जोगिंद्र सिंह/ट्रिन्यू
चंडीगढ़, 31 जनवरी
सालों की कवायद के बावजूद पंजाब विश्वविद्यालय सीनेट-सिंडिकेट में प्रशासनिक सुधार अब नहीं हो सके हैं। लोकतांत्रिक संस्था होने का दम भरने वाली 150 साल पुरानी सीनेट-सिंडिकेट में आज तक न तो एससी/एसटी को आरक्षण है और न ही इसमें महिलाओं के लिये आरक्षण का प्रावधान। इन वर्गों को एकेडमिक काउंसिल और चयन समितियों में भी कोई जगह नहीं दी जाती। रोचक बात ये है कि सीनेट-सिंडिकेट में आरक्षण को लेकर यूजीसी ने 2006 में एक पत्र लिखकर पीयू को चेतावनी दी थी कि अगर उसने गवर्निंग बॉडी में आरक्षण की व्यवस्था नहीं की तो उसे कोई पैसा नहीं मिलेगा।
तरलोक चौहान ने यूजीसी के अवर सचिव को लीगल नोटिस भेजा जिस पर यूजीसी अवर सचिव ने पीयू को यूजीसी की गाइडलाइन सख्ती से लागू करने को कहा। पीयू ने दाखिलों और नियुक्तियों में तो आरक्षण दे दिया लेकिन सीनेट-सिंडिकेट, एकेडिमक काउंसिल और चयन समितियों में नहीं दिया। लेकिन उस वक्त तक पीयू को पैसा यूजीसी से नहीं बल्कि गृह मंत्रालय से मिलता था जो यूटी प्रशासन के जरिये आता था इसलिये पीयू ने इसे ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया। तरलोक चौहान ने मांग की थी कि सीनेट के आर्डिनरी फेलो की 25 फीसदी सीटें आरक्षित हों जिसमें 22.5 प्रतिशत एससी, 5 फीसदी एसटी, ढाई फीसदी सामाजिक रूप से पिछड़ों के लिये हों। बाद में 7 अप्रैल 2016 को को चांसलर से आये एक पत्र के जवाब में गुरदीप शर्मा की अध्यक्षता में एक कमेटी अवश्य बनी जिसमें अजय रंगा, एके भंडारी, अक्षय कुमार, एमसी सिद्धू, जगवंत सिंह और मोहम्मद खालिद इसके सदस्य थे। कमेटी ने सभी आसपास के विश्वविद्यालयों समेत 1857 में बने मद्रास, कलकत्ता और बाम्बे यूनिवर्सिटी की गवर्निंग बॉडी के स्ट्रक्चर का पता लगाने के लिये वहां से जानकारियां मांगी। कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी, हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी भी गवर्निंग बॉडी में कोई आरक्षण नहीं देती, दाखिलों व नियुक्तियों में देती हैं।
ऐसे बनी पीयू की सीनेट-सिंडिकेट
पंजाब (पूरे पाकिस्तान समेत) सूबे के लाहौर में देश की चौथी यूनिवर्सिटी 1882 में बनी थी। इससे पहले 1857 में मद्रास, बाम्बे और कलकत्ता में 3 विश्वविद्यालय खुल चुके थे। पंजाब यूनिवर्सिटी कांस्टीचुएंट कालेज 1870 में बना जिसके बनाने अंजुमन ए पंजाब नाम की एक संस्था का बड़ा हाथ रहा। इसे बनाने के लिये अंग्रेज ने इस संस्था को पैसे जुटाने को कहा। संस्था ने तत्कालीन राजा-महाराजाओं के आगे हाथ फैलाये गये। इन राजाओं ने पैसा देने के बदले में सीनेट में प्रतिनिधित्व मांग लिया जिस पर 70 लोग नॉमिनेट किये गये। बाद में 1882 में यूनिवर्सिटी बनने पर यह संख्या बढ़कर 105 हो गयी। इसी के साथ अंग्रेजों ने भी चर्च के पादरी, मदरसों के हेड और कुछ अफसरों को पदेन सदस्य बना दिया। फिलहाल सीनेट में 15 रजिस्टर्ड ग्रेजुएट फेलो, 6 फैकल्टी, 24 कालेजों से और 36 नामित के अलावा कुछ पदेन सदस्य मिलाकर संख्या 92 तक पहुंच जाती है।

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