बहुरंगी रचना संसार की अभिव्यक्ति
पुस्तक समीक्षा
सुशील ‘हसरत’ नरेलवी
समीक्ष्य काव्य-संग्रह ‘गुबार’ कवयित्री एवं शिक्षाविद् डॉ. अंजु सक्सेना द्वारा रचित उनका प्रथम काव्य-संसार है। भावनाओं के सागर में विचरती तो कभी तट की सुध लेती, यादों संग कलोलरत मंथन में उलझती, सामाजिक परिवेश की ऊंच-नीच तथा मानव-मन की स्वार्थपरकता को खंगालती, रिश्ते-नातों से बतियाती हुई स्त्री-मन की अनुभूतियों को जब काग़ज़ पर उकेरती हैं कवयित्री तो 70 कविताएं अपना आकार लेकर ‘गुबार’ के साये में माहौल को मुनव्वर करने का प्रयास करने लगती हैं।
स्त्री-हृदय से प्रस्फुटित होते उद्गारों में अन्तर्निहित टीस कई कविताओं में गहन अनुभूति का ज़रिया बनती है। कविता ‘स्त्री की व्यथा’ की ये पंक्तियां महसूस कीजिए ः ‘मैं बंधी बंधन में/ तुम बंधकर भी न बंध सके/ मैं ही सदा चली संग तुम्हारे/ तुम साथ रहकर भी संग ना चल सके।’
इस संग्रह की कविताएं राजनीतिक परिदृश्य का भी जायज़ा लेती हुई बेबाकी से अपनी बात कहती है। ‘सौदा न कीजिए’ के कवितांश ः ‘आप कहते हैं कि/ लोकतंत्र ख़तरे में है/ ज़रा ग़रेबान में झांकिए/ आपका ईमान ख़तरे में है/ कुर्सी के लिए कितना गिरेंगे/ ग़लत को आंख बन्द कर/कब तक सही कहेंगे।’
कविता ‘गुबार’ मरुस्थल की तपन का आभास देती हुई कहीं न कहीं नायिका के हृदय की तपिश को भी भांप लेती है।
कवयित्री का रचना-संसार बहुरंगी है। उसका कवि मन अपने आस-पास हो रहे बदलाव से भी अछूता नहीं है। विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण अच्छे कवि का स्वाभाविक गुण है। कविता ‘बेनूर’ की कुछ पंक्तियां : ‘रिश्ते वही चलते हैं/ जो अपनापन लिए हों/ तअल्लुक़ वही बेनज़ीर हैं/ जो बेतक़ल्लुफ़ हों/ बेहिसाब तक़ल्लुफ़ तो/ तआरुफ़ बेहतर दिखाने की अदा है।’
‘गुबार’ की कुछ कविताओं के भाव एवं बिम्ब मन को उद्वेलित करते हैं तो कुछ चिंतन की ओर उन्मुख। इनसे कुछेक सांकेतिक दृश्य भी उत्पन्न होते हैं तो कुछ भाव अपनेपन की बारिश में भिगो जाते हैं। काव्य-कृति ‘गुबार’ विश्वास दिलाती है कि कवयित्री ऊंची उड़ान का सामर्थ्य रखती है। काव्य-कथ्य में विषय की विविधता भी देखने को मिलती है। छन्दमुक्त किन्तु अन्तर्निहित लयात्मकता को बरकरार रखती हैं कविताएं।
पुस्तक : गुबार कवयित्री : डॉ. अंजु सक्सेना प्रकाशक : साहित्यागार, धामाणी मार्केट की गली, जयपुर पृष्ठ : 125 मूल्य : रु. 200.
