करनी की भरनी

एक धनी सेठ कंजूस तो था ही, अधार्मिक और पत्नी के प्रति भी असहनशील था। कुछ समय पश्चात पत्नी का निधन हो गया तो सेठ भी अकेलापन सह ना सका और हृदयगति रुकने से परलोक वासी हो गया। उससे घृणावश कोई भी उसके शव का अंतिम संस्कार करने तक को तैयार न था। कुछ लोग उसके शव को उठाकर नदी किनारे श्मशान घाट पर रख आए, जहां वह बिना संस्कार के ही पड़ा रहा। वहीं एक साधु का आश्रम भी था। शाम हुई तो एक भूखा सियार वहां आया और सेठ के शव को खाने के लिए लपका। यह देखकर साधु बोला— अरे सियार, यह एक पापी का शव है। तू क्यों निंदनीय शरीर खाना चाहता है। सियार बोला— मैं भूखा हूं अतः मैं इसके हाथ और पैर ही खा लेता हूं। साधु ने कहा— अरे, इन हाथों ने कभी दान नहीं दिया और पैरों ने हमेशा दूसरों को कुचला है। सियार फिर गिड़गिड़ाया— तो मैं इसके आंख और कान ही खा लेता हूं। साधु ने समझाया— इन कानों ने कभी प्रवचन नहीं सुने और आंखें सदा राग-रंग ही देखती रहीं। बाकी बचा पेट और सिर, वह पेट भी पाप के अन्न से भरा हुआ है और सिर हमेशा घमंड से ही तना हुआ रहता था। आगे जैसी तेरी इच्छा। सेठ के कर्मों का पूर्ण विवरण सुनकर सियार का मन भी खिन्न हो गया और वह शव को बिना स्पर्श किए हुए ही वहां से चला गया।                                                     प्रस्तुति : मुकेश कुमार जैन

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