दान का श्रेय
नगर सेठ सुखराम के पास जितनी अधिक धन-दौलत थी उससे कहीं अधिक विनम्रता थी। नगर में न जाने कितने विद्यालय, प्याऊ और धर्मशालाएं आदि उनके नाम से बने हुए थे। मगर, उन्हें इनका गर्व छू तक नहीं गया था। उनके यहां सदा भंडारा चलता रहता था। वह दृष्टि नीची किए प्रतिदिन भोजन एवं वस्त्रादि बांटा करते थे। वह बिना किसी को देखे, बिना भेदभाव के दान दिया करते थे। एक बार संत सर्वदानन्द भी उनके दान के बारे में सुनकर उनके भंडारे में चले आए और याचकों की पंक्ति में खड़े हो गए। उनका नम्बर आया, मगर वह दान सामग्री लेकर खड़े ही रहे तो सुखराम जी ने नज़र उठाकर देखा और सामने एक संत को पाया। संत ने उनसे पूछा, ‘आप इतना उच्च कार्य करते हैं मगर लोगों की प्रशंसा की ज़रा भी कामना नहीं। आपकी इन नीची नज़रों का रहस्य क्या है।’ तब सुखराम बोले, ‘स्वामी जी, देने वाला तो कोई और है। मैं तो बस माध्यम मात्र हूं और लोग मुझे दानी समझते हैं। किसी और की कृपा का श्रेय मुझे मिलता देखकर ही मुझे लज्जा आती है, अतः मेरा अपनी नज़रें नीची रखना ही श्रेयस्कर है।’
प्रस्तुति : मुकेश कुमार जैन

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