कालजयी कहानी
चन्द्रधर शर्मा गुलेरी

चित्रांकन : संदीप जोशी

बड़े-बड़े शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की जुबान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है और कान पक गये हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बूकार्ट वालों की बोली का मरहम लगायें। जब बड़े-बड़े शहरों की चौड़ी सड़कों पर घोड़े की पीठ चाबुक से धुनते हुए, इक्केवाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट-सम्बन्ध स्थिर करते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आंखों के न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरों की अंगुलियों के पोरे को चींघकर अपने-ही को सताया हुआ बताते हैं, और संसार-भर की ग्लानि, निराशा और क्षोभ के अवतार बने, नाक की सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग चक्करदार गलियों में, हर-एक लड्ढी वाले के लिए ठहर कर सब्र का समुद्र उमड़ा कर बचो खालसाजी। हटो भाईजी। ठहरना भाई जी। आने दो लाला जी। कहते हुए सफेद फेटों, खच्चरों और बत्तकों, गन्ने, खोमचे और भारेवालों के जंगल में से राह खेते हैं। क्या मजाल है कि जी और साहब बिना सुने किसी को हटना पड़े। यह बात नहीं कि उनकी जीभ चलती नहीं; पर मीठी छुरी की तरह महीन मार करती हुई। यदि कोई बुढ़िया बार-बार चितौनी देने पर भी लीक से नहीं हटती, तो उनकी बचनावली के ये नमूने हैं—हट जा जीणे जोगिए; हट जा करमा वालिए; हट जा पुतां प्यारिए; बच जा लम्बी वालिए। समष्टि में इनके अर्थ हैं, कि तू जीने योग्य है, तू भाग्योंवाली है, पुत्रों को प्यारी है, लम्बी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहिये के नीचे आना चाहती है? बच जा।
ऐसे बम्बूकार्ट वालों के बीच में होकर एक लड़का और एक लड़की चौक की एक दुकान पर आ मिले।
उसके बालों और इसके ढीले सुथने से जान पड़ता था कि दोनों सिख हैं। वह अपने मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था, और यह रसोई के लिए बड़ियां। ‘तेरे घर कहां है?’ ‘मगरे में; और तेरे?’ ‘मांझे में; यहां कहां रहती है?’
‘अतरसिंह की बैठक में; वे मेरे मामा होते हैं।’ ‘मैं भी मामा के यहां आया हूं, उनका घर गुरुबाजार में हैं।’
इतने में दुकानदार निबटा, और इनका सौदा देने लगा। सौदा लेकर दोनों साथ-साथ चले। कुछ दूर जाकर लड़के ने मुस्कुराकर पूछा, ‘तेरी कुड़माई हो गई?’ इस पर लड़की कुछ आंखें चढा कर धत्ा‍् कहकर दौड़ गई, और लड़का मुंह देखता रह गया।
दूसरे-तीसरे दिन सब्जीवाले के यहां, दूधवाले के यहां अकस्मात्ा्् दोनों मिल जाते। महीना-भर यही हाल रहा। दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा, तेरी कुड़माई हो गई? और उत्तर में वही ‘धत्ा् मिला। एक दिन जब फिर लड़के ने वैसे ही हंसी में चिढ़ाने के लिये पूछा तो लड़की, लड़के की संभावना के विरुद्ध बोली—‘हां हो गई।’
