‘हाथ आया धन वापस नहीं करते’
कृष्ण प्रताप सिंह
मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि बहुत मुमकिन है कि आने वाली पीढ़ियां इस बात पर यकीन न कर पायें कि कभी हाड़-मांस का एक बापू जैसा पुतला इस धरती पर मौजूद था। लेकिन जहां तक यकीन की बात है, आज बापू के जन्म के डेढ़ सौ साल पूरे होने तक अविश्वसनीय हो जाने वाला यह इकलौता तथ्य नहीं है। जिन राम के राज के अपने सपने को साकार करने के लिए उन्होंने जीवनपर्यंत प्रयत्न किए, उनकी जन्मभूमि अयोध्या भी बापू सिर्फ दो बार ही पहुंच सके।
10 फरवरी, 1921 को उनकी पहली अयोध्या यात्रा के समय अयोध्या व उसके जुड़वां शहर फैजाबाद में उत्साह व उमंग की अभूतपूर्व लहर छा गई थी। हर कोई उनकी एक झलक पाकर धन्य हो जाना चाहता था। फैजाबाद के ऐतिहासिक घंटाघर पर शहनाई बज रही थी, हमें आजाद कराने को गांधी जी आते हैं।
इस यात्रा के आठ साल बाद 1929 में बापू फिर अयोध्या आये। ‘हरिजन फंड’ के लिए धन जुटाने के सिलसिले में। फैजाबाद शहर के मोतीबाग में हुई सभा में उन्होंने लोगों से उक्त फंड के लिए मुक्त हस्त से योगदान करने को कहा तो एक सज्जन ने, जिनके पास नकद रुपये नहीं थे, अपनी चांदी की अंगूठी ही उन्हें दे डाली। बापू ने अचानक सभा में ही अंगूठी की नीलामी का एेलान कर दिया। ज्यादा ऊंची बोली लगे और ज्यादा धन-संग्रह हो सके, इसके लिए उन्होंने घोषणा कर दी कि नीलामी में जो भी उक्त अंगूठी प्राप्त करेगा, उसे वह अंगूठी वे अपने हाथ से पहनाएंगे।
लेकिन चूंकि सभा में सामान्य लोग ही आये थे, बोली ज्यादा ऊंचाई नहीं छू सकी। एक सज्जन ने पचास रुपये की बोली लगाई और वह उन्हीं के नाम पर खत्म हो गई। यों, उन दिनों के लिहाज से यह रकम भी कुछ कम नहीं थी। सज्जन के पास उन्हें देने के लिए सौ रुपये का नोट था। उन्होंने उसे बापू को दिया और बाकी के पचास रुपये वापस पाने के लिए वहीं खड़े रहे। मगर बापू ने उन्हें रुपये नहीं लौटाये। यह कहकर लाजवाब कर दिया कि ‘हम तो बनिया हैं, हाथ आये हुए धन को वापस नहीं करते। वह दान का हो तब तो बिल्कुल भी नहीं।’ इस पर उनके आस-पास उपस्थित लोग हंस पड़े और सज्जन उन्हें प्रणाम करके खुशी-खुशी लौट गये।
गौरतलब है कि इस यात्रा में बापू अपने समर्पित कार्यकर्ता धीरेन्द्र भाई मजूमदार द्वारा अकबरपुर में स्थापित देश के पहले गांधी आश्रम भी गये थे। वहां वे ‘पाप से घृणा करो पापी से नहीं’ वाला अपना बहुप्रचारित संदेश देते हुए अंग्रेज पादरी स्वीटमैन के बंगले में ठहरे और आश्रम की सभा में लोगों से संगठित होने, विदेशी वस्त्रों का त्याग करने, चरखा चलाने, जमीदारों के जुल्मों का अहिंसक प्रतिरोध करने, शराबबंदी के प्रति समर्पित होने और सरकारी स्कूलों का बहिष्कार करने को कहा। उनके इस आह्वान का व्यापक असर हुआ।
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