लगता है, लोकतंत्र की प्रचलित परिभाषा को बदलने का समय आ गया है। लोकतंत्र की प्रचलित परिभाषा है : जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन, लेकिन इधर देखने में आ रहा है कि यह राजनेताओं के द्वारा, राजनेताओं के लिए, राजनेताओं का शासन बनकर रह गया है। बेशक अब भी चुनाव में मतदाता ही भावी सरकार की बाबत जनादेश देते हैं, लेकिन राजनेताओं की महत्वाकांक्षाएं और उन्हें पूरा करने के लिए आजमायी जाने वाली हरसंभव तिकड़में उसे ठेंगा दिखाने में संकोच नहीं करतीं। नवीनतम उदाहरण मध्य प्रदेश का है, जहां अब कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के पतन के बाद शिवराज सिंह चौहान की अगुवाई में भाजपा सरकार की वापसी की संभावनाएं प्रबल हो गयी हैं। यह सच है कि 15 साल की कथित सत्ता विरोधी भावना के बावजूद शिवराज के नेतृत्व में भाजपा ने कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने दिया और वह सपा-बसपा एवं निर्दलीय विधायकों के समर्थन से ही सरकार बना पायी लेकिन 15 महीने में ही सरकार गिर जाना बताता है कि चुनावी हार-जीत के परे भी सरकार बनाने-गिराने का खेल खेला जा सकता है।

