आशीर्वाद की शुचिता
दुर्योधन को अपनी माता गांधारी की वचन-सिद्धि का विश्वास था। युद्ध में दुर्योधन पांडवों से पराजित होता जा रहा था, जब उसके पास कोई मार्ग नहीं बचा तो वह अपनी माता के पास गया और विजय प्राप्त करने का आशीर्वाद मांगने लगा तो गांधारी ने कहा—‘जहां धर्म होगा वहीं जीत होगी।’ मां के इस आशीर्वाद से दुर्योधन का उद्देश्य पूर्ण नहीं हो रहा था। वह स्पष्ट शब्दों में अपनी विजय का आशीर्वाद चाहता था। माता से उसने फिर वैसा ही आग्रह किया। तो गांधारी ने अपने पुत्र दुर्योधन को बताया कि आशीर्वाद तभी तक सफल होते है, जब तक वे नीति, न्याय और धर्म के साथ जुड़े रहते हैं। पक्षपात से प्रेरित होने पर आशीर्वाद निष्फल ही नहीं बल्कि आशीर्वाद देने वाले की सामर्थ्य भी समाप्त हो जाती है।’
प्रस्तुति : किरणपाल बुम्बक

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