एकदा
भारतीय संस्कृति की आभा
सन् 1919 में बैसाखी के दिन जलियांवाला बाग में जनरल डायर ने वहां मौजूद निर्दोष लोगों पर गोलियां चलाने का हुक्म जारी कर दिया। देखते-देखते सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों घायल हो गए। क्रांतिकारी ऊधमसिंह ने डायर से बदला लेने का बीड़ा उठा लिया। उन्होंने बाकायदा दिन और समय तय करके जनरल डायर को गोली मार दी। लेकिन इसके बाद वे वह पकड़ लिए गए। गिरफ्तारी के बाद जब उन्हें कोर्ट में मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। कोर्ट की कार्रवाई शुरू होते ही मजिस्ट्रेट ने उनसे प्रश्न पूछने शुरू कर दिए। ठीक उसी समय एक अंग्रेज युवती भीड़ को चीरते हुए वहां आ पहुंची। उसने मजिस्ट्रेट से ऊधमसिंह से कुछ प्रश्न पूछने की अनुमति मांगी। उसने ऊधमसिंह से पूछा—‘तुम्हारी रिवॉल्वर में तीन गोलियां बाकी थीं। फिर भी तुमने मुझ पर गोली क्यों नहीं चलाई? ऐसा करके तो तुम आसानी से भाग भी सकते थे।’ ऊधमसिंह इस युवती को फौरन पहचान गए। दरअसल, उसी के कारण वह गिरफ्तार हुए थे। उन्होंने विनम्रता से कहा—‘बहन! हम भारतीय लोग हैं। नारी पर हाथ उठाना हमारी संस्कृति के विरुद्ध है। इसी कारण मैंने आप पर गोली नहीं चलाई। वह अंग्रेज युवती ऊधमसिंह का यह जवाब सुनकर श्रद्धा से अभिभूत हो गई। प्रतिकूल दशाओं में भी अपनी संस्कृति न छोड़ने वाला ही सच्चा इंसान होता है। प्रस्तुति : देवेंद्र शर्मा
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