‘कब?’ ‘कल, देखते नहीं, यह रेशम से कढा हुआ सालू।’ लड़की भाग गई। लड़के ने घर की राह ली।
‘राम-राम, यह भी कोई लड़ाई है। दिन-रात खन्दकों में बैठे हड्डियां अकड़ गईं। लुधियाना से दस गुना जाड़ा और मेंह और बरफ ऊपर से। पिंडलियों तक कीचड़ में धंसे हुए हैं। जमीन कहीं दिखती नहीं; घंटे-दो-घंटे में कान के परदे फाड़ने वाले धमाके के साथ सारी खन्दक हिल जाती है और सौ-सौ गज धरती उछल पड़ती है।
इस गैबी गोले से बचे तो कोई लड़े। नगरकोट का जलजला सुना था, यहां दिन में पचीस जलजले होते हैं। जो कहीं खन्दक से बाहर साफा या कुहनी निकल गई, तो चटाक से गोली लगती है। न मालूम बेईमान मिट्टी में लेटे हुए हैं या घास की पत्तियों में छिपे रहते हैं।’
‘लहनासिंह, और तीन दिन हैं। चार तो खन्दक में बिता ही दिये। अपने हाथों झटका करेंगे और पेट-भर खाकर सो रहेंगे। उसी फिरंगी मेम के बाग में मखमल का-सा हरा घास है। फल और दूध की वर्षा कर देती है। कहती है, तुम राजा हो , मेरे मुल्क को बचाने आये हो।’
‘चार दिन तक पलक नहीं झंपी। बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही। मुझे तो संगीन चढ़ा कर मार्च का हुक्म मिल जाए। फिर सात जर्मनों को अकेला मारकर न लौटूं। …उस दिन धावा किया था-चार मील तक एक जर्मन नहीं छोड़ा था। पीछे जनरल ने हट जाने का कमान दिया, नहीं तो-’
‘नहीं तो सीधे बर्लिन पहुंच जाते! क्यों?’ सूबेदार हजारसिंह ने मुस्कराकर कहा— ‘लड़ाई के मामले जमादार या नायक के चलाये नहीं चलते। बड़े अफसर दूर की सोचते हैं।’ ‘सूबेदारजी, सच है’ लहनासिंह बोला- ‘पर करें क्या? हड्डियों-हड्डियों में तो जाड़ा धंस गया है। सूर्य निकलता नहीं, और खाई में दोनों तरफ से चम्बे की बावलियों के से सोते झर रहे हैं। एक धावा हो जाए, तो गरमी आ जाए।’
‘उदमी, उठ, सिगड़ी में कोले डाल। वजीरा, तुम चार जने बालटियां लेकर खाई का पानी बाहर फेंको। महासिंह, शाम हो गई है, खाई के दरवाजे का पहरा बदल ले।’—यह कहते हुए सूबेदार सारी खन्दक में चक्कर लगाने लगे।
वजीरासिंह पलटन का विदूषक था। बाल्टी में गंदला पानी भर कर खाई के बाहर फेंकता हुआ बोला—‘मैं पाधा बन गया हूं। करो जर्मनी के बादशाह का तर्पण!’ इस पर सब खिलखिला पड़े और उदासी के बादल फट गये।
लहनासिंह ने दूसरी बाल्टी भर कर उसके हाथ में देकर कहा—‘अपनी बाड़ी के खरबूजों में पानी दो। ऐसा खाद का पानी पंजाब-भर में नहीं मिलेगा।’ ‘हां, देश क्या है, स्वर्ग है। मैं तो लड़ाई के बाद सरकार से दस धुमा जमीन यहां मांग लूंगा और फलों के बूटे लगाऊंगा।’ ‘लाडी होरा को भी यहां बुला लोगे? या वही दूध पिलानेवाली फरंगी मेम…’