राजकुमार सिंह

ऐसा नहीं है कि अतीत में जोड़तोड़ से सरकार बनाने-गिराने का खेल नहीं खेला जाता था। दलबदल के जरिये ऐसा खेल खेलने में कोई भी राजनीतिक दल पीछे नहीं रहा। उसी दलबदल पर अंकुश के लिए राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में दलबदल निरोधक विधेयक लाया गया था। संविधान की दसवीं अनुसूची में शामिल दलबदल कानून के मुताबिक अब किसी संसदीय या विधायक दल में विभाजन के लिए दो-तिहाई सदस्यों का होना जरूरी है। हालांकि इस कानून को राजीव गांधी को लोकसभा में मिले अभूतपूर्व बहुमत के बावजूद कांग्रेस में विभाजन की आशंका से जोड़ कर देखा गया था। राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में तो वैसी नौबत नहीं आयी, लेकिन बाद में सत्ता के खिलाडि़यों ने उस कानून में भी तमाम छिद्र ढूंढ लिये। नरसिंह राव के नेतृत्व वाली अल्पमत कांग्रेस सरकार को स्थिरता प्रदान करने के लिए तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष शिवराज पाटिल ने विभाजन को जारी रहने वाली प्रक्रिया करार दे दिया तो उत्तर प्रदेश में केशरीनाथ त्रिपाठी समेत कई राज्यों में विधानसभा अध्यक्ष भी कानूनी छिद्रों की आड़ में संविधान और लोकतंत्र की पवित्रता तार-तार करते रहे। विधानसभा और सरकार का कार्यकाल पूरा हो जाने तक ये माननीय दलबदल संबंधी याचिकाओं का निपटारा ही करने से बचते रहे।
चौंकाने वाली बात यह है कि वर्ष 2014 में केंद्र और फिर कई राज्यों में सत्ता पाने के बाद आक्रामक भाजपा ने बहुमत से पीछे छूट जाने पर भी सरकार बनाने का नया जुगाड़ खोज लिया है। यह जुगाड़ है सत्तारूढ़ गैर भाजपा दल या उसके समर्थक विधायकों के सदस्यता से ही इस्तीफा दिलवा कर सदन की प्रभावी संख्या और नतीजतन बहुमत के आंकड़े को ही नीचे ले आना। बाद में इन विधायकों को भाजपा टिकट पर उपचुनाव लड़वा दिया जाता है। पिछले साल जुलाई में इसी तिकड़म के सहारे कर्नाटक में एच.डी. कुमारस्वामी के नेतृत्व वाली जनता दल सेक्यूलर-कांग्रेस सरकार को गिरा कर येदियुरप्पा के नेतृत्व में भाजपा ने सत्ता में वापसी की थी, तो अब मध्य प्रदेश में भी वैसा ही खेल खेला गया है। हां, एक फर्क अवश्य है कि कर्नाटक में त्रिकोणीय मुकाबले में भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी। अति आत्मविश्वास में उसने बिना बहुमत के सरकार भी बना ली थी, पर चंद घंटे बाद ही बेआबरू होकर येदियुरप्पा को सत्ता से विदा होना पड़ा था। उस प्रयोग और उससे हुई फजीहत की आलोचना भी खूब हुई थी और बाद में भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए कांग्रेस ने अपने से भी छोटे दल जनता दल-सेक्यूलर के नेता कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनवा दिया, जिसके अंतर्विरोधों का लाभ उठाकर येदियुरप्पा ने सत्ता में वापसी का अपना खेल खेला। मध्य प्रदेश में समर्थक विधायकों में सेंध के जरिये कमलनाथ सरकार को तो गिराया जा सकता था, लेकिन बहुमत से भाजपा सरकार का गठन संभव नहीं हो पाता। इसीलिए भाजपा, कांग्रेस में ही महत्वाकांक्षाओं और अहं का टकराव तीव्र होने का इंतजार करती रही, जिसका फल उसे अब ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत के रूप में मिल गया।
वर्ष 2018 के आखिर में हुए विधानसभा चुनावों में मध्य प्रदेश के मतदाताओं ने शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा सरकार के 15 साल के अनुभव के बाद कांग्रेस की सत्ता में वापसी के द्वार खोले थे। तब कमलनाथ मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे और ज्योतिरादित्य सिंधिया चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष। बेशक दिग्विजय सिंह के 10 साल लंबे मुख्यमंत्रित्व काल के बाद ही भाजपा की मध्य प्रदेश की सत्ता में वापसी का मार्ग प्रशस्त हुआ था, लेकिन इस बार मुख्यमंत्री पद की दौड़ में कमलनाथ और सिंधिया ही आगे थे। मध्य प्रदेश के साथ ही राजस्थान में भी लंबे अंतराल के बाद कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई थी, जहां पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट मुख्यमंत्री के प्रमुख दावेदार थे। विधानसभा चुनाव छत्तीसगढ़ में भी हुए थे, लेकिन अजीत जोगी के पहले ही कांग्रेस से विदा हो जाने के कारण वहां मुख्यमंत्री पद के लिए ऐसी रस्साकशी नहीं थी। इसलिए बिना ज्यादा तोड़जोड़ के ही भूपेश बघेल को मुख्यमंत्री पद मिल गया। जाहिर है, चुनावी पराजयों के लंबे सिलसिले के बाद तीन राज्यों में एक साथ भाजपा से सत्ता छीनना कांग्रेस के लिए एक संजीवनी साबित हो सकता था। निश्चय ही यह कांग्रेस में पीढ़ी-परिवर्तन का भी अवसर था, क्योंकि इस जीत का श्रेय हमेशा सवालिया घेरे में रहे तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के राजनीतिक नेतृत्व को दिया जा रहा था। स्वाभाविक ही कमलनाथ और अशोक गहलोत उम्रदराज होने के नाते सोनिया गांधी की टीम के सदस्य माने जाते रहे हैं, जबकि सिंधिया और पायलट की गिनती टीम राहुल के सदस्यों के रूप में होती है।
वजह तो कांग्रेस के दरबारी बेहतर जानते होंगे, पर हुआ यही कि अध्यक्ष होने के बावजूद राहुल अपनी टीम के सदस्यों के हितों-भविष्य की रक्षा नहीं कर पाये। राजस्थान में सचिन पायलट को अशोक गहलोत के नेतृत्व में उपमुख्यमंत्री बन कर संतोष करना पड़ा तो मध्य प्रदेश में वैसा करने से इनकार करने वाले सिंधिया इंतजार से आजिज आकर कांग्रेस को अलविदा ही कह गये। यह सही है कि इस बीच हुए लोकसभा चुनाव में सिंधिया अपने परंपरागत क्षेत्र से अपने ही एक बागी समर्थक से हार गये, लेकिन उन्हें कांग्रेस छोड़कर कमल थामने को मजबूर किया कमलनाथ-दिग्विजय सिंह की जोड़ी ने, जो अपने वर्तमान के साथ-साथ अपने बेटों का राजनीतिक भविष्य सुनिश्चित करने में जुटी है, जिसकी राह में सिंधिया रोड़ा बन सकते थे। बेशक परंपरागत संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा पर कमलनाथ की जबरदस्त पकड़ रही है, लेकिन दिग्विजय की बाबत ऐसा दावा नहीं किया जा सकता। लोकसभा चुनाव हार जाने के बावजूद सिंधिया के साथ 22 विधायकों द्वारा कांग्रेस से इस्तीफा स्वाभाविक ही उनके राजनीतिक प्रभाव का प्रमाण भी है। लगता नहीं कि कर्नाटक से शुरू हुआ यह खेल मध्य प्रदेश में ही रुक जायेगा। आनन-फानन में सिंधिया को राज्यसभा सदस्यता और भविष्य में केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह की संभावना से भाजपा ने नेतृत्व की दिशाहीनता से आजिज अन्य राज्यों के कांग्रेसी युवाओं को भी लुभावना संकेत दे ही दिया है।

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