खस्ताहाल आर्थिकी सुधारना बड़ी चुनौती
यह चिंता का विषय है कि दुनिया में चौथा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क भारतीय रेलवे पिछले एक दशक के सबसे बड़े आर्थिक संकट से गुजर रहा है। कहने को यह दुनिया का सबसे बड़ा नियोक्ता है और इसके करीब तेरह लाख से अधिक कर्मचारी हैं। करीब डेढ़ सदी से अधिक समय से आम आदमी के यातायात का मुख्य साधन कहे जाने वाले भारतीय रेलवे की माली हालत पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग की रिपोर्ट चिंता बढ़ाने वाली है। रिपोर्ट बताती है कि कमाई के लिहाज से रेलवे पिछले दस साल से सबसे खराब दौर से गुजर रहा है। रेलवे के परिचालन अनुपात में अप्रत्याशित गिरावट आई है। उसे एक रुपये कमाने में 98.44 पैसे खर्च करने पड़ते हैं। यानी सिर्फ डेढ़ पैसे का मुनाफा मिलता है। पर्याप्त संसाधन व विपुल श्रमशक्ति के बावजूद यह स्थिति शोचनीय है। किसी भी गतिशील संस्थान की जीवंतता के लिए दो फीसदी से भी कम मुनाफा होना संकट की आहट ही है। बताया जाता है कि घाटे में वृद्धि की वजह खर्च की उच्च वृद्धि दर है। जाहिर है जुटाये गये धन का बेहतर ढंग से उपयोग नहीं हो पा रहा है। आय का बड़ा भाग रखरखाव व कर्मचारियों की फौज के वेतन-भत्ते पर खर्च हो जाता है। कैग की सिफारिश है कि बाजार से जुटाये गये धन का बेहतर ढंग से इस्तेमाल सुनिश्चित किया जाए। साथ ही पूंजीगत व्यय में कटौती की भी सिफारिश की गई है। ऐसे में कैग ने आंतरिक आय के स्रोत बढ़ाने का भी सुझाव दिया है ताकि सकल और अतिरिक्त बजटीय संसाधनों पर निर्भरता कम की जा सके, जिससे भारतीय रेलवे के लिए आय के अतिरिक्त संसाधन जुटाना संभव हो सके। यह इसलिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि भारतीय रेलवे न केवल आम आदमी के आवागमन का मुख्य जरिया है बल्कि साथ ही मूल संरचनात्मक आवश्यकताओं को पूरा करने का साधन भी है।
ऐसे में बुलेट ट्रेन जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना को मूर्त रूप देने में जुटी मोदी सरकार की पहली प्राथमिकता आम आदमी की जरूरतों के लिए रेलवे व्यवस्था में सुधार की होनी चाहिए। कर्मचारी संगठन सरकार पर निजीकरण की तरफ कदम बढ़ाने के आरोप भी लगाते रहे हैं। नि:संदेह आम आदमी के सरल-सुलभ आवागमन के विकल्प का निजीकरण व्यापक प्रतिक्रिया का वाहक बन सकता है। इसमें दो राय नहीं कि राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते रेलवे की हालत खस्ता हुई है। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि गठबंधन सरकारों में प्रभावी राजनीतिक घटकों की प्राथमिकता रेल मंत्रालय होता था। उनकी कोशिश होती थी कि अपने राज्य के लोगों को नई घोषणाओं से संतुष्ट किया जा सके। साथ ही रेलवे में अपने समर्थकों को नौकरी दी जा सके। वहीं 2008-09 में रेलमंत्री की पारी में लालू यादव द्वारा रेलवे को 25 हजार करोड़ मुनाफे पर लाने की भी खूब चर्चा हुई। इस प्रबंधन पर देश-विदेश के कई बिजनेस स्कूलों में शोध भी हुए। नि:संदेह रेलवे की आर्थिकी में तमाम तरह के छेद हैं, जिनसे निरंतर रिसाव जारी है। कैग ने अपनी रिपोर्ट में रियायती और फ्री पास के दुरुपयोग से रेलवे को कई हजार करोड़ का चूना लगाने का भी उल्लेख किया था। वर्ष 2015 से 2018 के बीच 21.75 करोड़ यात्रियों ने 7418.44 करोड़ रुपये की रियायत ली। खासकर रेलवे अधिकारियों ने विशेष पास के जरिये करोड़ों का चूना लगाया। कैग ने रेलवे अधिकारियों एवं विशेष लोगों को दी जाने वाली रियायतों को युक्तिसंगत बनाने तथा नियंत्रण प्रणाली को प्रभावी बनाने की सिफारिश की है। इन रियायतों से रेलवे को मिलने वाले किराये में 8.4 फीसदी की कमी आई है। भारतीय रेलवे के पास पर्याप्त संसाधन हैं और भरपूर श्रमशक्ति। जरूरत इस बात की है कि बेहतर प्रबंधन व रणनीतिक निर्णय से रेलवे को गति दी जाये। कुछ स्टेशनों व ट्रेनों का प्रबंधन निजी हाथों को सौंपने के प्रयासों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। बहुत संभव है कि इससे रेलवे में स्वस्थ प्रतियोगिता का विकास हो सके। नि:संदेह रेलवे ने यदि खुद को बदलते वक्त के साथ प्रतिस्पर्धी नहीं बनाया तो सरकार के पास निजीकरण की ओर बढ़ने के सिवाय कोई चारा नहीं होगा। सशक्त रेलवे कर्मचारी संगठनों को भी इस दिशा में सजगता और गंभीरता से सोचना होगा।

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