‘चुप कर। यहां वालों को शरम नहीं।’ ‘देश-देश की चाल है। आज तक मैं उसे समझा न सका कि सिख तम्बाखू नहीं पीते। वह सिगरेट देने में हठ करती है, होंठों में लगाना चाहती है, और मैं पीछे हटता हूं तो समझती है कि राजा बुरा मान गया, अब मेरे मुल्क के लिये लड़ेगा नहीं।’
‘अच्छा, अब बोधसिंह कैसा है?’ ‘अच्छा है।’ ‘जैसे मैं जानता ही न होऊं! रात-भर तुम अपने कम्बल उसे उढाते हो और आप सिगड़ी के सहारे गुजर करते हो। उसके पहरे पर आप पहरा दे आते हो। अपने सूखे लकड़ी के तख्तों पर उसे सुलाते हो, आप कीचड़ में पड़े रहते हो। कहीं तुम न मांदे पड़ जाना। जाड़ा क्या है, मौत है, और निमोनिया से मरने वालों को मुरब्बे नहीं मिला करते।’ ‘मेरा डर मत करो। मैं तो बुलेल की खड्ड के किनारे मरूंगा। भाई कीरतसिंह की गोदी पर मेरा सिर होगा और मेरे हाथ के लगाये हुए आंगन के आम के पेड़ की छाया होगी।’
वजीरासिंह ने त्योरी चढ़ाकर कहा—‘क्या मरने-मारने की बात लगाई है? मरें जर्मन और तुरक! हां भाइयो, कैसे।’ दिल्ली शहर तें पिशोर नुं जांदिए, कर लेणा लौंगां दा बपार मडिए; कर लेणा नादेड़ा सौदा अड़िए (ओय) लाणा चटाका कदुए नुं।
कौन जानता था कि दाढियावाले, घरबारी सिख ऐसा लुच्चों का गीत गायेंगे, पर सारी खन्दक इस गीत से गूंज उठी और सिपाही फिर ताजे हो गये, मानो चार दिन से सोते और मौज ही करते रहे हों।
दोपहर रात गई है। अन्धेरा है। सन्नाटा छाया हुआ है। बोधासिंह खाली बिस्कुटों के तीन टिनों पर अपने दोनों कम्बल बिछा कर और लहनासिंह के दो कम्बल और एक बरानकोट ओढ़ कर सो रहा है। लहनासिंह पहरे पर खड़ा हुआ है। एक आंख खाई के मुंह पर है और एक बोधासिंह के दुबले शरीर पर। बोधासिंह कराहा।
‘क्यों बोधा भाई, क्या है?’ ‘पानी पिला दो।’ लहनासिंह ने कटोरा उसके मुंह से लगाकर पूछा—‘कहो कैसे हो?’ पानी पीकर बोधा बोला—‘कंपनी छुट रही है। रोम-रोम में तार दौड़ रहे हैं। दांत बज रहे हैं।’ ‘अच्छा, मेरी जरसी पहन लो!’
‘और तुम?’ ‘मेरे पास सिगड़ी है और मुझे गर्मी लगती है। पसीना आ रहा है।’ ‘ना, मैं नहीं पहनता। चार दिन से तुम मेरे लिये…।’ ‘हां, याद आई। मेरे पास दूसरी गरम जरसी है। आज सबेरे ही आई है। विलायत से बुन-बुनकर भेज रही हैं मेमें, गुरु उनका भला करें।’ यों कह कर लहना अपना कोट उतारकर जरसी उतारने लगा।
‘सच कहते हो?’ ‘और नहीं झूठ?’ यों कहकर नहीं करते बोधा को उसने जबरदस्ती जरसी पहना दी और आप खाकी कोट और जीन का कुरता भर पहन-कर पहरे पर आ खड़ा हुआ। मेम की जरसी की कथा केवल कथा थी। आधा घंटा बीता। इतने में खाई के मुंह से आवाज आई—‘ सूबेदार हजारासिंह।’ ‘कौन लपटन साहब? हुक्म हुजूर!’ कहकर सूबेदार तन कर फौजी सलाम करके सामने हुआ।
