सरस्वती रमेश

कविताएं जितनी हमारी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति का माध्यम होती हैं, उतनी ही हमारे भीतर पल रही जिज्ञासाओं, सवालों, बेचैनियों की वाहक भी। सुषमा कपिल का हाल ही में आया कविता संग्रह ‘हदों से बाहर आते हुए’ दरअसल, अनुभूतियों से अधिक बेचैनियों की अभिव्यक्ति है। धरती से आकाश तक फैली हुई ये बेचैनियां बहुत विस्तृत और विराट हैं। कुछ वाजिब से सवाल भी उठाती हैं कवयित्री अपनी कविताओं के माध्यम से। तो कुछ सवालों के ऐसे उत्तर देती हैं कि उनसे भी पाठक के मन में एक सवाल उपज जाए।
हद में रहना जितना कठिन है
उतना ही कठिन
बन चुकी हदें तोड़ना।
कविताओं का फलक विस्तृत है। इसमें स्त्री अस्मिता से जुड़े प्रश्नों के साथ दरकते मानवीय संबंधों का दर्द भी है। परिवार में हो रही बुजुर्गों की बेकद्री की दास्तां बताती है कविता ‘एकल परिवार में’। कविता ‘दो टूक बात’ एक विखंडित समय में प्रेम की तलाश है। कविता ‘केवल द्वार नहीं’ द्वंद्वों को उजागर करती हैं : ‘इस दरवाजे के दो पाट/ एक पाट बंद/ तो एक पाट खुला…’
इसी तरह कविता ‘बेटी की तरह’ बेटियों के स्नेही आचरण को प्रकृति के अनुपम सौंदर्य के जरिए उकेरती है।
‘ताजगी सुबह की
चहचहाती, बोलती
उजाला पसारती
बेटी की तरह’
कुल मिलाकर संग्रह की कविताएं रिश्तों और मानवीय मूल्यों में आये बदलावों को अभिव्यक्त करती हैं। इन कविताओं को पढ़ना पीढ़ियों के द्वंद्वों से उपजी बेचैनियों से साक्षात्कार करने जैसा है।
पुस्तक : हदों से बाहर आते हुए कवयित्री : सुषमा कपिल प्रकाशन : साहित्य रत्नाकर पृष्ठ : 92 मूल्य : रु 175.

हताशा में मुस्कुराहट लाने की कोशिश
अशोक गौतम

एक समय वह भी था जब व्यंग्य हर साहित्यिक विधा का विधान, परिधान हुआ करता था, जिसका हर साहित्यिक विधा के साथ कोई न कोई अनुबंध रहता था।
और आज एक समय यह भी है कि व्यंग्य का हर साहित्यिक विधा से यह अनुबंध होने के बाद भी अब वह स्वच्छंद है। वजह, अब उसने अपने को अपनी अलग पहचान दी है । उसका अपना अस्तित्व है। उसे अब अपने होने के लिए दूसरों के आलंबन की जरूरत नहीं। उसके अब अपने गुण धर्म हैं।
आज हंसते-हंसाते हुए विचारने का कौशल किसी साहित्यिक विधा के पास है तो वह साहित्यिक विधा है व्यंग्य। अपने इसी कौशल की परंपरा में प्रो. शाम लाल कौशल का व्यंग्य संग्रह ‘हे बेशर्मी! तेरी सदा ही जय हो’ एक नया प्रयोग है। इस संग्रह के व्यंग्यों के माध्यम से प्रो. शाम लाल कौशल के भीतर के व्यंग्यकार ने स्वयं पर हंसने के बहाने हंसाते हुए उन्हें विचारने को विवश करने की सार्थक कोशिश की है। व्यंग्य की वैचारिक, औपचारिक भूमि पर प्रो. शामलाल कौशल का व्यंग्य संग्रह हास्य व्यंग्यात्मक शैली द्वारा अपने समाज को समाज की उन चिरपरिचित विभिन्न विसंगतियों से हमें हंसते हुए रूबरू करवाता है, जो हमारे द्वारा कहीं न कहीं, खुद के लिए, खुद ही खड़ी की गई हैं।
प्रो. शामलाल कौशल के व्यंग्य संग्रह ‘हे बेशर्मी! तेरी सदा ही जय हो’ में जो खास है, वह यह नहीं कि इसमें दिमाग को झकझोरने वाले 37 व्यंग्य हैं जो विभिन्न कोणों से व्यक्ति की सहजात विसंगतियों पर प्रहार करते हैं, परंतु इस संग्रह के व्यंग्यों की खासियत यह है कि ये व्यंग्य कहीं न कहीं हम सब के जीवन के कड़वे सच हैं? इस संग्रह में व्यंग्यकार ने बेशर्मी के बहाने अपने समाज की मनःस्थितियों को व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति दी है। इस व्यंग्य संग्रह के व्यंग्य पाठकों को हंसाने के साथ-साथ अपने आसपास की विसंगतियों के बारे में सोचने के लिए भी विवश करेंगे।
पुस्तक : हे बेशर्मी! तेरी सदा ही जय हो लेखक : प्रो. शाम लाल कौशल प्रकाशक : दीप कंप्यूटर, पृष्ठ : 119 मूल्य : रु. 200.

