बजट के लक्ष्य
विसंगतियों के बावजूद तेजी लाना ही मकसद
कहना कठिन है कि मोदी सरकार की दूसरी पारी का दूसरा बजट क्रांतिकारी बदलावों का वाहक बनेगा। यह सीमित संसाधनों और आंकड़ों की बाजीगरी से अर्थव्यवस्था की सुस्ती को दूर करने का प्रयास है। नि:संदेह सरकार की प्राथमिकता कृषि क्षेत्र रहा। यह राजनीतिक दृष्टि से भी सुविधाजनक है और विसंगतियों से जूझती खेती में प्राणवायु संचार का प्रयास भी है। नि:संदेह मंदी के दौर से गुजर रहे देश की एक हकीकत यह भी है कि सेवा व उत्पादन क्षेत्र की चालीस फीसदी खपत ग्रामीण क्षेत्र में ही है, जो मूलत: कृषि के दायरे में आता है। ऐसे में कृषि क्षेत्र की दशा सुधारने और ग्रामीण उपभोक्ता की क्रय-शक्ति बढ़ाने का प्रयास किया गया है। नि:संदेह सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की भूमिका घटती जा रही है। मगर देश की बड़ी आबादी आज भी कृषि आधारित रोजगार पर निर्भर है। सच यह भी है कि पिछले बजट में कृषि से जुड़ी विभिन्न योजनाओं के लिए आवंटित धन खर्च ही नहीं हो पाया। खासकर किसान सम्मान योजना का एक बड़ा हिस्सा किसान के पास पर्याप्त कागज न होने के कारण आवंटित नहीं हो पाया। मौजूदा दौर में जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में खाद्यान्न उत्पादन के दाम लगातार गिर रहे हैं, कृषि में बड़ा निवेश अर्थव्यवस्था के दूरगामी लक्ष्यों को पाने में सहायक नहीं हो सकता, फिर भी सरकार ने निवेश बढ़ाया है। नि:संदेह कृषि कार्य में घटते रुझान को दूर करने को प्राथमिकता दी गई है।
नि:संदेह अब वह समय नहीं रहा कि बजट में किस वर्ग को क्या मुफ्त मिला या छूट मिली। सरकार के आय के संसाधन सीमित हैं और उसकी प्राथमिकता राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने की रही है। सरकार के सामने वैश्विक आर्थिक घटनाक्रम भी है और देश के सामने उत्पन्न आर्थिक चुनौतियां भी। सरकार ने विनिर्माण क्षेत्र में निवेश इस मकसद से बढ़ाया है ताकि रोजगार के अवसर बढ़ें और क्रय शक्ति बढ़ने से आर्थिकी को गति मिले। साथ ही पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का महत्वाकांक्षी लक्ष्य भी सरकार के सामने है, जिसके लिये वह बड़े पैमाने पर विनिवेश की तरफ बढ़ रही है। जीवन बीमा निगम में सरकार की हिस्सेदारी बेचने का फैसला भी इसी कड़ी का हिस्सा है। बहरहाल, मध्य वर्ग की आयकर में छूट की आकांक्षा पूरी नहीं हो पायी है। देश में पहली बार दो तरह की कर प्रणालियों को लाने का फैसला किया गया है। जिसकी जटिलताएं करदाता को निश्चिय ही पसोपेश में डालेंगी। आयकर घोषणापत्र लाने और कानून बनाने से आम करदाता को कितना लाभ होगा, कहना आसान नहीं है। आयकर की दरें घटाने के अलग तरह के प्रस्ताव को समझने में वक्त लग सकता है। शेयर बाजार की नाराजगी बताती है कि सरकार ने खर्च में कंजूसी बरती है और राहत-रियायतों में कई तरह के किंतु-परंतु शामिल हैं। लेकिन यह तय है कि सरकार के वादों-इरादों का ज्यादा बोझ सरकारी खजाने पर नहीं पड़ेगा। अर्थव्यवस्था को गति देने के प्रयासों के साथ ही सरकार राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के प्रयास कर सकेगी। लेकिन वहीं एक बात यह भी है कि सरकार ने सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों के लिये ऐसा कुछ नहीं किया है जो बड़े बदलावों का वाहक बन सके।
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