‘देखो, इसी समय धावा करना होगा। मील भर की दूरी पर पूरब के कोने में एक जर्मन खाई है। उसमें पचास से जियादह जर्मन नहीं हैं। इन पेड़ों के नीचे-नीचे दो खेत काट कर रास्ता है। जहां मोड़ है वहां पन्द्रह जवान खड़े कर आया हूं। तुम यहां दस आदमी छोड़कर सबको साथ ले उनसे जा मिलो। खन्दक छीन कर वहीं, जब तक दूसरा हुक्म न मिले, डटे रहो। हम यहां रहेगा।’
‘जो हुक्म।’ चुपचाप सब तैयार हो गये। बोधा भी कम्बल उतारकर चलने लगा। तब लहनासिंह ने उसे रोका। लहनासिंह आगे हुआ तो बोधा के बाप सूबेदार ने उंगली से बोधा की ओर इशारा किया। लहनासिंह समझ कर चुप हो गया। पीछे दस आदमी कौन रहें, इस पर बड़ी हुज्जत हुई। कोई रहना न चाहता था। समझा-बुझाकर सूबेदार ने मार्च किया।
शायद साहब शराब पिये हुए हैं और उन्हें बाल कटवाने का मौका मिल गया है? लहनासिंह ने जांचना चाहा। लपटन साहब पांच वर्ष से उसकी रेजिमेंट में थे। ‘क्यों साहब, हम लोग हिन्दुस्तान कब जाएंगे?’ ‘लड़ाई खत्म होने पर। क्यों, क्या यह देश पसन्द नहीं?’ ‘नहीं साहब, शिकार के वे मजे यहां कहां? याद है, पारसाल नकली लड़ाई के पीछे हम आप जगाधरी जिले में शिकार करने गये थे। हां-हां-वहीं जब आप खोते पर सवार थे और और आपका खानसामा अब्दुल्ला रास्ते के एक मन्दिर में जल चढ़ाने को रह गया था? बेशक पाजी कहीं का-सामने से वह नील गाय निकली कि ऐसी बड़ी मैंने कभी न देखी थी। और आपकी एक गोली कन्धे में लगी और पुट्ठे में निकली। ऐसे अफसर के साथ शिकार खेलने में मजा है। अचानक अंधेरे में किसी सोने वाले से वह टकराया।
‘कौन? वजीर सिंह?’ ‘हां, क्यों लहना? क्या कयामत आ गई? जरा तो आंख लगने दी होती?’
‘होश में आओ। कयामत आई और लपटन साहब की वर्दी पहन कर आई है।’ ‘क्या?’ ‘लपटन साहब या तो मारे गये है या कैद हो गये हैं। उनकी वर्दी पहन कर यह कोई जर्मन आया है। सूबेदार ने इसका मुंह नहीं देखा। मैंने देखा और बातें की हैं। सोहरा साफ उर्दू बोलता है, पर किताबी उर्दू। और मुझे पीने को सिगरेट दिया है?’ ‘तो अब!’
‘अब मारे गये। धोखा है। सूबेदार होरा, कीचड़ में चक्कर काटते फिरेंगे और यहां खाई पर धावा होगा। उठो, एक काम करो। पल्टन के पैरों के निशान देखते-देखते दौड़ जाओ। अभी बहुत दूर न गये होंगे। सूबेदार से कहो एकदम लौट आयें। खन्दक की बात झूठ है। चले जाओ, खन्दक के पीछे से निकल जाओ।’ ‘हुकुम तो यह है कि यहीं…’ ‘ऐसी तैसी हुकुम की! मेरा हुकुम-जमादार लहनासिंह जो इस वक्त यहां सब से बड़ा अफसर है, उसका हुकुम है। मैं लपटन साहब की खबर लेता हूं।’ ‘पर यहां तो तुम आठ हैं।’ ‘आठ नहीं, दस लाख। एक-एक अकालिया सिख सवा लाख के बराबर होता है। चले जाओ।’
