्वासमत हासिल करना था। राज्यपाल रोमेश भंडारी (पूर्व विदेश सचिव) उभरती विशेष राजनीतिक स्थिति का अंदाजा लगाने में तो विफल रहे, लेकिन इसके बावजूद वह राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को रोजाना ‘स्थिति रिपोर्ट’ भेजते रहे। गुजराल कैबिनेट के रक्षामंत्री मुलायम सिंह उस वक्त कल्याण सिंह को हटाने और राष्ट्रपति शासन लगाने के पक्षधर थे। उन्हें इस मुद्दे पर कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी का साथ मिला था। इसमें अन्य लोग भी शामिल हो गए थे और पीएम पर राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश करने का दबाव बढ़ता जा रहा था। पीएम को सलाह देने से पहले मैं गृहमंत्री इंद्रजीत गुप्त से मिला, बतौर पूर्व गृह सचिव मेरी राय जानने के बाद उनका विचार था कि राज्यपाल की ‘तथाकथित’ रिपोर्ट खारिज किए जाने योग्य है। जब मैंने पीएम को इसकी सूचना दी तो वह इस पर सहमत तो थे, लेकिन काफी असहज। यूपी में गंभीर स्थिति की जानकारी राष्ट्रपति को देने के मेरे सुझाव को उन्होंने माना और इस प्रक्रिया में पूर्ववर्तियों के विचार भी जानने चाहे। राष्ट्रपति अनौपचारिक रूप से एक भोज, जिसकी वह मेजबानी कर रहे थे, के बाद पीएम से मिलने पर सहमत हो गए। अगली शाम, जब मैं और पीएम राष्ट्रपति से मिले तो उन्होंने कहा कि निर्वाचित सरकार को बर्खास्त करने की कोई स्थिति नहीं है।
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। अगले दिन प्रधानमंत्री ने यूपी के मुद्दे पर चर्चा के लिए कैबिनेट बैठक बुलाई। इसके अगले दिन उन्हें एक महत्वपूर्ण विदेश दौरे पर जाना था, कैबिनेट मीटिंग पूर्वाह्न में रखी गयी। कैबिनेट मीटिंग में हमने विशेषतौर पर अटॉर्नी जनरल (अशोक देसाई) और सॉलिसिटर जनरल टीआर अंध्यारुजिनातो को आमंत्रित किया। कैबिनेट मीटिंग सुबह करीब 11 बजे शुरू हो गयी और उम्मीद जताई गई कि दोपहर के भोजन से पहले यह समाप्त हो जाएगी। इस दौरान कुछ ब्रेक को (जब एजी, एसजी, कैबिनेट सचिव, गृह सचिव, विधि सचिव और मैं बैठक कक्ष से बाहर चले जाते) छोड़कर बैठक करीब 8 घंटे तक लगातार चली। अंतत: देर शाम (पीएम का फ्रांस और जर्मनी दौरान रद्द हो गया) गृह सचिव राष्ट्रपति शासन संबंधी नोट को राष्ट्रपति की संस्तुति के लिए ले गए। डेढ़ घंटे बाद राष्ट्रपति के सचिव ने सिफारिश को अस्वीकृत किए जाने संबंधी नोट भेजा।
मैंने यूपी मामले का संदर्भ कुछ विस्तार से यह दिखाने के लिए दिया है कि यद्यपि प्रधानमंत्री व्यक्तिगत तौर से आश्वस्त थे कि कल्याण सिंह को बर्खास्त नहीं किया जा सकता, वह इस लंबी पहेली को सुलझाने में असहाय थे, जिसका उन्हें कोई श्रेय भी नहीं मिला।

एन.एन. वोहरा

अपने कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री को कई ऐसे गंभीर मुद्दों का सामना करना पड़ा, जिनसे प्रभावी ढंग से निपटा नहीं जा सका, जैसे कि यूपी के मामले में उनके हाथ बंधे हुए थे और उन्हें अपने आलोचकों पर ध्यान देना था। अंतत: जैन आयोग की लीक रिपोर्ट के बाद लंबे तकरार के बाद कांग्रेस ने 28 नवंबर, 1997 को गुजराल सरकार से समर्थन वापस ले लिया। गुजराल साहब ने राष्ट्रपति को सूचना दी कि उनके पास बहुमत नहीं रहा, इसलिए ‘नैतिक आधार’ पर वह बने रहना नहीं चाहते।
गुजराल सरकार के गिरने के बावजूद केंद्र में कई नाटकीय घटनाक्रम सामने आए। वर्ष 2004 के बाद की केंद्र सरकारों ने कार्यकाल पूर्ण किया, फिर भी राष्ट्रीय राजनीति में जरूरी संतुलन के साथ ‘गठबंधन धर्म’ की अवधारणा को पूरी तरह विकसित किया जाना अभी बाकी है।

लेखक प्रधानमंत्री गुजराल के कार्यकाल में प्रधान सचिव रहे हैं।

The post प्रधानमंत्री के रूप में गुजराल से जुड़ी यादें appeared first on दैनिक ट्रिब्यून.



from दैनिक ट्रिब्यून https://ift.tt/2RhtP1b
via Latest News in Hindi

0 Comments