सियासत का तमाशा और तमाशबीन जनता
तिरछी नज़र
पीयूष पांडे
मिर्जा ग़ालिब तमाशा देखने के बहुत शौकीन थे। उन्होंने दीवान-ए-ग़ालिब में एक जगह लिखा है —थी ख़बर गर्म कि ‘ग़ालिब’ के उड़ेंगे पुर्ज़े देखने हम भी गए थे प तमाशा न हुआ।
मतलब यह कि अपना खुद का एक्सक्लूसिव तमाशा देखने की ख़बर मिली तो चचा गालिब चल पड़े। इस शे’र से उस दौर के हालात का विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि तमाशा भी आसानी से देखने को नहीं मिलता था। इस मामले में देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है। अब हर तरफ तमाशा है। आप घर से निकल जाइए बस, चार-छह तमाशे देखकर ही लौटेंगे। गली में, सोसायटी में, बस में, मेट्रो में हर तरफ कोई न कोई तमाशा।
खुदा-ना-खास्ता अगर आपको दिन में कोई तमाशा देखने को ना मिले तो शाम को न्यूज चैनल पर प्राइम टाइम बहस देख लीजिए। हर तमाशे को मात देती बहस। कई बार आपको महसूस होगा कि वास्तविक तमाशा देखने से कहीं अधिक मनोरंजन तो डिबेट देखने में आता है। कोई कोर कसर बाकी रह जाए तो मोबाइल निकालकर वायरल वीडियो देख लीजिए।
अब आप खुद को तमाशे से दूर नहीं रख सकते। दफ्तर में अलग तमाशा, और घर में अलग। कभी-कभी ऐसा मौका आता है, जब आप अंजाने में ही सही तमाशे का हिस्सा होते हैं। आपको लगता है कि आप तमाशा सिर्फ देख रहे हैं, जबकि होता यह है कि आप तमाशे का एक पात्र होते हैं। कभी बाजार आपको नमूना बनाता है, कभी बॉलीवुड तो कभी सियासत।
लेकिन अब तमाशा हदें पार गया है। अब संसद-विधानसभा और राजभवन तक में तमाशा होने लगा है। जिन जनप्रतिनिधियों के कंधे पर जिम्मेदारियों का बोझ है, वो ना केवल तमाशा देख रहे हैं बल्कि उछल-उछलकर तालियां बजा रहे हैं। कई बार तो जनप्रतिनिधि खुद तमाशा बन जाते हैं और इसमें उन्हें ना तो अफसोस होता है, ना परेशानी। कभी बस में बैठकर एक रिजॉर्ट से दूसरे रिजॉर्ट जाते तो कभी परेड के लिए लाइन में लगते जनप्रतिनिधियों को तमाशा बनने में अब कोई गुरेज नहीं। बयानवीरों का अपना अलग तमाशा है।
सियासत जब तमाशे में तबदील हो जाए तो जनता भी तमाशबीन हो जाती है। जनता तमाशे में इतनी तल्लीन हो जाती है कि आवश्यक मुद्दों पर बात ही नहीं करती। सवाल ही नहीं पूछती। भूख, गरीबी, बेरोजगारी जैसे सवाल तमाशे में इस कदर गुम हो जाते हैं कि ढूंढ़ना भी चाहो तो मिलते नहीं। तमाशों का अपना बाजार है। अपनी सत्ता है। अपनी टीआरपी है। तरह-तरह के तमाशेबाज हैं, जिन्हें जनता को छलावा देना आता है। जनता भी भोली है। उसे तमाशा देखने को मिल जाए तो फिर उसे कुछ नहीं चाहिए। रोटी भी नहीं! नौकरी भी नहीं! एक तमाशा अभी निपटा है। अगले का इंतजार है!
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