लौट कर खाई के मुहाने पर लहनासिंह दीवार से चिपक गया। उसने देखा कि लपटन साहब ने जेब से बेल के बराबर तीन गोले निकाले। तीनों को जगह-जगह खन्दक की दीवारों में घुसेड़ दिया और तीनों में एक तार सा बांध दिया। तार के आगे सूत की एक गुत्थी थी, जिसे सिगड़ी के पास रखा। बाहर की तरफ जाकर एक दियासलाई जलाकर गुत्थी रखने… बिजली की तरह दोनों हाथों से उल्टी बन्दूक को उठाकर लहनासिंह ने साहब की कुहनी पर तान कर दे मारा। धमाके के साथ साहब के हाथ से दियासलाई गिर पड़ी। लहनासिंह ने एक कुन्दा साहब की गर्दन पर मारा और साहब आंख! मीन गौट्ट कहते हुए चित्त हो गये। लहनासिंह ने तीनों गोले बीन कर खन्दक के बाहर फेंके और साहब को घसीट कर सिगड़ी के पास लिटाया। जेबों की तलाशी ली। तीन-चार लिफाफे और एक डायरी निकालकर उन्हें अपनी जेब के हवाले किया।
साहब की मूर्च्छा हटी। लहनासिंह हंस कर बोला—‘क्यों लपटन साहब? मिजाज कैसा है? आज मैंने बहुत बातें सीखीं। लहना ने पतलून की जेबों की तलाशी नहीं ली थी। साहब ने मानो जाड़े से बचने के लिए, दोनों हाथ जेबों में डाले। लहनासिंह कहता गया— चालाक तो बड़े हो पर मांझे का लहना इतने बरस लपटन साहब के साथ रहा है। उसे चकमा देने के लिये चार आंखें चाहिये। तीन महीने हुए एक तुरकी मौलवी मेरे गांव आया था। औरतों को बच्चे होने के ताबीज बांटता था और बच्चों को दवाई देता था। …मंडी के बनियों को बहकाता कि डाकखाने से रुपया निकाल लो। सरकार का राज्य जाने वाला है।’
साहब की जेब में से पिस्तौल चला और लहना की जांघ में गोली लगी। इधर लहना की हैनरी मार्टिन के दो फायरों ने साहब की कपाल-क्रिया कर दी। धड़ाका सुनकर सब दौड़ आये। बोधा चिल्लाया—‘क्या है?’ लहनासिंह ने उसे यह कहकर सुला दिया कि एक हड़का हुआ कुत्ता आया था, मार दिया और, औरों से सब हाल कह दिया। सब बन्दूकें लेकर तैयार हो गये। लहना ने साफा फाड़कर घाव के दोनों तरफ पट्टियां कस कर बांधी। घाव मांस में ही था। पट्टियों के कसने से लहू निकलना बन्द हो गया।
इतने में सत्तर जर्मन चिल्लाकर खाई में घुस पड़े। सिखों की बन्दूकों की बाढ़ ने पहले धावे को रोका। दूसरे को रोका। पर यहां थे आठ (लहनासिंह तक-तक कर मार रहा था-वह खड़ा था, और, और लेटे हुए थे) और वे सत्तर। अपने मुर्दा भाइयों के शरीर पर चढ़ कर जर्मन आगे घुसे आते थे। थोड़े से मिनिटों में अचानक आवाज आई वाह गुरुजी की फतह? वाह गुरुजी का खालसा!! और धड़ाधड़ बन्दूकों के फायर जर्मनों की पीठ पर पड़ने लगे। ऐन मौके पर जर्मन दो चक्की के पाटों के बीच में आ गये। पीछे से सूबेदार हजारसिंह के जवान आग बरसाते थे और सामने लहनासिंह के साथियों के संगीन चल रहे थे। पास आने पर पीछे वालों ने भी संगीन पिरोना शुरू कर दिया।
