ज्ञानेन्द्र रावत
भारतीय संस्कृति में शक्ति उपासना का सर्वाधिक महत्व है। विनाशकारी ताकतों के नाश के लिए शक्ति जरूरी है। इस शक्ति की अधिष्ठात्री हैं मां दुर्गा। नवरात्र मां दुर्गा के शक्ति स्वरूप का ही आराधना पर्व है। यजुर्वेद में दुर्गा को अंबिका कहा गया है, तो पुराणों और महाकाव्यों में उन्हें शक्ति रूप में जाना गया है। शक्ति को स्त्रीरूपा माना गया है, जगतजननी की भी उपमा दी गयी है। दुर्गा सप्तशती में दुर्गा के शक्ति रूप की उपासना है, जिसमें नारीत्व की महिमा का वर्णन है। एक मान्यता है कि दुर्गा का आविर्भाव विष्णु और रुद्र के क्रोध से हुआ। इस देवी के शरीर में सभी देवताओं का वास है।
शक्ति का पूर्ण विकसित रूप शाक्त पुराणों में मिलता है। देवी उप पुराण प्राचीन एवं प्रमुखतम शाक्त उप पुराणों मे से एक है। इसमें मुख्यतः देवी का चित्रण युद्धरत यानी रक्षा करने वाली देवी के रूप में हुआ है। ‘कालिका उप पुराण’ भी शाक्त पुराण है, जिसमें कामाख्या को प्रधान देवी माना गया है। आदिशक्ति के रूप में देवी के स्वरूप का वर्णन मार्कण्डेय पुराणोक्त दुर्गासप्तशती में मिलता है। श्रीमद‍्देवीभागवत‍् पुराण शाक्तमत का स्वतंत्र पुराण है, जिसमें देवी को विश्व की नियामिका अधिष्ठात्री चैतन्यमयी शक्ति के रूप में चित्रित किया गया है। स्पष्ट है कि देवी उपासना बहुत प्राचीन है जिसके उद‍्भव सूत्र आद्यग्रन्थ ऋग्वेद के मंत्रों में उपलब्ध होते हैं। शक्ति उपासना का बीजारोपण वेदों से ही हो चुका था। वैदिक युग से प्रारम्भ होकर प्रत्येक युग में शक्ति उपासना प्रचलित रही है।
आदिकाल से मानव ने सृष्टि की नियामिका शक्ति को स्वीकार किया है। आद्यग्रन्थ ऋग्वेद में जहां एक ओर परमतत्व के पुरुष रूप की उपासना की गई है, वहीं दूसरी ओर उसके स्त्रीलिंग की उपासना भी मिलती है। शक्ति उपासना का मूल आधार ऋग्वेद की द‍्यावा-पृथ्वी की कल्पना है, जिसमें पृथ्वी स्त्री मानी गई है और आकाश पुरुष। इन दोनों के तादात्म्य की चर्चा ऋग्वेद में अनेक बार की गई है। युग्म रूप में इनका अनेक सूत्रों में आह्वान हुआ है, जिनमें इन्हें माता-पिता कहा गया है। आर्यों के एक वर्ग ने जहां पितृसत्ता की खोज और उपासना की है, वहीं दूसरे वर्ग ने मातृसत्ता की खोज करके उसकी उपासना एवं महत्व का मार्ग निर्दिष्ट किया है। मनु ने सहस्र पिताओं की तुलना में एक माता के गौरव को अधिक स्वीकार किया है। माता के प्रति इस आस्था ने ही शक्ति पूजा को जन्म दिया। इसी भावना से प्रेरित होकर ऋग्वैदिक काल में देवताओं की पूजा के साथ-साथ देवियों की पूजा के संकेत भी मिलते हैं। ऋग्वेद में पृथ्वी, रात्रि, वाक‍्, सरस्वती, पुरंध्रि, धिष्णा, इडा, वृहद्विवा, राका, सिनीवाली, पृश्नि, सरण्यू, इन्द्राणी, वरुणानी, अग्नायी, रुद्राणी, अश्विनी और श्रद्धा आदि देवियों का उल्लेख है। ऋग्वेद के दशम मंडल के एक सूक्त में वाक‍्‍ यानी वाणी की देवी के रूप में स्तुति की गई है। इसमें देवी की महिमा का बहुत ही उदात्त वर्णन है। धर्मसूत्रों में भी शक्ति तत्व को स्वीकार किया गया है।
