कैदियों की रिहाई के लिए नयी लक्ष्मण रेखा
अनूप भटनागर
स्वतंत्रता दिवस पर कैदियों की सज़ा में छूट देकर उन्हें रिहा करने के लिये राज्य सरकार और राज्यपाल को संविधान के अनुच्छेद 161 में प्रदत्त अधिकार के इस्तेमाल पर शीघ्र ही एक लक्ष्मण रेखा खिंच सकती है। इसकी वजह दंड प्रक्रिया संहिता में स्पष्ट प्रावधान के बावजूद हरियाणा सरकार की कैदियों को रिहा करने संबंधी 2019 की नीति है, जिसके तहत उम्रकैद की सज़ा पाये 75 साल के कैदी को मात्र आठ साल जेल में बिताने के बाद राज्यपाल ने तथ्यों और दूसरी सामग्री की छानबीन के बगैर ही संविधान के अनुच्छेद 161 में प्रदत्त अधिकार का इस्तेमाल करते हुए रिहा कर दिया था।
उच्चतम न्यायालय ने 1978 के पांच सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा मारू राम प्रकरण में प्रतिपादित व्यवस्था और तीन न्यायाधीशों की पीठ के फैसलों का जिक्र करते हुए दो सवाल सात सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेजे हैं। संविधान पीठ को अब यह व्यवस्था देनी है कि क्या संविधान के अनुच्छेद 161 में प्रदत्त अधिकारों का इस्तेमाल करके ऐसी नीति तैयार की जा सकती है, जिसमें प्रतिपादित मानदंडों का पालन करने के बाद कार्यपालिका किसी भी मामले में तथ्यों और सामग्री को राज्यपाल के समक्ष पेश किये बगैर ही किसी कैदी को सज़ा में छूट का लाभ दे सकती है और क्या इस तरह की कवायद दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 433-ए की जरूरतों को दरकिनार कर सकती है।
संविधान के अनुच्छेद 161 में जहां राज्यपाल को कुछ मामलों में सज़ा निलंबित करने, उसे माफ करने या उसमें बदलाव करने का अधिकार दिया गया है वहीं दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 433-ए में कुछ मामलों में राज्यपाल के इन अधिकारों पर पाबंदियां लगायी गयी हैं। धारा 433-ए यह भी कहती है कि दोषी जेल से तब तक रिहा नहीं किया जा सकता, जब तक उसने कम से कम 14 साल की सज़ा पूरी ना कर ली हो, यह प्रावधान उन कैदियों पर लागू होता है, जिन्हें ऐसे मामलों में उम्रकैद की सज़ा दी गई है, जिनमें अधिकतम मृत्युदंड का प्रावधान है या फिर जिसकी सज़ा मृत्युदंड से परिवर्रित होकर उम्रकैद बनी है। इस प्रावधान से स्पष्ट है कि किसी भी स्थिति में उम्रकैद की सज़ा पाने वाले कैदी को जेल में 14 साल गुजारे बगैर इस तरह की छूट का लाभ नहीं मिल सकता । यह तथ्य हत्या के जुर्म में उम्रकैद की सज़ा भुगत रहे एक कैदी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया । पता चला कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 433-ए के प्रावधान के बावजूद 2019 में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर एक सामान्य सज़ा माफी की नीति के तहत उसे रिहा कर दिया गया है। शीर्ष अदालत ने पाया कि अनुच्छेद 161 के तहत कैदियों को सज़ा से माफी देने के मामले में प्रत्येक के तथ्य और दूसरी सामग्री राज्यपाल के समक्ष नहीं रखी गयी थी।
शीर्ष अदालत की दो सदस्यीय खंडपीठ ने 2012 में इस मुद्दे पर विराम लगाते हुए अपने फैसले में कहा था कि सज़ा में माफी देना एक कानूनी प्रावधान है लेकिन इसके मनमाने तरीके से इस्तेमाल पर अंकुश लगाने के इरादे से विधायिका ने इसमें कुछ ऐसे प्रावधान किये हैं, जिनका पालन जरूरी है। न्यायालय ने यह भी कहा था कि कैदियों को सामूहिक रूप से माफी नहीं दी जा सकती और प्रत्येक मामले की वस्तुस्थिति के आधार पर ही निर्णय लेना होगा।
हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर सरकार दो अगस्त, 2019 को इस संबंध में एक नीतिगत फैसला लिया। इसके तहत संविधान के अनुच्छेद 161 में प्रदत्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए राज्यपाल ने 15 अगस्त, 2019 को कैदियों के एक वर्ग की सज़ा माफ करने का निर्णय किया था। इस विशेष श्रेणी में ऐसे कैदी थे, जिन्हें उम्रकैद की सज़ा मिली थी और पुरुषों के मामले में उनकी आयु 75 साल से ज्यादा तथा महिलाओं के मामले में उनकी आयु 65 साल से अधिक थी और पुरुष कैदियों ने 15 अगस्त, 2019 को आठ साल तथा महिला कैदियों ने छह साल की वास्तविक सज़ा पूरी कर ली थी। राज्य सरकार के इस नीतिगत निर्णय के दायरे से कई श्रेणी के कैदियों को बाहर रखा गया था। इनमें वे कैदी भी शामिल थे, जिनकी मौत की सज़ा उम्रकैद में तबदील हुई थी। इसी तरह, 14 साल से कम उम्र के बच्चों के अपहरण और उनकी हत्या, बलात्कार और हत्या, डकैती और लूटपाट, टाडा, शासकीय गोपनीयता कानून, विदेशी नागरिक कानून, पासपोर्ट कानून और एनडीपीएस कानून के तहत दोषी कैदियों सहित कई श्रेणियों को इससे बाहर रखा गया था।
उम्मीद है कि उम्रकैद की सज़ा पाये कैदियों को माफी देने के सवाल पर सात सदस्यीय संविधान पीठ स्पष्ट व्यवस्था देगी जिसके बाद किसी की राज्य सरकार को अनुच्छेद 161 में सज़ा में माफी देने के मामले में अपनी मर्जी चलाने का अवसर नहीं मिलेगा और ऐसे मामलों में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 433-ए के प्रावधान का पालन किया जायेगा।
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