एक किलकारी और-अकाल सिक्खां दी फौज आई! वाह गुरुजी दी फतह! वाह गुरुजी दा खालसा! सत श्री अकालपुरुख! और लड़ाई खत्म हो गई। तिरेसठ जर्मन या तो खेत रहे थे या कराह रहे थे। सिक्खों में पन्द्रह के प्राण गये। सूबेदार के दाहिने कन्धे में से गोली आरपार निकल गई। लहनासिंह की पसली में एक गोली लगी। उसने घाव को खन्दक की गीली मट्टी से पूर लिया और बाकी का साफा कस कर कमरबन्द की तरह लपेट लिया। किसी को खबर न हुई कि लहना को दूसरा घाव-भारी घाव लगा है।
लड़ाई के समय चांद निकल आया था, ऐसा चांद, जिसके प्रकाश से संस्कृत-कवियों का दिया हुआ क्षयी नाम सार्थक होता है। और हवा ऐसी चल रही थी जैसी वाणभट्ट की भाषा में ‘दन्तवीणो पदेशाचार्य’ कहलाती। वजीरा सिंह कह रहा था कि कैसे मन-मन भर फ्रांस की भूमि मेरे बूटों से चिपक रही थी, जब मैं दौड़ा-दौड़ा सूबेदार के पीछे गया था। सूबेदार लहनासिंह से सारा हाल सुन और कागजात पाकर वे उसकी तुरत-बुद्धि को सराह रहे थे और कह रहे थे कि तू न होता तो आज सब मारे जाते।
इस लड़ाई की आवाज तीन मील दाहिनी ओर की खाई वालों ने सुन ली थी। उन्होंने पीछे टेलीफोन कर दिया था। वहां से झटपट दो डाक्टर और दो बीमार ढोने की गाडि़यां चलीं, जो कोई डेढ़ घण्टे के अन्दर-अन्दर आ पहुंची। फील्ड अस्पताल नजदीक था। मामूली पट्टी बांधकर एक गाड़ी में घायल लिटाये गये और दूसरी में लाशें रखी गईं। लहना को छोड़कर सूबेदार जाते नहीं थे। यह देख लहना ने कहा-’तुम्हें बोधा की कसम है, और सूबेदारनीजी की सौगन्ध है जो इस गाड़ी में न चले जाओ।’
‘और तुम?’ ‘मेरे लिये वहां पहुंचकर गाड़ी भेज देना, और जर्मन मुरदों के लिये भी तो गाडि़यां आती होंगी। मेरा हाल बुरा नहीं है। देखते नहीं, मैं खड़ा हूं? वजीरासिंह मेरे पास है ही।’ ‘अच्छा, पर…’
‘बोधा गाड़ी पर लेट गया? भला। आप भी चढ़ जाओ। सुनिये तो, सूबेदारनी होरां को चिट्ठी लिखो, तो मेरा मत्था टेकना लिख देना। और जब घर जाओ तो कह देना कि मुझसे जो उसने कहा था वह मैंने कर दिया।’ गाड़ियां चल पड़ी थीं। सूबेदार ने चढ़ते-चढ़ते लहना का हाथ पकड़ कर कहा—‘तैने मेरे और बोधा के प्राण बचाये हैं। लिखना कैसा? साथ ही घर चलेंगे। अपनी सूबेदारनी को तू ही कह देना। उसने क्या कहा था?’ गाड़ी के जाते लहना लेट गया। ‘वजीरा पानी पिला दे, और मेरा कमरबन्द खोल दे। तर हो रहा है।’ मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ हो जाती है। जन्म-भर की घटनायें एक-एक करके सामने आती हैं। सारे दृश्यों के रंग साफ होते हैं। समय की धुन्ध बिल्कुल उन पर से हट जाती है।
लहनासिंह बारह वर्ष का है। अमृतसर में मामा के यहां आया हुआ है। दहीवाले के यहां, सब्जीवाले के यहां, हर कहीं, उसे एक आठ वर्ष की लड़की मिल जाती है। जब वह पूछता है, तेरी कुड़माई हो गई? तब धत्ा् कह कर वह भाग जाती है। एक दिन उसने वैसे ही पूछा, तो उसने कहा – ‘हां, कल हो गई, देखते नहीं यह रेशम के फूलोंवाला सालू? सुनते ही लहनासिंह को दुःख हुआ। क्रोध हुआ। क्यों हुआ?
