मोह का बंधन
एक शिष्य ने गुरु से पूछा, मोह और ममता से दूर रहने के लिए आप अपने प्रवचनों में इतना जोर क्यों देते हैं। गुरु ने गंभीर होकर कहा, मोह-ममता का अर्थ है, तुमने अपने प्राण अपने से हटाकर कहीं और रख दिये। किसी ने अपने बेटे में रख दिये हैं, किसी ने अपनी पत्नी में, किसी ने धन में, किसी ने पद में रख दिये हैं, जहां होना चाहिए प्राण वहां नहीं है। तुम्हारे भीतर प्राण नहीं धड़क रहा है, कहीं और धड़क रहा है, तब तुम मुसीबत में रहोगे, यही मोह संसार है, क्योंकि जहां-जहां तुमने प्राण रख दिये हैं, उनके तुम गुलाम हो जाओगे, बेबस हो जाओगे और फिर तुम अपनी इच्छानुसार कुछ भी नहीं कर पाओगे।
प्रस्तुति : सुभाष बुड़ावनवाला

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