निर्विघ्न रहे गुरु का प्रकाश पर्व
भारतीय उपमहाद्वीप के तमाम उतार-चढ़ाव वाले घटनाक्रमों के बीच आज करतारपुर गलियारे का खुलना श्रद्धा की शीतल बयार के साथ और भी बहुत कुछ है। यदि दोनों देशों के बीच दशकों पुराने कटुता-द्वेष के अध्याय को दरकिनार कर दिया जाता तो नि:संदेह इस गलियारे का खुलना इस महाद्वीप की एक ऐतिहासिक घटना होती। बहरहाल, हकीकत यह है कि करोड़ों भारतीय सिखों के आधी सदी से अधिक पुराने अरमान पूरे हो रहे हैं। यदि पाकिस्तान अपनी दुरभिसंधियों से मुक्त होकर दिल से यह कोशिश करता और उसके पीछे छिपा एजेंडा न होता तो यह कदम दोनों देशों के संबंधों में नये अध्याय को जोड़ रहा होता। बहरहाल, आज से गलियारा खुलने के बाद पाक की सीमा में स्थित करतारपुर साहब गुरुद्वारा भारतीय श्रद्धालुओं की पहुंच में होगा, जिसको अभी तक श्रद्धालु भारतीय सीमा से दूरबीन के जरिये देखते आ रहे थे। नि:संदेह अब सिख श्रद्धालु उस जगह से अपने अहसासों को जोड़ सकेंगे, जहां सिख धर्म के संस्थापक, गुरु नानक जी ने जीवन के आखिरी पड़ाव में साधना की। यह एक ऐसा महत्वपूर्ण अवसर है जब दो राष्ट्रों, विभिन्न संप्रदायों तथा राजनीतिक दलों को एक मंच पर आने का मौका मिला है। इस अवसर ने भिन्न-भिन्न आस्था-विश्वासों और राजनीतिक चिंतन से इतर जोड़ने की पहल की है। पर्व पर जन-जन करीब आये हैं। सही मायनों में यह गुरु नानक देव के बताये हुए रास्ते पर चलना ही है। गुरु ने सिखाया था कि एक समतामूलक समाज की स्थापना के लिए जरूरी है, प्यार बांटना और एक-दूसरे का सम्मान सुनिश्चित करना। नि:संदेह हम इसी रास्ते पर कुछ कदम चले हैं। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पिछले दिनों पंजाब विधानसभा के विशेष सत्र को संबोधित करते हुए गुरु के उपदेशों को अंगीकार करने का आह्वान किया था। यह सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि हम तमाम मतभेदों को नकार कर मानवता का मार्ग प्रशस्त करें।
नि:संदेह गुरु की 550वीं जयंती ने श्रद्धालुओं को ही नहीं अपितु राजनीतिक दलों को भी एक मंच पर आने का अवसर दिया। पंजाब विधानसभा का विशेष सत्र पंजाब और हरियाणा के विधायकों को एक साथ लाने में सफल हुआ। आधी सदी के बाद दोनों राज्यों के जनप्रतिनिधि एक हॉल में बैठे नजर आये। इनमें हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा, पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंद्र सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल भी शामिल रहे। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने भी इस मौके पर गुरु की विरासत का जिक्र किया। मगर, पाकिस्तान द्वारा श्रद्धालुओं पर करतारपुर गुरुद्वारे के दर्शन के लिए लगाये जा रहे बीस डॉलर के वीजा शुल्क की तार्किकता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। इस मुद्दे पर कैप्टन अमरेंद्र सिंह और प्रकाश सिंह बादल तमाम राजनीतिक मतभेदों के बावजूद मुखर रहे। यहां तक कि उन्होंने इसे मुगल शासकों द्वारा लगाये गये अन्यायपूर्ण जजिया कर की संज्ञा तक दी थी। नि:संदेह पाक की नीति-नीयत को लेकर लगातार शंकाएं व्यक्त की जाती रही हैं। ऐसा ही विवाद पासपोर्ट की अनिवार्यता को लेकर भी रहा है, जहां पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कुछ समय तक पासपोर्ट की अनिवार्यता में छूट देने की बात कही थी, वहीं पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता की तरफ से पासपोर्ट को लेकर अनिवार्यता की बात कही गई, जिससे श्रद्धालुओं में भ्रम की स्थिति देखी गई। इसके बावजूद यह अच्छी बात है कि भारत में सभी राजनीतिक दल गुरु के 550वें प्रकाशोत्सव पर एकजुट हुए हैं। कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल ने कहा है कि वे सुल्तानपुर लोधी और डेरा बाबा नानक में होने वाले एक-दूसरे के कार्यक्रमों में भागीदारी करेंगे। नि:संदेह गुरु नानक की शिक्षाएं सदियों से विभिन्न धर्मों-विचारों के लोगों को एक साथ लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं। यदि सभी पक्ष मतभेदों को भुलाकर एकजुट हो सकें तो यह गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। यही गुरु के 550वें प्रकाश पर्व को मनाना सार्थक भी करेगा।

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