नस्ल और फसल बचाने का वक्त
सहीराम
जी नहीं, प्रेमिका का जिक्र बिल्कुल नहीं है, हालांकि यह सच है कि इस अंदाज में उन्हें ही याद किया जाता है। लेकिन अब तो यह अंदाज भी कहां रह गया। अब तो उन्हें याद करते हुए जुबां पर गाली होती है और हाथ में चाकू होता है। खैर, न तो यह उस रसीले इश्क का किस्सा है और न ही यह इस कमीने इश्क का किस्सा है। हम तो टिड्डियों की बात कर रहे हैं। बड़े दिनों बाद आयी हैं। कभी खूब आया करती थीं। बीमारियों और महामारियों की तरह, अकाल और दुर्भिक्ष की तरह, सूखे और बाढ़ की तरह, गरीबी और भुखमरी की तरह। अच्छी बात यह है कि अब सब लौट रहे हैं धीरे-धीरे। वैसे ही जैसे परदेश जाने वाले मजदूर गांव लौट रहे हैं धीरे-धीरे, पैदल चलते हुए, थके-मांदे और भूखे-प्यासे। अब जैसे बीमारियां और महामारियां लौटी हैं, वैसे ही टिड्डियां भी लौट आयीं। महामारियों और टिड्डियों की तरह भूख और गरीबी भी कम से कम गांवों में तो लौट ही आयी है मजदूरों के साथ। बीमारी तथा महामारी, अकाल और दुर्भिक्ष, भूख और गरीबी जहां इनसानी नस्ल को खाती है, वैसे ही टिड्डियां फसल को खाती हैं। हालांकि, फसलों को खाने वाले और भी बहुत हैं। पुराने जमाने में मदर इंडिया फेम के सुक्खी लाला होते थे, लेकिन आढ़तिए तो अब भी होते ही हैं। नकली बीज और दवाइयां बेचने वाले भी फसल खाऊ ही होते हैं। सरकारी खरीद घोटालों में भी फसल खाऊ होने की काफी संभावनाएं मौजूद हैं।
हमने बीमारी और महामारी को भगाने के लिए तालियां-थालियां और शंख बजाए थे। हमें क्या पता था कि टिड्डियां भगाने के लिए भी बर्तन-भांडे और कनस्तर बजाने पड़ेंगे। मतलब बर्तन-भांडे बजाने का सही समय तो अब आया है। लगता है उत्साह में हमने गलत वक्त पर वे बजा दिए थे। अब प्रधानमंत्री को भी यह आह्वान करते हुए क्या पता था कि कोरोना के खिलाफ जंग इतनी लंबी चल जाएगी। उन्हें लगा था कि जब महाभारत का युद्ध अठारह दिन में जीत लिया था, तो महामारी के खिलाफ युद्ध को ज्यादा से ज्यादा इक्कीस दिन में जीत लेंगे। इसलिए पटाखे चलवा दिए। बर्तन पिटवा दिए। फिर अर्थव्यवस्था पिटने लगी, थोड़े दिन मजदूर पिटे, विभिन्न राज्यों की सीमाओं पर पिटे, हाईवेज पर पिटे, रेल की पटरियों पर पिटे। अब पिटने की बारी खुद जनता की है। देखिए नंबर सबका आएगा। बच कोई नहीं सकता। बहरहाल, सरकारें अभी खुश रह सकती हैं। लेकिन अपने लिए तालियां पिटवाने को तो वे भी तरस ही जाएंगी। चलो फिलहाल तो घर के दरवाजों और बालकनियों से बाहर निकलो, खेतों में जाओ और बर्तन-भांडे पीटो। देखो टिड्डियां आयी हैं और बहुत दिनों बाद आयी हैं। क्योंकि नस्ल भी बचानी है और फसल भी बचानी है।
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