आम के हक में खड़ी कविताएं
राजेन्द्र बड़गूजर
राजकुमार जैन ‘राजन’ द्वारा सद्य-प्रकाशित कविता-संग्रह ‘सपनों के सच होने तक’ एक भाव-प्रवण और वर्तमान परिदृश्य में एक कवि हृदय का सहज उद्गार है। इस कविता-संग्रह में इक्यावन कविताएं हैं, जिसमें कवि की विभिन्न भाव-भंगिमाएं और विषय-विविधता प्रकट हुई है।
कवि राजकुमार जैन ‘राजन’ इन विषम सामाजिक स्थितियों को सूक्ष्मता के साथ महसूस करते हैं। वे धर्म-ध्वजाओं, सांस्कृतिक परंपराओं और झूठे आडंबरों की अपेक्षा मानव की गरिमा और पहचान को अधिक महत्त्व देते हैं। कविता ‘मेरे भीतर बहती नदी’ में वे मानव सभ्यता में सकार को ढूंढ़ते हैं। ‘संवेदनाओं की फसल’ कविता में कवि ने स्वार्थी मनुष्य के परिप्रेक्ष्य को उद्घाटित किया है कि किस प्रकार एक स्वार्थी व्यक्ति अपने आसपास की दुनिया को अपने हित साधन रूप में घड़ लेता है।
कवि अपनी कविता में आश्वस्त है कि संवेदनाओं और मूल्यों की किरण इस नफरत के माहौल को संतुलित कर ही लेगी। कविता-संग्रह की पहली ही कविता ‘उजाले की ओर’ में कवि बेहतर दुनिया बनाने के लिए सपनों, आशा, खुशी और प्यार को ही पैमाने के रूप में देखता है। एक बेहतर मनुष्य बनने का विकल्प हमेशा खुला रखता है। हर विकट स्थिति में – सपनों की दुनिया देखें/ आशा की किरणें बुनें/ खुशियों की चादर सजा दें/ दुनिया बसा लें हम प्यार की/ जहां मनुष्य और भी/ बेहतर मनुष्य बनें। कवि सकारात्मकता की ओर उन्मुख है।
कवि का कथन कितनी गहरी पीड़ा संजोए हुए है :- ‘संवेदना/ अपने मृत हो जाने का/ शंखनाद कर रही है।’ कवि श्रम-सीकरों और सहृदयता में मानवता का पुनर्जन्म देखता है। संग्रह की बहुत ही सुंदर कविता है ‘समर्थन’ जिसमें कवि – ‘आंधियों को मिटने दो/ कोई तो दिन होगा/ जो हमारी मुट्ठी में होगा/ प्रकाश देगा/ जीवन में जीत के लिए।’ के माध्यम से से मानव की जिजीविषा का आह्वान करता है।
‘ईश्वर मर गया है’ कविता में कवि गहरे रोष में है। कवि विषमताओं के जंगल में झंखाड़ों से लहूलुहान भी है। परंतु जिजीविषा वह वहां भी नहीं छोड़ता। शब्दों में ईश्वर की अपेक्षा मानव की सत्ता पर अधिक विश्वास व्यक्त हुआ है। संग्रह की कविताएं आम आदमी के पक्ष में खड़ी कविताएं हैं।
पुस्तक : सपनों के सच होने तक कवि : राजकुमार जैन ‘राजन’ प्रकाशक : अयन प्रकाश्ान, महरौली, नयी दिल्ली पृष्ठ : 130 मूल्य : रु. 260.
कुंडलियों में सुलझा ज्ञान
कमलेश भारतीय
ज्ञान-विज्ञान को काफी जटिल समझा जाता है। हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्रों में यह और भी मुश्किल, लेकिन अच्छा शिक्षक क्या ग्रामीण तो क्या शहरी दोनों क्षेत्र के बच्चों को पढ़ाना चाहे तो रोचक ढंग से पढ़ा और समझा सकता है। सत्यवीर नाहड़िया ऐसे ही कुशल शिक्षक हैं। उन्होंने ज्ञान विज्ञान को सरल कुंडली छंद के जरिये में पहुंचाने की कोशिश की है। इनके माध्यम से पर्यावरण रक्षा, स्वच्छता, प्रकृति से प्रेम, नवग्रह की जानकारी और ज्ञान विज्ञान के महत्व पर प्रकाश डाला है। प्रदूषण नियंत्रण के साथ-साथ समाज और विज्ञान के रिश्ते को भी सामने रखा है ।
सिर्फ एक सौ बत्तीस कुंडलियों में सत्यवीर नाहड़िया ने बड़ी कुशलता और सरलता से ज्ञान की बातें बताई हैं। सरस्वती की आराधना से शुरू कर कुदरत की रक्षा और पौधरोपण तक संदेश ही संदेश हैं। इस सरलता से कुंडलियां लिखना भी एक कला है और इस कला में लेखक दक्ष हैं। हां, इस छोटी-सी पुस्तिका का मूल्य कुछ कम होता तो बेहतर था।
पुस्तक : कुंडलियां – ग्यान बिग्यान की हरियाणवी कुंडलियां लेखक : सत्यवीर नाहड़िया प्रकाशक : सत्यगीत प्रकाशन, रेवाड़ी पृष्ठ : 132 मूल्य : रु. 100.
The post बहुरंगी रचना संसार की अभिव्यक्ति appeared first on दैनिक ट्रिब्यून.
from दैनिक ट्रिब्यून https://ift.tt/2ZFYsBc
via Latest News in Hindi
0 Comments