धर्मसूत्रों के समान ही गृह्यसूत्रों में शिवपत्नी का उल्लेख है। गृह्यसूत्रों में शिवमूर्ति की उपासना के साथ-साथ देवी पूजन की विधियां बतायी गई हैं। इसमें प्रथम बार उनको दुर्गा नाम दिया गया है। रामायण में देवी के दुर्गा नाम का उल्लेख है। एक स्थल पर उन्हें रुद्राणी कहा गया है। अनेक स्थलों पर उन्हें अन्य देवताओं से भी उत्कृष्ट माना गया है।
दुर्गा के विभिन्न रूप हैं और इनके लिए 108 नामों का उल्लेख है। इनमें कात्यायनी, चंडिका, अम्बा, गौरी, कपालिनी, चामुण्डा, वैष्णोदेवी, काली, उमा, भवानी, छिन्नमस्तिका, सुन्दरी और कमला आदि प्रमुख हैं। दुर्गा के इन चरित्रों का मनन करने से यही शिक्षा मिलती है कि सोई हुई शक्ति को बिना जाग्रत किए, किसी भी महत्वपूर्ण काम में सफलता प्राप्ति असंभव है। अकर्मण्य रहने से हमारी इंद्रियां मलिन होकर आत्मघाती पाशविक शक्तियों को जन्म देती हैं, जिनका संहार भगवती महादेवी द्वारा प्रदत्त बुद्धि शक्ति के बिना असंभव है। देवी की पूजा जीवन को उत्प्रेरित और संचालित करने वाले सभी तत्वों की आराधना है। मां दुर्गा हमें अपनी आंतरिक शक्तियों को जगाने की प्रेरणा देती हैं। देवताओं की सम्मिलित शक्ति से दुर्गा का आविर्भाव दरअसल हमें इस बात की प्रेरणा देता है कि समवेत शक्ति के जरिये बड़ी से बड़ी आसुरी शक्ति अथवा संकट पर विजय पायी जा सकती है। मां दुर्गा की उपासना और नवरात्र में सद‍्गुणों को जगाने का संदेश छिपा है। यही सच्चे देवत्व की उपासना है।
रूपं देहि, जयं देहि…
देवी दुर्गा एकता और ब्रह्मशक्ति का प्रतीक हैं। वह कहती हैं- ‘मैं वेद भी हूं, अवेद भी। मैं पैदा भी हुई हूं और नहीं भी हुई हूं।’ देवी की आराधना करते हुए देवता उनसे रूप, यश और शत्रु पर विजय की याचना करते हैं- ‘रूपं देहि, जयं देहि, यशो देहि द्विषो जहि।’
परमात्म शक्ति…
श्रीमद‍्भागवत में वर्णित है- ‘इति प्रभाष्यतं देवी माया भगवती भुवि। बहुनामानिकेतेषु बहुनामा बभूव ह।।’ तात्पर्य यह कि एक दुर्गा के पूजन से ही सभी देवताओं के पूजन की सिद्धि तथा मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। वही परमात्म शक्ति है।
अहं ब्रह्म स्वरूपिणी…
देवी उपनिषद में देवताओं ने तेजस्विनी भगवती को देखकर आश्चर्य से पूछा –‘का असि त्वं’ अर्थात‍् तुम कौन हो! तब देवी ने कहा- ‘अहं ब्रह्म स्वरूपिणी।… विज्ञाना विज्ञानेअहम‍्’ मैं ही ब्रहम स्वरूपिणी हूं, मैं ही विज्ञान और अविज्ञान हूं। कूर्म पुराण के अनुसार जिसके द्वारा यह सृष्टि चक्र निरंतर चलता है, संपूर्ण विश्व जिसके प्रकाश से प्रकाशित है, वह भगवती दुर्गा ही हैं। यही दुर्गा विविध नामों और रूपों में भक्तों का कल्याण करने व उन पर अनुग्रह करने के लिए साक्षात‍् विराजित हैं।
दयारूपेण संस्थिता…
देवी की स्तुति में ऋषिगण और देवता कहते हैं- ‘या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः।।’ अर्थात‍् जो देवी सभी प्राणियों में दया के रूप में विद्यमान है, हम उन्हें बारम्बार नमस्कार करते हैं।

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