एकदा
प्रजा दुख का अहसास
जैन दार्शनिक राजकवि हेमचंद्र सूरि सौराष्ट्र के गांवों से होते हुए निकले। गांवों में सर्वत्र अभाव देखकर उनका हृदय करुणा से भर उठा। एक किसान ने सन और सूत से मिलाकर बुना हुआ एक मोटा वस्त्र आचार्य के चरणों में रखते हुए कहा, यह वस्त्र मेरी पत्नी ने आपके लिए बुना है। आप इसे स्वीकार कर हमें कृतार्थ करें। कवि हेमचंद्र ने तत्काल राज्य प्रदत्त वस्त्र उतारकर वह मोटा वस्त्र पहन लिया और सीधे राजधानी पाटण लौट गये। उनके आगमन का समाचार सुनकर महाराज कुमारपाल सामंतों और श्रेष्ठियों के साथ उनके स्वागत को आए। किंतु राजकवि के वस्त्रों पर नजर पड़ते ही उन्हें घोर पीड़ा हुई। यह तो गुर्जर देश का बड़ा ही दुर्भाग्य है, आचार्य! यह मेरे लिए मरण का विषय है, राजा बोले। जैन संत ने तीखे स्वर में कहा, तुम्हारी अधिकांश प्रजा ऐसे ही वस्त्र तो पहना करती है। क्या इससे तुम्हें पीड़ा और मरण का अनुभव नहीं होता? भला मुझ वीतराग के प्रति तुम्हारी ऐसी अनुभूति क्यों? तुम मुझे राजवस्त्र पहनाकर प्रजा की सुख समृद्धि नहीं छीन सकते, मेरा यह ग्राम्य वस्त्र कोटि-कोटि राजवस्त्रों से श्रेष्ठ है। यह सुनकर राजा कुमारपाल को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने ग्रामीणों को वस्त्र बांटे। प्रस्तुति : शशि सिंघल
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