शायरी में ज़िंदगी के साफ रंग
नाज़ खान

हाल में आया डॉ. गणेश गायकवाड़ का ग़ज़ल संग्रह ‘धूप का मुसाफिर’ ने ध्यान खींचा है। पेशे से डाॅक्टर और हर लम्हा मरीजों से घिरे रहने के बावजूद उनके अंदर के शायर ने आह भरी और नतीजे में यह ग़ज़ल संग्रह सामने आया। उनके इस संग्रह पर नजर करते हुए मशहूर शायर मुनव्वर राना ने भी लिखा है कि ‘वह जिंदगी की समस्याओं और विषय को इस अंदाज में लिखते हैं कि जिंदगी और शायरी के रंग बहुत साफ नज़र आने लगते हैं।’
एक तरफ उनकी गजल मुहब्बत के रंग में मुस्कुरा रही है, तो वहीं उन्होंने अपने शब्दों की मिठास को कुछ इस तरह शब्दों में उकेरा है कि ‘कानों में सभी के मैं जो रस घोल रहा हूं, मां ने जो सिखाया था वही बोल रहा हूं।’ जहां उनकी ग़ज़लों में मुहब्बत, जज्बातों की चाश्ानी लुत्फ को बढ़ाती है, वहीं विकास की आंधी में गांवों के बदलते माहौल को भी उन्होंने अपनी ग़ज़ल का विषय बनाया है। वह लिखते हैं, ‘गांव ने अपने तरक्की तो बहुत कर ली मगर, अब भी महफूज वो आंगन का शजर है कि नहीं।’
एक कलमकार, शायर की कलम से निकले शब्द न सिर्फ अपने समाज और माहौल का आईना होते हैं, बल्कि वह अपने हालात पर बेबाकी से लिखता भी है। फिर चाहे समाज की कोई ज्वलंत समस्या उसके माथे पर बल ले आई हो या सियासत, मुहब्बत के बदलते रूप ने उसे कलम उठाने पर मजबूर किया हो। वह सवाल उठाते हैं, ‘चाहत के नाम पर कभी नफरत के नाम पर, कब तक बहेगा खून सियासत के नाम पर?’ उनकी ग़ज़ल आदमी की बात करती है, उसकी संवेदनाओं को उकेरती है और उसके जीने के सलीके पर भी कुछ यूं नजर दौड़ाती है, ‘सब लोग उजाले का पता पूछ रहे हैं, इस दौर में जीने की अदा पूछ रहे हैं।’
पुस्तक : धूप का मुसाफिर  लेखक  : डॉ. गणेश गायकवाड़  प्रकाशक : संवेदना प्रकाशन  पृष्ठ : 128 मूल्य : रु. 200.

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