मनोवैज्ञानिक उपचार में ही है समाधान
लॉकडाउन में घरेलू हिंसा
अनूप भटनागर
कोरोना वायरस महामारी से उत्पन्न संकट से निपटने के लिए देश में लॉकडाउन लागू होने के बाद कामकाजी महिलाओं और किशोर-किशोरियों को घर से बाहर यौन उत्पीड़न तथा यौन हिंसा के अपराधों से राहत मिल गयी है। वहीं दूसरी ओर अब घरेलू हिंसा और बच्चों के उत्पीड़न की घटनाओं में इजाफा होने लगा है। आखिर कहीं इनका कारण लॉकडाउन की वजह से उत्पन्न अवसाद तो नहीं है। अगर कोई अवसाद या असामान्य व्यवहार से प्रभावित है तो किसी चिकित्सक या मनोचिकित्सक से सलाह लेना ज्यादा बेहतर होगा।
पिछले करीब तीन सप्ताह से लॉकडाउन की वजह से घरों के भीतर रहने को मजबूर परिवारों के बीच अक्सर छोटी-छोटी बातों पर कहासुनी होती है। कई बार यह गंभीर रूप ले लेती है। इसकी प्रमुख वजह कामकाजी दंपतियों के साथ ही सामान्य परिवारों के सदस्यों का अधिकांश समय घर की चारदीवारी में ही व्यतीत करना है। ऐसी स्थिति में मामूली-सी तकरार कभी-कभी लक्ष्मण रेखा लांघ जाना भी है। घरेलू हिंसा और बच्चों के उत्पीड़न की घटनाओं से निपटने के लिए देश में महिलाओं को घरेलू हिंसा से संरक्षण और किशोर न्याय (देखभाल और संरक्षण) कानून में अनेक प्रावधान हैं। सवाल है कि क्या कोरोना वायरस महामारी के दौर में घरेलू हिंसा और बच्चों के उत्पीड़न की शिकायतों के मामले में इन कानूनों के तहत कार्रवाई उचित होगी? शायद नहीं।
यह सही है कि इस समय चाइल्ड हेल्पलाइन और राष्ट्रीय महिला आयोग तथा राज्य महिला आयोगों को मिलने वाली शिकायतों में वृद्धि हुई है। लेकिन मौजूदा समय में इन शिकायतों पर कानूनी कार्रवाई करने की बजाय परिवार के सदस्यों के साथ बातचीत करके उन्हें परामर्श देकर घर का माहौल सामान्य बनाने का प्रयास सर्वोत्तम उपाय होगा। पुलिस में मामला दर्ज होने के बाद कई बार चीजें बिगड़ जाने की संभावना रहती है।
हां, घरेलू हिंसा या फिर बच्चों के उत्पीड़न के बारे मिली शिकायतों की छानबीन के बाद अगर पहली नजर में किसी गंभीर अपराध के संकेत मिलते हैं तो निश्चित ही कानून को अपना काम करना होगा। राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस तथ्य का संज्ञान लिया है कि लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा की घटनाओं में वृद्धि हुई है। आयोग ने हाल ही में कहा था कि था कि 24 मार्च को शुरू हुये लॉकडाउन के पहले पखवाड़े में उसे केवल ई-मेल से घरेलू हिंसा के बारे में 90 शिकायतें मिलीं।
आयोग के अनुसार संभव है कि घरेलू हिंसा के मामलों की संख्या इससे ज्यादा रही हो। हिंसा करने वाले सदस्यों के लगातार घरों में रहने या फिर शिकायत करने की स्थिति में असुरक्षा या प्रताड़ना का सामना करने के भय से महिलाएं आगे नहीं आ रही हैं। आयोग ने घरेलू हिंसा से महिलाओं को बचाने हेतु शिकायत दर्ज कराने की सुविधा उपलब्ध कराने के इरादे से एक व्हाट्सएप नंबर भी जारी किया है। चाइल्ड हेल्पलाइन इंडिया के अनुसार 24 से 31 मार्च के बीच उसे वैसे तो तीन लाख से ज्यादा शिकायतें मिलीं, लेकिन इनमें से 92,105 शिकायतें बच्चों के खिलाफ हिंसा और उत्पीड़न के बारे में थीं। कोरोना वायरस महामारी से जंग के माहौल में घरों में भी अज्ञात किस्म का तनाव व्याप्त है। इसमें ऑफिस द्वारा कामकाजी दंपतियों को घर से ही काम करने की सुविधा प्रदान करने की भूमिका का भी योगदान हो सकता है।
सरकार द्वारा खींची गयी ‘लक्ष्मण रेखा’ का पालन करने की बाध्यता के बीच घर के भीतर कैद अनेक परिवारों के सदस्य रोजगार, बच्चों की पढ़ाई, घर के खर्च, आजीविका के साधन, बीमारी की स्थिति में संभावित खर्च जैसी किसी न किसी प्रकार की चिंता की वजह से अवसाद, असुरक्षा और तनाव की आशंकाओं के बीच भविष्य का तानाबाना बुन रहे हैं। ऐसी स्थिति में परिवार के सदस्यों के किसी भी तरह के असामान्य या अनियंत्रित व्यवहार को तूल देने की बजाय इसकी गंभीरता को समझने और असामान्य आचरण कर रहे व्यक्ति की मन:स्थिति को महसूस करने की आवश्यकता है।
कोरोना वायरस महामारी के दंश से देश में बहुत बड़ी संख्या में कामकाजी लोग ही नहीं, बल्कि घरों को संभालने वाली गृहणियों और किशोरवय संतानों के साथ ही बुजुर्गों के अवसादग्रस्त होने, असामान्य व्यवहार करने अथवा मनोविकार का शिकार होने की आशंका बढ़ गयी है। इस तरह के मनोविकार का शिकार होने वाले जनता के जीवन को फिर से पटरी पर लाना सरकार और सामान्य चिकित्सकों के साथ ही मनोचिकित्सकों के लिए बहुत चुनौतीभरा काम है। हां, इस तरह के अवसाद और असामान्य व्यवहार के शिकार व्यक्तियों का जीवन पटरी पर लाने में योग और ध्यान प्रक्रियाएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
बेहतर है कि इन घटनाओं को कानूनी प्रक्रिया के दायरे में लाने की बजाय ऐसे मामलों को समझा-बुझाकर हल किया जाये। किसी मनोचिकित्सक की मदद भी ली जा सकती है।
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