‘वजीरासिंह, पानी पिला दे।’ पचीस वर्ष बीत गये। अब लहनासिंह नं 77 रैफल्स में जमादार हो गया है। उस आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा। न-मालूम वह कभी मिली थी, या नहीं। सात दिन की छुट्टी लेकर जमीन के मुकदमे की पैरवी करने वह अपने घर गया। वहां रेजिमेंट के अफसर की चिठ्ठी मिली कि फौज लाम पर जाती है, फौरन चले आओ। साथ ही सूबेदार हजारासिंह की चिट्ठी मिली कि मैं और बोधसिंह भी लाम पर जाते हैं। लौटते हुए हमारे घर होते जाना। लहनासिंह सूबेदार के यहां पहुंचा। जब चलने लगे, तब सूबेदार बेढे़ में से निकल कर आया। बोला- ‘लहना, सूबेदारनी तुमको जानती है, बुलाती है। जा मिल आ।’ लहनासिंह भीतर पहुंचा। सूबेदारनी मुझे जानती है? कब से? रेजिमेंट के क्वार्टरों में तो कभी सूबेदार के घर के लोग रहे नहीं। दरवाजे पर जाकर मत्था टेकना कहा। असीस सुनी। लहनासिंह चुप। मुझे पहचाना?’ ‘नहीं।’
तेरी कुड़माई हो गई-धत‍् -कल हो गई- देखते नहीं, रेशमी बूटोंवाला सालू-अमृतसर में… भावों की टकराहट से मूर्च्छा खुली। करवट बदली। पसली का घाव बह निकला। वजीरा, पानी पिला-उसने कहा था। स्वप्न चल रहा है। सूबेदारनी कह रही है—‘मैंने तेरे को आते ही पहचान लिया। एक काम कहती हूं। मेरे तो भाग फूट गये। सरकार ने बहादुरी का खिताब दिया है, लायलपुर में जमीन दी है, आज नमक-हलाली का मौका आया है। पर सरकार ने हम तीमियों की एक घंघरिया पल्टन क्यों न बना दी, जो मैं भी सूबेदारजी के साथ चली जाती? एक बेटा है। फौज में भर्ती हुए उसे एक ही बरस हुआ। उसके पीछे चार और हुए, पर एक भी नहीं जिया। सूबेदारनी रोने लगी। अब दोनों जाते हैं। मेरे भाग! तुम्हें याद है, एक दिन टांगेवाले का घोड़ा दहीवाले की दुकान के पास बिगड़ गया था। तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाये थे, आप घोड़े की लातों में चले गये थे, और मुझे उठा-कर दुकान के तख्ते पर खड़ा कर दिया था। ऐसे ही इन दोनों को बचाना। यह मेरी भिक्षा है। तुम्हारे आगे आंचल पसारती हूं।’ रोती-रोती सूबेदारनी ओबरी में चली गई। लहना भी आंसू पोंछता हुआ बाहर आया। वजीरासिंह, पानी पिला-उसने कहा था। लहना का सिर अपनी गोद में रक्खे वजीरासिंह बैठा है। जब मांगता है, तब पानी पिला देता है। आध घंटे तक लहना चुप रहा, फिर बोला—‘कौन! कीरतसिंह?’ वजीरा ने कुछ समझकर कहा—‘हां।’ ‘भइया, मुझे और ऊंचा कर ले। अपने पट्ट पर मेरा सिर रख ले।’ वजीरा ने वैसे ही किया। ‘हां, अब ठीक है। पानी पिला दे। बस, अब के हाड़ में यह आम खूब फलेगा। चचा-भतीजा दोनों यहीं बैठकर आम खाना। जितना बड़ा तेरा भतीजा है, उतना ही यह आम है। जिस महीने उसका जन्म हुआ था, उसी महीने में मैंने इसे लगाया था।’ वजीरासिंह के आंसू टप-टप टपक रहे थे। कुछ दिन पीछे लोगों ने अखबारों में पढ़ा-फ्रांस और बेलजियम-68वीं सूची-मैदान में घावों से मरा नं. 77 सिख राइफल्स जमादार लहनसिंह।
साभार : हिंदी समय डॉट कॉम

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